यह गरल है जो पच नहीं सकता!

अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयम्।
परोपकारः पुण्याय पापाय परपीड़नम्।।

उक्त श्लोक के उद्घोषक मनीषी के शब्दों को जिन्होंने आत्मसात किया, उन्होंने ही अपने जीवन को वास्तविक रूप से साफल्यमंडित किया है। परोपकारः पुण्याय को अपने जीवन का जिन लोगों ने अपना ध्येय बनाया वो ही महापुरूषों की श्रेणी में स्थापित हुए। ऐसे लोगों ने अपनी हानि करने वाले के लिए भी कभी अमंगल की कामना नहीं की।

जब हम हमारे मध्यकालीन इतिहास के धुंधले पृष्ठों को पलटते हैं तो उन पर ऐसी-ऐसी आभामंडित कहानियां अंकित है जिन्हें पढ़कर हमारे मनोमस्तिष्क में उन हुतात्माओं के त्याग, महानता तथा क्षमाशीलता के सुभग भावों की अमिट छाप स्वतः ही छप जाती है। क्षमा वीरस्य भूषणम् की उक्ति इनके चारू चरित्र की सहगामिनी परिलक्षित होती है।

ऐसी ही एक घटना से आपको परिचित करवा रहा हूं।

कच्छ धरा में एक गांव है मोरझर। मोरझर पुराना सांसण। यहां सुरताणिया चारण रहते हैं।

सुरताणिया पहले पाधरड़ी गांव में रहते थे लेकिन किसी बात पर वहां के ठाकुर राजाजी वाघेला से अनबन हो जाने के कारण अपनी मवेशी लेकर इस गांव से निकल पड़े।

जब ये चलते-चलते मोरझर के पास आए तो इन्हें लगा कि यह धरा हमारे बसने लायक है। लंबो झूंसरो, अथाह पानी, लीला लेर और घेर-घुमेर सघन वृक्षों की छाया देख इन्होंने यहीं अपना नेश स्थापित कर लिया।

उस समय इस सुरताणिया परिवार के मुखिया जगोजी थे। वे प्रखर वक्ता, भीमकाय तथा प्रभावी व्यक्तित्व के धनी थे-

भोपाल़ां बातां हद भावै,
सबद सुहावै घणा सकाज।
देह धराज दीसता डारण,
राजावां बिच सोहै कविराज।।
~~मानसिंहजी जोधपुर

उन दिनों मोरझर की धरा लाखाड़ी की सीमा में पड़ती थी। जगाजी का ऐसा व्यक्तित्व देखकर वहां के ठाकुर देवाजी ने सदैव के लिए इन्हें यह धरती इनायत करदी। जगाजी के साथ उनके बड़े भाई भाखरसी भी थे। उनके एक बेटे का नाम महकरणजी था।

महकरणजी की शादी वावड़ी गांव के झीबा खोड़ीदान की बेटी वानूं के साथ हुई। वानू दया की मूर्ती और करुणा की सागर थी। थोड़े ही दिनों में अपने इन गुणों के बूते उन्होंने पूरे गांव के हृदय में सम्मान प्राप्त कर लिया।

सुरताणियों के साथ रैयत भी आई थी। जिसमें कई गरीब-गुरबे भी साथ थे। जिनमें से कुछ की स्थिति समय की मार से और विपन्न हो गई।

ऐसे मिनखों का स्वाभिमान भी कायम रहे और वे निराहार भी न रहे, यह सोचकर वानूं ने एक नियम बनाया। अलसुबह उठकर बिलोना करती फिर लापसी रांधती। लापसी की चरुड़ी व छाछ का चाडा अपने घर के मुख्य दरवाजे के बाहर रख देती थी ताकि लोगबाग बिना शंके के जाकर झारा (नाश्ता) कर लें। खुद घरके अंदर अपूठी बैठकर माला फेरती रहती थी।
यह उनका नित्यकर्म था।

