वरेण्य व्यक्तित्व के धनी वीरवर दुर्गादास राठौड़

वीरभूमि के विरुद से विभूषित, अनूठे शौर्य एवं औदार्य से अनुप्राणित, चारित्रिक महनीयता से मंडित एवं कर्त्तव्यनिष्ठा की कांति से सुशोभित रणबंके राजस्थान की धरती का इतिहास अतीव गौरवमयी रहा है। यहां के नरपुंगवों ने राव-रंक के भेद को भुलाकर अपने दायित्व-निर्वहन को प्राथमिकता दी है। जान से अधिक आन और प्राण से अधिक प्रण की गर्वोक्ति को पग-पग पर साकार करते उदाहरण इस धरती की अनगिन विशिष्टताओं के साक्षी हैं। आज पद एवं प्रतिष्ठा की लिप्सा ने सबको ऐसा जकड़ा है कि हम अपने अतीत के आदर्शों को भूल रहे हैं। इस धरती का इतिहास इस बात का गवाह है कि यहां के सपूतों ने स्वारथ को कभी सगा नहीं बनाया। उन हूतात्माओं ने अपने स्वाभिमान के सामने किसी प्रलोभन की तो बिसात ही क्या राज-सिंहासन तक को ठुकराने में संकोच नहीं किया। अन्याय का प्रतिकार एवं नीति-न्याय की पैरोकारी यहां के लोगों का सहज स्वभाव रहा है। राजस्थान का असली इतिहास तो उसके वाचिक साहित्य एवं लोकगीतों में है। जो कुछ इतिहास आज हमारे सामने है, वह अधूरा इतिहास है। महल से झोंपड़ी और खेत से रणखेत तक की वीथियों का सूक्ष्म अवलोकन करने पर इस स्वाभिमानी रज को बारम्बार मस्तक पर धारण करने का मन होता है। यहां के जंग हो या राग-रंग, प्रकृति हो या संस्कृति, रीति हो या प्रीति, नीति हो या भक्ति हर क्षेत्र अपनी विरल विशिष्टताओं का पुंज है। यहां की वीर माताएं तो अपने सपूतों को जन्म घूंटी के साथ ही वीरता के संस्कार देना शुरु कर देती है। ऐसी कौनसी धरती होगी जिसकी माताएं पालने में झूलते अपने लालों को मातृभूमि की रक्षार्थ सर्वस्व होम करने की शिक्षा देती हो। माताओं की लोरियों में तो अपने लालों के लिए ऐशोआराम, सुंदर बहु, रमणीय खिलौने तथा खाने-पीने की स्वादिष्ट चीजों के उल्लेख होते हैं परन्तु राजस्थान की वीर नारी की लोरी सुनिए-

इला न देणी आपणी, हालरिया हुलराय।
पूत सिखावै पालणै, मरण बडाई माय।।

बेटा रणभूमि में शहीद हो गया। उसकी मृतदेही को अपने सामने देखकर राजस्थान की वीर मां गश खाकर गिरती नहीं है वरन अपने बेटे को शाबासी देती है। उसकी आंखों से दुख के आंसूं नहीं बहते वरन आल्हाद से उस मां के वक्षस्थल से दुग्ध स्रावित होने लगता है-

बेटा दूध उजाळयो, तूं कट पड़ियो जुद्ध।
नीर न आवै मो नयण, पण थण आवै दुद्ध।।

ऐसी ही महनीय माताओं तथा प्रेरणास्पद पुत्रों के अनुकरणीय सुकृत्यों के परिणाम स्वरूप हमारी इस मरुभूमि को वीर-वसुंधरा एवं ‘रणबंका राजस्थान’ का विरुद मिला है। कहते हैं कि जहां बड़भागी लोग पैदा होते हैं, वहां सारे सुख-वैभव स्वयं ही चल कर आ जाते हैं और उनका लाभ सारी कायनात को मिलता है। पूरे वन में चंदन का पेड़ एक भी होता है तो खुशबू सबको मिल जाती है, उसी प्रकार से हमारी मातृभूमि को अपने सुयश की सुवास से महकाने वाले वरेण्य व्यक्तित्वों के त्याग एवं बलिदान के बल पर हम आज गौरवशाली अतीत के मालिक हैं-

