रणचंडी खंडी खळां

।।रणचंडी खंडी खळां।।

नमो मसाणी, भैरवी, चामुंडा चरिताळ।
नमो डाकिनी साकिनी, दैत मार डाढाळ।।1

छिन्न मस्तिका, सांभवी, बगला, तारा, मात।
त्रिपुरसुंदरी, सोडसी, मातंगी अवदात।।2

पंचानन कमलासनी, कमल नयनि कर कंज।
शवारूढ, काली, शिवा, भय भगतां तण भंज।।3

रणचंडी, खंडी खळां, वैरि विहंडी आइ।
उण री पगदंडी पकड, रहै न चिंता कांइ।।4

झंडी लाल फरूखती, जोत अखंडी थाइ।।
मंडीत मंदिर मात रो, गिर पर गिरवर राय।।5

मां थारै बळ सूरमौ, सदा नाम रो साथ।
लेय लडूं, आगै बढूं, नवलख री सुण नाथ।।6

नमौ मात पीतांबरा, जीभ-खैचणी खल्ल।
पाशांकुश वरदा सदा, दैवी मुखी बगल्ल।।7

धूम, काग- रथ -आसनी, घण भूखी बहु कूर।
रखै सूपडौ साथमैं, नमौ जगत री नूर।।8

वैस लियां विधवा फरै, घर घर मांगण जाय।
धूमावत नें ध्यावतां, नित प्रत नव निध थाय।।9

नमो त्रिशूली खडगिनी, पाणिधर- खळमुंड।
वीसभुजी, वागीसरी, चावी जग चामुंड।।10

सकल जगत री सरजणी, धणी धरा असमान।
खडग कृपाणी खेचरी, धरुं तिहारौ ध्यान।।11

छपन क्रोड चामुंड अर, चौसठ जोगण साथ।
नवलख रमती नेसडै, भाखर सूंधा माथ।।12

सूल-सती, जोगी, जती, वीस हथी रा हाथ।
आंपा रा है ऊपरां, जीवन रे भाराथ।।13

जय माता वडवासनी, सासनि सब संसार।
नाम लियां निरभय करै, भरै खुसी भंडार।।14

~~नरपत आसिया “वैतालिक”

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