महकरणजी की मोतबरी और वानूं के दया भाव की बातें सर्वत्र फैल गई।

परंतु यह सुखद दापंत्य संयोग वि. स. 1760 में दुर्योग में बदल गया। इस साल महकरणजी का स्वर्गवास हो गया।

वानूं ने पति विछोह का दुख छाती पर पत्थर रखके सहन कर लिया परंतु अपने नित्यकर्म में किसी प्रकार की कोर कसर नहीं पड़ने दी।

वानूं की दूधाल़ी और रूपाल़ी गायों की कीर्ती पाखती के गांवों में पहुंची।

एकदिन इनकी गायें मछरती रोही में हरा घास चर रही थी। ग्वालिए पास बैठे चैन की बंशी बजा रहे थे कि अचानक गायों में भगदड़ मच गई। ग्वालियों ने देखा कि दश-बारह पैदल तथा दो घुड़सवार गायों को जबरन ले जा रहे थे। गवाले उठे और उन्हें रोका लेकिन इनसे पार पड़ी नहीं। डरे-सहमे ग्वाले गांव आए और सारी बात बताई।

गांव वालों ने पता करवाया तो विदित हुआ कि पास ही के लोरिया के दो जाडेचा राजपूत मेघा और ऊनड़ उनकी गायें ले गए हैं। तब गांव के कुछ नौजवान आदमी मरने-मारने पर उतारू होकर जाने हेतु उद्धत हुए। इस बात का पता जब वानूं को लगा तो वे आई और उन नौजवानों को रोका और कहा कि-
“तुम मत जाओ। किसी बात पर ऊंचनीच हो सकती है। ऐसे कामों में धीरज की आवश्यकता होती है। अतः मैं स्वयं जाऊंगी और समझाबुझाकर गायें वापिस ले आऊंगी।”

वानूं लोरिया गई। जाकर उन्होंने जाडेचों को इकट्ठा किया और दहाड़ते हुए उन्हें लताड़ा कि-
“रे डेल़ीचूकां (क्रियाहीण) चारणों से ही नहीं चूके! चारण तो आपके भरोसे ही निश्चिंत रहते है। क्या आपने रजवट रक्षक पाबू प्रणवीर की बात नहीं सुनी? उस महामना ने चारणों की सुरभियों की रक्षार्थ ही स्वर्गलोक का पथ वरा था। आज भी वो प्रण से बंधा हमारे गांवों का अटल पहरेदार कहलाता है-

चवड़ै सूवो चारणां, बारै बांधो वित्त।
धिन ज्यांरै धांधल धणी, पाबू पौरायत्त।।

चारण वित्त वाहर चढ्यो, मसतक बंधै मोड़।
अमलां वेल़ा आपनै, रंग पाबू राठौड़।।

एक तरफ तुम गीदड़ हुकी-हुकी करते हुए हमारी ही गायें घेर लाए। लख लानत है तुम्हें जन्म देने वाली को। जिसने ऐसे कपूतों को स्तन्यपान करवाकर पोषण किया। उसे तुम्हारी फिटकरी जैसी आंखें देखकर नाड़ा काटने की जगह तुम्हारी गर्दन काटनी चाहिए थी।

हम चारण हैं। हमारी गायों का दूध तुम्हें जर नहीं सकता। यह दूध नहीं अपितु तुम्हारे लिए जहर है! जहर! अतः मेरी गायें अविलंब वापिस दे दो। अभी भी लड़खड़ाए हो वैसे पड़े नहीं हो।”

यह सुनकर उन जाडेचों ने कहा कि-
“क्या माजी बहकी-बहकी बातें कर रही हैं? कभी श्मशान में गई हुई लकड़ी वापिस आई है? अगर हम गायें नहीं लाएंगे तो क्या किसानी करेंगे? हमारे तो यही खेती और यही नौकरी है। यह तो दूध है! हमें तो रक्त ही पच जाता है।”