वडभागी जलमै जठै, सब सुख थाय सवाय।
अेक चनण री ओट में, सारौ वन सुरमाय।।

ऐसे शौर्यमयी संस्कारों की धरती का एक अदभुत सूरमा था-वीरवर दुर्गादास राठौड़। दुर्गादास राठौड़ का जीवन वरेण्य व्यक्तित्व एवं अनुकरणीय कृतित्व का अनुपम उदाहरण है। राजस्थान के डिंगल कवियों ने उत्कृष्ट के अभिनन्दन एवं निकृष्ट के निंदन की सतत काव्यधारा प्रवाहित की है। मध्यकालीन इतिहास का अवलोकन करने पर राजस्थान के दो ऐसे वीर सपूतों का जीवन हमारे सामने आता है, जिनके शौर्य पर कवियों ने सर्वाधिक कलमें चलाई। वे हैं अप्रतिम वीर अमरसिंह राठौड़ एवं वीरवर दुर्गादास राठौड़। दुर्गादास राठौड़ के समकालीन चारण कवि तेजसी सांदू ग्राम भदोरा ने दुर्गादास के व्यक्तित्व एवं कृतित्व से प्रभावित होकर लिखा कि महाभारत काल में पांडवों को जिस तरह संघर्ष करते हुए वनवास और अज्ञातवास में रहना पड़ा वैसी ही स्थिति दुर्गादास के सामने रही। पांडवों ने तो छुपकर समय बिताया लेकिन दुर्गादास तो एक दिन भी छुपकर नहीं रहा, अपनी तलवार की धार पर जरूरतमंदों की सहायता करता रहा एवं मुगलों का सुख-चैन काफूर करता रहा-

बारह बरसां बीह, वन पांडव अछता वुहा।
दुरगो हेको दीह, अछतो रयौ न आसउत।।

वीरवर दुर्गादास राठौड़ का जन्म संवत 1695 वि में द्वितीय श्रावण मास की सुदी चवदस सोमवार को गांव सालवा (मारवाड़) में हुआ। इनकी मां भटियाणी थीं तथा पिता आसकरण नींबावत। जोधपुर के संस्थापक राव जोधा के भाई थे करन। करन से राठौड़ों की करनोत शाखा चली। करन का पड़पोता नींबा राठौड़ था। उनका बेटा आसकरण तथा पोता दुर्गादास हुआ। दुर्गादास इस मरुभूमि का महापराक्रमी सपूत तथा सफल राजनीतिज्ञ था, जिसने अपनी भुजाओं के बल पर मारवाड़ की आन-बान एवं शान को अक्षुण्ण रखा। ऐसे दैदीप्यमान नक्षत्र को नमन करते हुए कवि तेजसी सांदू ने लिखा-

दुरगादास वखांणियो, तद जोधाण तखत्त।
जणणी किण जायो नहीं, नर तो जिसो नखत्त।।

अपनी 80 वर्ष तीन महीने एवं 28 दिन की लंबी जीवन यात्रा में दुर्गादास ने अपने व्यक्तित्व एवं कृतित्व से अनेक कीर्तिमान स्थापित किए। वे कभी राजगद्दी पर नहीं बैठै लेकिन कितने राजा हैं, जो लोगां के दिलों पर राज करते हैं? दुर्गादास उन सौभाग्यशाली लोगों में से हैं, जो जनमानस पर युगों-युगों तक निष्कंटक राज करते हैं। अनुपम वीरता, धीरता, न्यायप्रियता, आत्म सम्मान, त्याग एवं बलिदान से परिपूर्ण व्यक्तित्व के धनी दुर्गादास के व्यक्तित्व को उजागर करती कवि नारायणसिंह शिवाकर के ये पंक्तियां बरबस ही पाठक के मन में उस वीर क्षत्रिय के प्रति अगाध श्रद्धा के भाव पैदा करती है-

निरलोभी निरभै निडर, रीझ खीज इक रास।
प्रजापाळ पणपाळ नर, दीठो दुरगादास।।
डोढी दुरगादास री, रहै खुली दिन रात।
दीन दुखी फरियाद ले, जाय छतीसूं जात।।
बूढो ठाडो मिनख जो, मारग में मिल जाय।
दुरगो आदर देय नै, बाबो कह बतळाय।।

वीरवर दुर्गादास का जीवन अनेक वरेण्य गुणों का समुच्चय है। संवदेना, स्वामिभक्ति, प्रणपालन, अन्याय का प्रतिकार, संयम आदि अनेक ऐसे गुण हैं, जिनको उन्होंने अपने आचरण से पुष्ट किया है। किशोरावस्था में जब वे अपनी मां के साथ लुणावा गांव में रह रहे थे, उस समय की एक घटना लोगों में काफी प्रचलित है। दुर्गादास ने देखा कि राज के रेबारी ऊंटों का टोळा यानी समूह लेकर गांव में आए तथा सत्तामद में अंधे होकर ग्रामीणों के खेतों मे उन ऊंटों को खुला छोड़ दिया। ऊंटों ने जब खेत में फसल नष्ट करनी शुरु की तो खेत के मालिक ने राज के रेबारियों को ऊंट बाहर ले जाने हेतु कहा। इस दौरान किसान एवं रेबारियों के मध्य बात बढ़ गई। रेबारियों ने ऊंट बाहर निकालने की बजाय किसान को पीटना शुरु कर दिया। तेजस्वी किशोर दुर्गादास इस पूरे घटनाक्रम को देख रहे थे। उनसे ये घटना सहन नहीं हुई। यद्यपि वे ऊंट दुर्गादास के खेत में नहीं चर रहे थे और ना ही वह किसान दुर्गादास का कोई भाई-भतीजा था लेकिन जिसकी रगों में क्षत्रियत्व का रक्त प्रवाहित हो रहा होता है, वह अन्याय को देखकर खौल उठता है, वही हुआ। दुर्गादास ने आव देखा न ताव। रेबारियों से जा भिड़े और देखते ही देखते एक का सिर धड़ से अलग कर दिया। ऐसे ही सुदृढ संकल्पी महापुरुषों के सुकृत सातत्य का ही परिणाम है कि भारत की धरती पर ‘असही को नहीं सहने’ की परंपरा बनी। कवि ‘समन’ ने कहा कि दूसरे के बाग में भी यदि गधे दाख खा रहे हों तो (यद्यपि हमारा व्यक्तिगत कुछ नुकशान नहीं है फिर भी) वह हमसे सहन नहीं होता-

समन पराए बाग में, दाख तोड़ खर खाय।
अपना कछु बिगरत नहीं, (पर) असही सही न जाय।।

रेबारियों के साथ घटी इस घटना का राज दरबार को पता चला। दुर्गादास को दरबार में बुलाया गया। पूछने पर जो कुछ जैसा हुआ, वैसा ही जबाब दुर्गादास ने पूर्ण निडरता एवं विश्वास के साथ दिया। लोगों ने सोचा दरबार दुर्गादास को दंडित करेंगे लेकिन उस वीर युवा की निडरता एवं न्यायप्रियता ने महाराजा साहब जसवंतसिंह जी को गदगद कर दिया। उन्होंने दुर्गादास को अपनी सेवा में रख लिया। उसके बाद दुर्गादास जसवंतसिंहजी के साथ ही रहे। वे उनके साथ दक्षिण में, गुजरात में तथा काबुल में सब जगह सेवा में रहे। जसवंतसिंहजी की मृत्यु के साथ ही दुर्गादास के संघर्ष का जीवन शुरु हुआ, जिसने अंत तक रुकने का नाम ही नहीं लिया। लेकिन दुर्गादास विपत्तियों से घबराने वाला व्यक्ति नहीं था। उन्होंने विपत्तियों से ऐसा सामना किया कि दुनियां के सामने उदाहरण बन गया। जैसे-जैसे दुर्गादास का व्यक्तित्व विपत्तियों की आग में तपता गया, वैसे-वैसे वह कुंदन की तरह निखरता गया। कवि शिवाकर तो यहां तक कहते हैं कि धरती पर जितने सुयोग्य नररत्न हुए हैं, वे विखो यानी विपत्तियों से संघर्ष के बाद ही विख्यात हुए हैं, (इतिहास में ऐसे अनगिन उदाहरण है, जिनका उल्लेख विस्तार भय से नहीं करना चाहूंगा)-