यह सुनते ही डोकरी की भ्रकुटियां तन गई। उन्होंने अपनी कटारी निकाली और बोली कि–
“मुझे लग रहा कि तुम चन्नों के भरोसे कंकरीट चबा रहे हो। यह रक्त चारणों का है! तुम्हें क्या? तुम्हारी सात पुश्तों को नही पच सकेगा। जिस-जिसने यह रक्त पचाने की भूल की है उनका इस संसार से नामोनिशान उठ गया। पीछे कोई नामलेवा नहीं बचा। अरे मूर्खों ! तुमने सुना नहीं कि कामेई के क्रोध से रावल जाम जल गया तो फिर तुम कौनसे खेत की मूली हो? जिनकी वाहर खुदोखुद जगजामणी चढती है उनका धन कौन खा सकता है? अभी भी एक मौका देती हूं कि जैसे गायें लाए हो वैसे ही छोड़दो। मैं जान लूंगी कि गायें मेरी गोयर में खड़ी है।”

यह सुनते ही दोनों कुक्षत्रिय कालवश होकर जोर से हंसते हुए बोले-
“डोकरी! वो चारणियां और समय दूसरा था। अब समय पलट गया है। मन को समझाले कि गायें मेरी नहीं थी बल्कि इन जाडेचों की ही थी।”

यह सुनते ही डोकरी ने कटार से अपने स्तन चीरकर रक्त की अंजुली भरी और उन कायर जाडेचों की तरफ उछालते हुए बोली कि-
“अरे! राक्षसों यह लो एक चारणी का रक्त। पचे तो पचा लेना अन्यथा तुम स्वयं नवलाख का भक्षण बनना।”

यह चकासा देखकर वहां खड़े दूसरे आदमी आवाक रह गए। परंतु डोकरी यहीं नहीं रुकी। उन्होंने अपनी कटार अविलंब कंठों में घोंपली।

गऊचोरों ने जब वानूं का यह विकराल रूप देखा तो वहां से भाग खड़े हुए। बाकी अन्य जाडेचे उनके पैरों में पड़े और प्रार्थना की कि-
“हे बहन! हम निर्दोष हैं, हमें क्षमा कर। !

यह सुनकर क्षमा वीरस्य भूषणं का अनुसरण करते हुए वानूं बोली कि-
“मैंने तो आपको क्या? उन गऊचोरों को भी माफ किया। आपने सुना होगा कि जब मूढ़मति कानिये (काना राठौड़, जांगल़ू) ने कालवश मा करनीजी की परीक्षा हेतु अपनी मृत्यु मांगी थी तब उस दयादधि ने भी कहा था-

चारण नै रजपूत री, रख रिछ्या दिन-रात।
आ कांई ऊंधी ऊकली, (म्हारा) भोल़ा कानव भ्रात?

अतः मैं मेरे मुंह से राजपूत को काल के गाल में समाने का नहीं कह सकती। परंतु कोई अपनी करनी का फल पाएगा तो उसमें मेरा दोष मत मानना।

यह कहकर वानूं मोरझर आ गई।

वहां उन्होंने कुटुंब को एकत्रित किया और पूरी रात्रि योगसाधना में बैठी रही। पावन प्रभात में मोरझर गांव की पश्चिम की ओर आई टेकरी पर सूर्य की साक्षी में वि. सं. 1772 की बैसाख शुक्ला 13 गुरुवार के दिन जमर-ज्योति से परमज्योति में विलीन हो गई। आज भी वहां एक पाल़िया (थान) और उसमें स्थापित खांभी (पाषाण प्रतिमा) इस बात की साखीधर है कि आई वानूं ने स्वाभिमान और चारणाचार को अक्षुण्ण रखने हेतु जमर किया था।

इतने वर्षों बाद भी मोरझर के चारण तो क्या! अन्य जाति के लोग भी लोरिया का पानी नहीं पीते। इस ‘अपियै’ के नियम का आज भी दृढ़ता से निर्वहन कर रहे हैं।

आपको जानकर यह आश्चर्य होगा कि लोरिया के वे दोनों खूटल जाडेजों का पूरा परिवार थोड़े ही दिनों में मृत्यु को प्राप्त हुआ।
उस इलाके में मा वानूं आज भी एक लोकदेवी के रूप में संपूज्य है।