बाबाजी हंस बोलिया, वना जाणलो वात।
जोगा नर जितरा हुवा, विखो भुगत विख्यात।।

जोधपुर के किले महरानगढ़ में वीवर दुर्गादास राठौड़ की एक बड़ी प्रतिमा लगी हुई है, उसके नीचे मायड़भाषा राजस्थानी के दोहे उत्कीर्ण है। दोनो ंही दोहे चारण कवियों के लिखे हुए हैं। पहला दोहा दुर्गादास के समकालीन कवि तेजसी सांदू द्वारा तथा दूसरा दोहा आधुनिक राजस्थानी साहित्य के शिखर-पुरुष कविश्रेष्ठ डॉ.शक्तिदान कविया कृत है। संस्कारों की सीर को सदियों तक सरस रखने वाली इस काव्य परंपरा की बलिहारी देखिए दोनों कवियों ने दुर्गादास के त्याग एवं संघर्ष को रेखांकित कर गुणपूजा के आदि-संकल्प को साकार किया।

जसवंत कहियो जोय, गढ़ रखवाळो गूदड़ा।
साची पारख सोय, आछी कीनी आसउत।।
~~तेजसी सांदू

सुवरण थाळां नृप सदा, जीमै जिनस अनेक।
अस चढियो दुरगो उठै, सेलां रोटी सेक।।
~~डॉ.शक्तिदान कविया

कवि डॉ.शक्तिदान कविया लिखते हैं कि राजे-महाराजे जहां स्वर्ण-थाल सजाकर अनेक भांति के व्यंजन आरोगते हैं, वहां वीरवर दुर्गादास अपने घोड़े पर सवार होकर इतनी व्यस्ततम एवं जोखिमभरी जिंदगी जीता है कि अपने लिए रोटी सेंकने के लिए भी अपने भाले को ही काम में लेता है। इसी बात को डिंगल के आधुनिक कवि सोहनदान सिंहढायच ने इन शब्दों में लिखा और कहा कि दुर्गादास ने तो अपनी रोटी सेंकने के लिए आग भी श्मशान भूमि में जलती चिताओं की ही काम में ली अभिप्राय यह कि कितना संघर्षशील जीवन रहा होगा उस वीर का-

कस्यो पिलाण खैंग पे, हस्यो चढ्यो हमेस ही।
रम्योज औरंगेस सूं, भम्यो सुदेस देस ही।
सुसेल रोट सेकियो, ले बासते मसाण रो।
जुट्यो जवान जंग में, सुतान आसतान रो।।
~~सोहनदान सिंहढायच।।

जरा सी विपत्त आते ही बौखला कर अपनी चाल चूक जाने वाले लोगों के लिए दुर्गादास राठौड़ का जीवन एक अनुकरणीय उदाहरण है। उन्होंने अपनी स्वामिभक्ति की साख को बचाने के लिए कदम-कदम पर कठिन परीक्षाएं दीं लेकिन एक पल के लिए भी उनके कदम डगमगाए नहीं। अपने स्वामी जसवंतसिंह की जमरूद-काबुल में अकस्मात मृत्यु के असहनीय आघात के बावजूद दुर्गादास ने अपनी दृढ़ता को बनाए रखा। उन्होंने जसवंतसिंहजी की दोनों गर्भवती रानियों को सती होने से रोकने के साथ ही काबुल से सुरक्षित जोधपुर लाने के यत्न किए। रास्ते में दोनों रानियो ने लाहोर में एक ही दिन एक-एक पुत्रों को जन्म दिया। नरूकी रानी के गर्भ से पैदा पुत्र दलथंभन का तो यात्रा के दौरान ही देहावसान हो गया लेकिन जादव रानी के पुत्र अजीतसिंह को सकुशल मारवाड़ लाने का काम दुर्गादास ने किया। लेकिन विपत्तियां जब आती हैं तो चारों ओर से आती है। औरंगजेब ने जोधपुर में दखल कर ली तो दुर्गादास ने अपनी सूझबूझ से मेवाड़ के महाराणा राजसिंह से बालक अजीतसिंह को शरण में लेने एवं संरक्षण देने का निवेदन कर अपना फर्ज अदा किया। वहीं से संघर्ष को अनवरत जारी रखते हुए अजीतसिंह को उसका पैतृक राज्य वापस दिलाने हेतु दुर्गादास ने मारवाड़ के अलग-अलग ठिकानों पर आक्रमण शुरु किए तथा मुगलों के नाक में दम कर दिया। न केवल मारवाड़ वरन मेवाड़ में भी जब महाराणा राजसिंह के स्वर्गारोहण के बाद अस्थिरता आई तो दुर्गादास ने वहां पहुंच कर जयसिंह का राजतिलक करवाने में अहम भूमिका निभाई। जब शिवाजी का स्वर्गवास हुआ तब भी दुर्गादास उनके बेटे शंभाजी की सहायतार्थ दक्षिण में भी गए तथा अपनी दूरदृष्टि के बल पर राजपूत एवं मराठों को एकजुट करके मुगलों के विरुद्ध प्रबल मोर्चा खोलने का संकल्प किया। औरंगजेब ने दुर्गादास को पकड़ने के लिए बहुत प्रयास किए लेकिन उसे सफलता नहीं मिली। अपनी छापामार युद्धपद्धति के बल पर दुर्गादास ने मुगलों को खूब छकाया।

मुगलों से इतना गहन विरोध होने के बावजूद भी दुर्गादास ने अपने क्षत्रियत्व की चारित्रिक उच्चता एवं न्यायोचित व्यवहार को कभी भुलाया नहीं। इसका उदाहरण है बादशाह औरंगजेब के पौत्र बुलंदअख्तर एवं पौत्री सफीयतुन्निसा के साथ दुर्गादास का व्यवहार। औरंगजेब के पुत्र शाहजादा अकबर ने अपने पिता से विद्रोह कर दिया और राजपूतों के साथ हो गया था। उसने अपने पुत्र एवं पुत्री बुलंदअख्तर एवं सफीयतुन्निसा की सुरक्षा हेतु दुर्गादास से आग्रह किया था। इन दोनों की परवरिश में दुर्गादास ने जिस उत्तम चरित्र एवं सांप्रदायिक सद्भाव का परचिय दिया, उसने मानवीयता की मिसाल कायम की। दुर्गादास ने न केवल बुलंदअख्तर एवं सफीयतुन्निसा की सुरक्षा की वरन इस्लाम रीति-नीति से उनके अध्ययन-अध्यापन की व्यवस्था भी की। जब औरंगजेब को यह तथ्य ध्यान में आया तो दुर्गादास की उदारता एवं मानवीयता को देखकर गौरंगजेब को भी मानना पड़ा कि दुर्गादास जैसा दुश्मन नहीं है तो दुर्गादास जैसा मित्र भी कोई दूसरा नहीं हो सकता। राजस्थानी डिंगल के एक पुराने गीत की ये पंक्तियां दुष्टव्य है-

अहलोके विखै जांणियो औरंग, पूगी मन एही पारीख।
दुसमण नको सरीखो दुरगा, सैण न को दुरगा सारीख।।

संघर्ष रुका नहीं। दक्षिण भारत से वापस आए तो मारवाड़ में राड़ तैयार मिली। अजीतसिंह दुर्गादास के प्रभाव एवं यश से ईर्ष्या रखने लगे थे। महाराजा अजीतसिंह और दुर्गादास के बीच मनमुटाव एवं टकराव की स्थितियां बन गई। एक दिन भी आराम शायद कुंडली में लिखा ही नहीं था। अनुभवी कवियों एवं शायरों ने ठीक ही लिखा है कि अपने उसूलों से समझोते नहीं करने वाले लोगों को सांसारिक सुख कम ही नसीब होता है। वही दुर्गादास के साथ हुआ। उसूलों पर आई आंच को कभी सहन नहीं किया और गाअे से आगे टकराव की स्थितियां बनती गईं लेकिन वही उसूल वही अनोखी आन एवं वरदान बा नही तो उनकी शान का कारण बनी। औरंगजेब ने दुर्गादास को अनेक षड़यंत्रों के माध्यम से मरवाना चाहा लेकिन संभव नहीं हुआ। लंबे जीवन की लंबी कहानी है और इस कहानी की हर घटना के पीछे एक अन्य कहानी है, जिसे पढ़ने एवं जानने के लिए लोक की बातों, ख्यातों, गीतों एवं रीतों को समझना पड़ता है। जीवन उत्तरार्द्ध में दुर्गादास मारवाड़ को छोड़कर सुख एवं सम्मानपूर्ण जीवन जीने की आशा में उदयपुर चले गए और कभी लौट कर मारवाड़ नहीं आए। मारवाड़ से वे उज्जैन गए, जहां भगवान का ध्यान लगाते समय संवत 1775 मिंगसर सुदी 11 शनिवार को उनका देहावसान हुआ। वहीं सिप्रा नदी के तट पर उनकी पार्थिव देह का अंतिम संस्कार किया गया। दुर्गादास की जीवटता एवं गंभीरता का प्रमाण यह है कि उन्होंने अपने क्षत्रियत्व धर्म को एक पल के लिए भी विस्मृत नहीं होने दिया। राजस्थानी साहित्य-रत्न डॉ़. नारायणसिंह भाटी अपनी कृति ‘दुरगादास’ में लिखते हैं कि दुर्गादास किसी जाति विशेष के दुश्मन नहीं थे वरन उनकी मातृभूमि पर हमला करने वाला हर व्यक्ति उनका दुश्मन था और दुर्गादास का दुधारा उन लोगों का सामना करने के लिए ही चमकता रहा-