परवर्ती कई डिंगल कवियों ने आई को अरदास करके अपनी मनोकामनाएं पूर्ण करने का विश्वास जताया है। इस पेटे उस अंचल में एक बात लोक विश्रुत है कि कवि जीवण रवाणी (रवदान सुरताणिया का पुत्र) रोहा ठाकुरों के खास मर्जीदान थे। रोहा की एक कुंवरी की शादी लाठी की हुई थी। कुयोग से शादी के थोड़े दिनों बाद ही वो वैविध्य को प्राप्त हुई।

रोहा ठाकुर ने जीवण सुरताणिया को बुलाया और कहा कि-
“आप लाठी जाइए और बाई को ले आइए।”

जीवणजी गए। वहां के ठाकुर ने आवभगत की। फिर बाई से मिले तथा सुखदुख की बातें की। बातों-बातों में बाई ने कहा कि-
“भाभोसा (बड़े पिता) आप मुझे वचन दें तो मैं आपको एक बात कहूं।”

यह सुनकर जीवणजी ने कहा कि “डीकरा ! वचन से क्या करेगी? तूं कहे तो मेरा जीव निकालकर दे दूं! बता क्या कहना चाहती है?”

बाई ने कहा कि-
“मात्र वचन।”

जीवणजी ने कहा कि-
“ले बेटा वचन है। जबतक मेरी श्वास संचरित हो रही है तबतक इस वचन की पालना करूंगा।”

तब कुंवरी ने कहा कि-
“मेरे पर राम रूठ गया तब मुझे आज यह दिन देखने पड़े। आज तो मेरा बाप बैठा है परंतु कल को मेरे पिता को सौ वर्ष पहुंच गए। तब मेरे भाई आंख बदल लें तो मैं क्या करूंगी? अपना पेट कैसे भरूंगी? अतः आप मेरे सारे आभूषण अपने पास सुरक्षित रखें। किसी को भी किसी भी सूरत में नहीं बताएंगे। मेरा श्रृंगार तो रहा नहीं लेकिन आधार रूप में चाहिए तब मुझे दे देना। कहकर कुंवरी ने अपनी मंजूषा जीवणजी को पकड़ा दी।”

जीवणजी कुंवरी को लेकर रोहा आ गए। गढ़ में बाई को उतारकर खुद ठाकुर से बिना मिले अपने गांव आए तथा मंजूषा सुरक्षित रखकर विश्राम किया।

पीछे से कुछ चुगलखोरों ने ठाकुर के कान भरे कि-
“कुंवरी तो बेचारी बच्ची है, उसमें अकल नहीं है। अतः बाजीसा ने बाई के गहने फुसलाकर ले लिए तथा पोलपटी में हजम करना चाहते हैं।”

यह सुनकर ठाकुर को रीस आ गई। उन्होंने जीवणजी के पीछे अजेज आदमी भेज जीवणजी को बुलाया और आनन-फानन में कैद करके कहा कि-
“बाई के गहने देने पर ही आप छूटेंगे।”

यह सुनकर जीवणजी पूरा माजरा समझ गए। गहना तो उनके लिए अलीण (न छूने योग्य वस्तु) था। वो उसे कभी का फैंक सकते थे लेकिन सवाल कुंवरी को दिए वचनों के रक्षण का था। अतः वे मोरझर की तरफ मुंह करके वानूं की स्तुति करने लगे-

कर वा’र वानूं आव करणी,
जेथ नांम न जांणियै।
परदेश देश विदेश परगट,
विखम भोम वजाणियै।
कोई जात मात न तात जांणै,
पिता नांम न पावियै।
जिण ठांम ओखी पड़ै झीबी,
ओथ वानूं आवियै।।
मा ओथ वानूं आवियै।।

बात चलती है कि जैसे ही एक-दो छंद पूरे हुए थे कि कोठरी के ताले स्वतः झड़ गए। पास खड़े प्रहरियों ने देखा तो अविलंब ठाकुर को बुलाया। जब ठाकुर ने यह तमाशा देखा तो समझ गए कि यह कोई देवीय चमत्कार है।

ठाकुर ने देखा कि कवि हर चतुर्थ कड़ी में वानूं को चाड (करुण पुकार) कर रहा है कि-. . . ओथ वानूं आवियै।
जैसे ही अरदास पूरी हुई और ठाकुर से कवि की आंखें चार हुई तो ठाकुर ने कहा कि-
“कविवर मुझे माफ करें। मैं बहकावे में आ गया था। भोल़ै बामण भेड खाई, भल़ै खावै तो राम दुहाई।”

जीवणजी ने कहा कि-
“मैं माफ करने वाला कौन हूं? माफ तो मेरी माँ वानू ही करेगी जिसने मेरे ये बंधन तोड़े हैं, कलंक काटा है।”

ठाकुर उसी समय घोड़े चढ़कर मोरझर गए और वानूं की जोत करवाके उनकी मूर्ति के समक्ष क्षमा मांगी।

वानूं के विमल चरित्र को रेखांकित करते हुए गोपाल़जी खिड़िया रचित ‘रास रै भाव रा छंद’ सरस और श्रेष्ठतर रचना है-

झणणाट पगां बिच झांझर जोरसुं,
सोर ठणां ठणकंत ठवै।
झल़कै भुज चूड़ झणकंत कंकण,
वीस भुजाल़िय ताल़ व्रवै।
हिय हार हिलोल़ लल़ै लट मोतिय,
जोतिय लाल अंगार जमै।
वरदाय विसोतर वाहर वानुंय,
राय मोरांझर रास रमै।।

परवर्ती कवियों ने भी मा वानूं के विमल चरित्र का चित्रण कर अपनी वाणी को धन्य किया है-

।।वानूं विरद।।
।।दूहा।।
मेहर करी नै मात मुझ, शारद कर दे सीस।
वरणूं जस वांनूं विरद, बुद्ध करै बगसीस।।१
आखर उगती ऊजल़ा, जुगती मंझ जड़ाव।
सगती वांनूं रा सरस, गुण जस करूं घड़ाव।।२
जनमी झीबां जोगणी, विमल़ वावड़ी वास।
खोड़ीदान पितु खाटिय, जग रसना जसवास।।३
मही कच्छ वो मोरझर, सतधर बडो सुथान।
सुकव वर्यो सुरताणियो, दुथी मेकरणदान।।४
सतरासो बारा सही, जनमी वांनूं जाण।
सतरासो बावोतरै, प्रिथमी कियो प्रयाण।।५

।।छंद – भुजंगी।।
जन्नमी नमो जोगणी जात झीबां।
धरा मारिया वैरियां देय धीबां।
वधारै तुंही वावड़ी आय वांनूं।
बणै साय वांनूं बणै साय वांनूं।।६

नमो तात खोड़ी बडो पात नेही।
पुणां पेट पूरां तणै धार देही।
थिरां भोम ऊतारवा पाप ठांनूं।
बणै साय वानूं बणै साय वानूं।।७

सुणी बैन वा देवला सांगवारी।
सची कीरती सांभल़ी कच्छ सारी।
थयो मोदरो जैण रो एम थांनूं।
बणै साय वानूं बणै साय वानूं।।८

मही मोरझ्झरं तुझां थान मोटो।
तिसां भूखियां भांजणी रीझ तोटो।
दयाल़ी अठंजाम अमाम दांनूं।
बणै साय वानूं बणै साय वानूं।।९

उठै भाखफाटी सदा पैल आई।
भलां भूखियां भोजन्नां दैण भाई!।
छिती आपरी बात वा नाय छांनूं।
बणै साय वानूं बणै साय वानूं।।१०

चवां धांम तोरै सदाव्रत चालै।
घणी लापसी धापसी हाथ घालै।
जको भेद जाती तणो नाय जांनूं।
बणै साय वानूं बणै साय वानूं।।११

गुडै मातरै बोहल़ी पाल़ गायां।
चरै लील धेनां वन्नां जाय चायां।
धकै पापियां हारली सार ध्यांनूं।
बणै साय वानूं बणै साय वानूं।।१२

उठै मेघ एको उन्नड़ं अनाड़ी।
बियां धेन ले जाय नै गेह बाड़ी।
खरी जात जाड़ेज बिगाड़ खांनूं।
बणै साय वानूं बणै साय वानूं। १३

उणी वेर ग्वाल़ां सही बात आपी।
पुनी चोरली लोरियां धेन पापी।
करी गल्ल सारी इमां आप कांनूं।
बणै साय वानूं बणै साय वानूं। १४

जची चारणां धारणा राख जाणू।
इल़ा मोरझ्झरं तणी तंब आणू
पड़्यो पापियां मूझ सूं आज पांनूं।
बणै साय वानूं बणै साय वानूं। १५

उणी वेर पूगी छत्री गेह आगै।
सको सांभल़ो लेवसूं गाय सागै।
अखां मानजो झूठ ना एक आंनूं।
बणै साय वानूं बणै साय वानूं। १६

जितै मूझ ऊभां किसो धेन जारै।
सुणो राखणी पापियां नाय सारै।
छत्री रीत नीतं किसी तूझ छांनूं।
बणै साय वानूं बणै साय वानूं। १७

मुदै पापियां धापियां नाय मानी।
खरी भांत बूवा जिकै जम्म खानी।
जुड़ी जोगणी झाल़ बंबाल़ जांनूं।
बणै साय वानूं बणै साय वानूं। १८

खपै नीच सारा कियो मात खेटो।
हदं पार कीनी दियो वंश हेटो।
बणी बात साची धरा ए बखांनूं।
बणै साय वानूं बणै साय वानूं। १९

बणी रूप क्रोधाल़ रुद्राल़ वैसो।
जयो भामणी ईश री देख जैसो।
भरै साख जैरी बिनां चंद भांनूं।
बणै साय वानूं बणै साय वानूं। २०

हुवै पात दोरो जदै मात हेरै।
जचैै केहरी पीठ पे भीर जैरै।
करै साबल़ी सेवियां साद कांनूं।
बणै साय वानूं बणै साय वानूं। २१

मुदै सांसणां आप म्रजाद मंडी।
चवां थूरिया चूरिया दूठ चंडी।
जिकी ख्यात एको नको झूठ जांनूं।
बणै साय वानूं बणै साय वानूं। २२

खरी कच्छ भोमी दिवी आप ख्याती।
जणै लाटणी कीरती खूब जाती।
धिनो आपणी रीझ नै धन्न धांनूं।
बणै साय वानूं बणै साय वानूं। २३

थया रूप अन्नेक में एक थारा।
सही सेवियां देवियां वर्ण सारा।
नको एक बड्डो नको एक नांनूं।
बणै साय वानूं बणै साय वानूं। २४

थल़ी थेट वो गीधियो दास थारो।
सदा वेर उवेर में आय सारो।
मही माण दिरावजै आण मांनूं
बणै साय वांनूं बणै साय वांनूं।।२५

।।छप्पय।।
मही मोरझर मात, दिपै धर कच्छ दयाल़ी।
निरझरणी तूं नेह, ऐह विध जात उजाल़ी।
जस झीबां नै जोर, देह धर गेह दिरायो।
विमल़ वावड़ी वास, सुजस हद बध्यो सवायो।
सुद्ध भाव सुकव सुरताणिया, ध्यान सदा तुझरो धरै।
कर जोड़ गीध रतनू कवी, कीरत दासुड़ी युं करै।।२६

।।दोहा।।
सीख दिनी सुरताणिये, मन सूं देख मुरार।
कही भेंट गिरधर करी, वांनूं विरद बणार।।

~~गिरधरदान रतनू “दासोड़ी”

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