दोयण कुण थारा दुरगादास ?
दोयण मां भोम रा तूझ दोयण।

आजीवन मन, वचन एवं कर्म से निष्कलंक रहने वाला वीर दुर्गादास मानवीयता का महान पुजारी था। अपनी तलवार एवं भाले के बल पर उन्होंने अनेक आतताइयों को मौत के घाट उतार कर मातृभूमि की चूनड़ी को सुर्ख़ रंग से रंगने का अहम कार्य किया लेकिन इतने लंबे समय तक के युद्धों के बावजूद उनकी हथेलियों पर अमानुषिक हत्या के खून की एक बूंद तक नहीं लगी। उज्ज्वल एवं निष्कलंक चरित्र पर मोद भरती कवि नारायणसिंह भाटी की कलम से सृजित ये पंक्तियां देखिए-

अस रा असवार ऊजळा/रह्यो ऊजळै वागां
ऊजळी खांगां/ ऊजळै मनां/ राखियो खत ऊजळो
पण असल रंगरेज आस-रा/ थें रंगियो कसूंबल धरा पोमचो
बिनां रंग रंगियां।

ऐसे अनुकरणीय व्यक्तित्व के धनी वीरवर दुर्गादास का जीवन आज की आपाधापी वाली, अधीरता से डगमगाती, नीतिपथ से किनारा करती, परंपरा से मुंह फेरती, स्वारथ से स्नेह बढाती, अनीति से आंख मूंदती, परदुख एंव परपीड़ा देखकर नहीं पिघलती नयी पीढ़ी के लिए जीवटता एवं जीवनमूल्यों को पुनः प्रतिष्ठापित करने वाला साबित हो सकता है। ऐसे महानायकों के जीवन का एक-एक पहलू प्रेरणास्पद होता है। यही कारण है कि महाकवि केसरीसिंह बारहठ (सोन्याणा) ‘दुर्गादास-चरित्र’ नामक अपने ऐतिहासिक पिंगल-प्रबंध काव्य में भगवान से यह प्रार्थना करते हैं कि हे कृपानिधान! हमारी देवियों यानी माताओं को ऐसी शक्ति देना, जिससे वे दुर्गादास जैसे सपूतों को जन्म देती रहे-

देविन को ऐसी शक्ति दीजिए कृपानिधान,
दुर्गदास जैसे माता पूत जनिबो करें।

ऐसी हूतात्माओं के चरित्र पर जितना लिखो, उतना कम है। लेखनी लगातार लिखते रहना चाहती है लेकिन विस्तार भय से अपने विचारों की शृंखला को समापन की ओर ले जाते हुए ध्रुव तारे की तरह अटल आलोकित, स्वामिभक्ति के सिरमौर, मानवता के महनीय पुजारी, शौर्य के सबल अवतार तथा नेतृत्व क्षमता के नायाब नायक वीरवर दुर्गादास को कवि नारायण सिंह शिवाकर के इन दोहों के माध्यम से नमन करते हुए श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं-

ऊगा नखतर आथिया, जोधाणै इतिहास।
एकज ध्रुव तारो अटळ, दीठो दुरगादास।।

राजवंस नैं राखियो, स्यांम धरम मरुदेस।
बदळा में राखी नहीं, दो गज धर दुरगेस।।

~~डॉ.गजादान चारण “शक्तिसुत”

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *