मानवकल्याण रै चिंतन रो सुभग संदेशः वेदार्थ चिंतामणि

संत महात्मावां रो एकमेव ध्येय हुवै कै किणगत जगत रो कल्याण कर्यो जावै? ओ इज कारण है कै ऋषि-मुनि जन-जन तक आपरो संचित ज्ञान, दर्शण, अर विचारां नै प्रचार-प्रसार सूं पूगावता रह्या है।

आपांरी अमोल धरोहर है देववाणी में रचियो प्रगल़ो साहित्य। क्यूंकै इणी रै पाण आपांरी सांस्कृतिक चेतना अर आध्यात्मिक गौरव अजै तांई कायम है। इण गौरव अर चेतना नै कदीमी कायम राखण में आपांरै इण संस्कृत रै गौरव ग्रंथां रो महताऊ योगदान रह्यो है। इण गौरव नै समझण अर उद्घाटण करण रो काम आमजन रै बूतै सूं बारै है। क्यूंकै इण रै मर्म नै जाणण सारू जिण प्रज्ञा अर पांडित्य रो हुवणो चाहीजै वो आम आदमी में मिलणो आंझो है। पण विद्वानां संस्कृत साहित्य रो अनुशीलन इण ध्येय साथै कियो कै इणरो लाभ जन-जन तक पूगणो चाहीजै।

जन जन तक पूगण रो एकमेव जरियो हुवै लोकवाणी। अतः संतां जनकल्याण रै सारू आपरै इण अर्जित ज्ञान नै लोकवाणी में अभिव्यक्त कियो ताकि उणांरी मेहनत रो फल़ सर्वसाधारण सारू फल़दायक सिद्ध हुय सकै। इण बात नै दीठगत राखतां थकां आपांरै मनीषियां आपरी आध्यात्मिक अनुभूतियां नै सहज अर सुगम बणायर जनभाषा में अभिव्यक्त करी ताकि उणां रो सुभग संदेश नेस-नेस तक पूग सकै।

सही ई है कै झीणी सूं झीणी कै ऊंडी सूं ऊंडी बात रो मर्म कोई पण आदमी मातृभाषा रै आंटै सूं ई सहज समझ सकै उतरी किणी पण दूजी भाषा रै माध्यम सूं नीं। मूढ सूं मूढ रै गूढ बात ठेठ काल़जै री कोर तांई पूगै ऐड़ी भाषा रो प्रयोग फखत संतजन ई कर सकै क्यूंकै उणां रो धरण माथै अवतरण ई परमार्थ सारू ई हुवै। भलांई मूर्ख नै गहरी बात समझावणी उतरी ईज आंझी है जितरो सूरज नै धरा माथै लावणो-

कविता समझाइबो मूढन को
सविता गहि भूमि पे डारिबो है।

पण संत इतरी अबढी बात नै ई सहज कर दिखावै। क्यूंकै वै आम आदमी री व्यथा-कथा अर उणरी ऊरमा नै जाणै। दादू इण काम नै अबखो मानियो है। वै लिखै कै ‘मथै सो माखण काढै, बकणिया नीं। अर्थात बकणिया तो बो’ल़ा है पण सार काढणिया आंगल़ियां माथै गिणावै जितराक-

दादू बकता बोत है, मथ काढै ते और।

मंथन कर’र जिकी पोथी लिखीजै वा पोथी ईज सैण रै दांई सुख देवण वाल़ी, मनरंजण वाल़ी हरिभजन में लीण करण वाल़ी अर दुखां रा दिन कटावण वाल़ी सिद्ध हुवै-

पोथी उत्तम पेखियां, सज्जन ज्यूं दे सुक्ख।
मनरंजण माधव मिलण, दिनह कटावण दुक्ख।।

आपांरै महताऊ ग्रंथां रो मंथण कर’र मानखै सारू ज्ञान रूपी माखणियो काढणिया एक महात्मा हुया है परमहंस स्वामी माधवानंदजी। उणां गुजराती में एक पोथी लिखी ‘वेदार्थ चिंतामणि‘। आ पोथी राजर्षि नाहरसिंहजी तेमावास पढी तो इणां नै लागो कै ऐड़ी जनकल्याणकारी पोथी राजस्थानी मानखै रै हाथां पूगणी चाहीजै ताकि ऐ ई आपरो कल्याणकारी मार्ग चुण आपरो हिंत चिंतन कर सकै। इणी पावन ध्येय नै दीठगत राख’र आप इण पोथी रो राजस्थानी में अनुवाद कियो।

निसंदेह मानव कल्याण करण वाल़ी आ पोथी आम मिनख सारू अंवेरणजोग है। नाहरसिंहजी नै लागो कै वेदार्थ जैड़ै गूढ विषय नै बोधगम्य बणाय’र आमजन तांई पूगायो जावै ताकि ईसरदासजी बारठ रा ऐ भाव फलिभूत हुय सकै तो साथै ई ऋषि ऋण परिशोध रो काम ई साधियो जा सकै-

भाग वडा तो राम भज, दिवस वडा कछु देह।
अकल वडी उपकार कर, देह धर्यां फल़ ऐह।।

आप आपरी रै अकल रै परवाण इण गहन ज्ञान नै सुबोध राजस्थानी में अनुदित कर’र एक महताऊ काम सिद्ध कियो है। ओ काम आपरी राजस्थानी रै पेटै एकनिष्ठ भाव अर सद्साहित्य रै प्रति लगाव ई कह्यो जा सकै कै आप मीरां री लगन रै दांई मगन हुय इण काम नै सिरै चाढियो-

ऐसी लागी लगन, मीरां हो गई मगन।
वो तो गली गली हरी गुन गाने लगी।

आपरै इण समर्पित भावां नै देखतां थकां उत्तमचंदजी भंडारी रो ओ दूहो आप माथै सटीक बेठै जिको उणां रघुनाथ रूपक रा रचयिता मनसारामजी सेवग सारू कह्यो-

मनसाराम प्रबंध मंझ, राखै मनसा राम।
कियो भलो हिज काम कवि, कियो भलो हिज काम।।

स्वामीजी रै मूल़ भावां अर भाषा री खेवटा करतां थकां आप मिनखमात्र रै सारू कल्याणकारी ऐ बातां राजस्थानी में आपां तांइ पूगाई ताकि मातृभाषा नै ईज बोलण अर समझण वाल़ां तांई ऐड़ी गूढार्थ बातां सरल़ार्थ में पूग सकै अर ऐ ई सुख सूं जीवण यापण करण री जुगत जाण सकै। साथै ई उण बातां सूं बचाव रा उपाय ई कर सकै जिकी जगत कल्याणकारी नीं है अथवा मानवमात्र रै सारू हाणदायक है। अतः जीवण नै सुचारू रूप में बितावण रा जिकै सुभग साधन अर सन्मार्ग है उणांनै अपणाय सकै।

कुल 27अध्यायां में प्रणीत इण पोथी में वै सगल़ी बातां समाहित है जिकी इहलोक अर परलोक नै सुधारण वाल़ी है। अतः संक्षेप में इण विषय माथै सार रूप चर्चा करणी समीचीन लखावै। सदाचार सुख रो आधार मानियो गयो है। ओ ई कारण है कै काछ द्रढो अर वाच रो साचड़ियो मिनख सदैव समादृत रह्यो है। कवि कृपारामजी कैवै-

द्रढ काछ वाच साचा दखै,
दिल सुद्ध हुय रंग दीजिए।

आपांरै कवियां कह्यो है कै शील सबसूं बडो सत अर कुशील सबसूं बडो मल़ है। इणीगत लोभ सबसूं बडो दुख अर संतोष सबसूं बडो सुख है-

लोभ हूं सो दुख है न सुख है न संतोष हूं सो
सील सो न सत्त है न कुशील सो न मल है।

तृष्णा नै आपांरै महात्मावां ई परड़(एक प्रकार का साप) अर मिनड़ी री संज्ञा सूं अभिहित करी है-

आशा पदमण नागणी,
परड़ तिरसणा जुग खायो। (कानूजी)
***
जुग आशा नागणी,
मींढ त्रसणा मंजारी। (ईसरदासजी दधवाड़िया)

लोककवियां ई लिखियो है कै मन रूपी आकाश में जितैतक संतोष रूपी सूरज नीं ऊगै जितै तांई आ काल़ी रात नीं कटै-

उर नभ जितै न ऊगमै, ओ संतोष आदीत।
नर त्रिसणा क्रिसणा निसा, मिटै उतै नह मीत।।

पण संतोष रूपी धन पावणो सबसूं कठण काम है। शायर मिनखां कह्यो है कै लोभ नै जीतणो सबसूं भयंकर जुद्ध है-

ऐसे नाहीं देखै जाकै लोभ नाहीं मनमें।

पण जको तृष्णा नै जीतलै वो ईज जगत रो बेताज पातसाह बाजै।

क्षमा नै भूषण मानियो गयो है। महात्मावां लिखियो है कै क्षमा करणियो सबल़ हुवणो चाहीजै। बिनां जैर फण फणकारणिये फणधारी री कोइ गिनर नीं करै। जणै ई तो कह्यो गयो है सबल में क्षमाशीलता, धनवान में गर्वहीनता अर विद्याधर में विनयशीलता गुण है-

सबल़ खिम्या निगर्व धनी, कोमल़ विद्यावंत।
भू-भूषण गुण तीन है, अवगुण और अनंत।।

किणी नै ई गर्व नीं राखणो क्यूंकै जिकी चीज गल़णहार है उण माथै मगरीजणो मूढता है-

गरव सरव रो गल़तो दीठो।

घमंड भलांइ किणीगत रो हुवै पण रैवै नीं। इण सारू ई ओपाजी कह्यो है-

कव ओप अग्यानी नर कहै,
नवां री तैरा करां।

रूप, रंग, जोबन आद दिन-दिन छीझण वाल़ी चीजां है, जणै ई इणां नै पावणा कह्या गया है, आखिर इणांनै विदा हुवणो पड़ै-

घट’र गयो घरेह
जोबन रा करती जतन।

पाप सूं प्रीत कर आंधै भिड़ज(घोड़ा) चढ’र ऊंधकरम करणियै री खबर मोटो खांमध राख रह्यो है। कवेसरां कह्यो है कै ऐड़ा मिनख दीखती खाड में जाणबूझर जरकीज रह्या है। भीखजी रतनू लिखै-

चलै अत गाढ में भिड़ज आंधै चढै,
दीखती खाड में पड़ै देखो।

मतलब ओ है कै मिनख रा किया कर्म ई साथै चालसी-

किया कर्म चालसी साथ भीखो कहै,
घालसी जमां रा दूत घेरो।

अतः सदैव सत्कर्म अर साधू री सत्संग करणी चाहीजै-

सतसंगत बैठ करो चरचा,
घर माफक दान करो अन्न का।

सदैव सत्य बोलो क्यूंकै कूड़ै पत्त न काय। अर्थात कूड़ री कोई पत्त नीं हुवै। सत्त माथै बिनां थांभै आकाश खड़ो है। साच सांई नै ई प्रिय है। इणनै साप ई खा नीं सकै-

साच पियारी सांइया, साचां सरप न खाय।

महाजनां कह्यो है कै साच जैड़ो भूषण अर झूठ जैड़ो दूषण दूजो नीं है। इणीगत दया सो धर्म अर उपकार जैड़ो दूजो फल़ नीं है-

साच सो न भूखन है न दूखन झूठ हूं सो,
दया सो न धर्म है न उपकार सो न फल है।

इणमें कोई संशय नीं है कै आप रै आचार-विचार माथै संगत रो फल़ अवस पड़सी। “गोरिये कनै काल़ियो बैठसी जणै रंग नीं तो अकल तो अवस आवसी।” “संगत लहै सुधार, रूंखां नै ई राजिया।” इणी खातर तो कह्यो गयो है कै “संगत बडां री कीजिए।” जणै ई तो आपां रा कवेसरां कह्यो है कै बडेरां अर ज्ञानियां री संगत करो। उणां रो आदर करो। इणसूं करणीय अकरणीय रो निर्णय लेवण री खिमता बधैली। आपां रो फर्ज है कै सदैव जोगै नै जोगो स्वीकारां। जोगतै रो आदर करां। जको जसजोग काम करै उणांनै अंतस सूं अंगेजां-

हितकर जोड़ै हाथ, आयां रो आदर करै।
जलम्या जस री रात, साची बातां शंकरा।।

सदैव विनय भाव रा राखो क्यूंकै निंवणियो मोटो हुवै। विनयशीलता सूं हर एक रो दिल जीतियो जा सकै। पण आपरी बडाई खुदोखुद नीं करणी। बूठैड़ो री बात बटाऊ आपै ई कैयदे। जद आप उपकार करोला तो संसार सरावैला अर जे आप मतोमती बडाई करोला तो महापातकी बाजोला क्यूंकै आपरी बडाई आपै करणी मरण रो मार्ग मानियो गयो है।

मिनखपणै रै निर्माण अर संचालन में नीति रो महताऊ योगदान है। क्यूंकै संसार रूपी वृक्ष रा दो फल़ स्वादु मानिया गया है। एक तो सुभाषित अर दूजी सत्संग-

संसारे विष वृक्षस्य द्वे फलSमृतोपमे।
सुभाषितं च सुस्वादु संगतिःसुजने जने।।

इणी सारू तो चिमनजी दधवाड़िया कह्यो है कै-

अपनो निज सज्जन व्है उनको, नित सीख नसीहत देबो करो।

मिनख रूपी भवन री नीति नीव मानी गई है। जितरी नींव ऊंडी हुवैला उतरो ईज भवन अडिग हुवैला। नीति ई भलो-बुरो, स्वार्थ-परमार्थ, वंदन-निंदन, धर्म-अधर्म, साच-कूड़, जोगो-नाजोगो आद रो निर्णय करण री आधारभूमि है। नीति मार्ग बैवणिया कदै ई इण मार्ग सूं विचलित नीं हुवै ज्यूं मूर्ख कनै धन देख’र गरीब विद्वान आपरी विद्वता नीं तजै उणीगत गणिका रा गैणा देखर शीलवान स्त्री लोभाय’र आपरी शीलता नीं तजै-

पंडत विद्या न परहरै, मूरख धन अवरेख।
सुल़टा तजै न शीलता, कुल़टा भूषण देख।।

जदै ई तो नीतिवान री लात ई सुहावै अर मूर्ख री बात अणखावणी लागै-

चातुर की लातें भली, क्या मूरख की बात।
बातें लागै लातसी, लातें लागै बात।।

‘मांगण मरण समान है।’ मांगणो मरणै सूं ई दोरो है। ओ ई कारण है कै समझणै मिनखां हेलो कर’र कह्यो है कै ‘कोई मत मांगो भीख।’ मांगणियो कितो ई मोटो हुवो पण मूंडै सूं दे कैवतां ई घटग्यो। खुद विष्णु बावनियो हुयग्यो हो पछै दूजै री कांई जिनात है-
मांग्यां पायो हे सखी, तब फूलत है गात।
तीन बहंत को बावनो, तीन लोक न मात।।

केवसरां तो साफ कह्यो है कै मांगतां ई मरजादा, महत्ता, आपसी प्रेम, गर्व, अर नेह सब कुछ मिट जावै-

माम महातम प्रेम रस, गरवा तन अर नेह।
ऐ पांचूं अहला गया, जब कह्यो कछु देह।।

स्वामीजी लिखै कै क्षत्रिय नै सदैव आपरै धर्म रो पाल़ण करणो चाहीजै तो राजपुत्र नै ई आपरो धर्म नीं छोडणो चाहीजै। भलांई बखत विटल़ रह्यो हुवै कै मिनख सिटल़ रह्या हुवै पण इण दोनां नै आपरै धर्म निभावण में अड़ीखंभ रैणो चाहीजै।

सेवट में स्वामीजी घोड़ां रै गुण-अवगुणां अर गऊ माता रो लोक जीवन में महात्म्य सूं अवगत कराया है। आपांरै अठै कह्यो गयो है कै ‘बल़धां खेती घोड़ां ! राज, मरदां सरै पराया काज!!’ तो साथै ई कह्यो गयो है कै ‘पोड़ बंकी घोड़ियां।’ घोड़ां रा शुभ-अशुभ लखण बताया गया है। आपांरै काव्य में घोड़ां रा घणा बखाण मिलै। किणी कवेसर नै बीकानेर रा महाराजकुमार अनोपसिंहजी एक सुंदर, सुडौल़ अर तातो तुरंग दियो। उण रा बखाण करतां उण कवेसर घोड़ां री जातां उणां रा शुभ लखण अर चाल चरित्र आद रा सजोरा बखाण किया-

कहि पंचकलांण मँजार कबूतर
दीप प्रमांण कमेत दिपे।
हँस बोर वरांण गँगाजल़ हैवर,
अंगन ऊब विनांण अपै।
भिद कंठ केकांण पलावण भम्मर,
तव्वज रंग बखांण तिसो।
महाराजकुमार अनोप महाबल़़,
जास दिए वरहास तिको।।

राजस्थान री संस्कृति में गाय रो जको महत्व रह्यो है उतरो दूजै चौपायां रो नीं। अनेकूं ऐड़ा राजपूत अर बीजी जातां रा वीर गायां री रक्षार्थ वीरगत पायग्या जिणां रा आपां आज नाम ई नीं जाणां। पाबूजी राठौड़ री कथा तो आपां सगल़ा जाणां पण सोमसी भाटी, पनराज भाटी, जैत रतनू, मूल़जी भाटी, अन्ना-बदरा भाटी, ईसर मोयल, तेजाजी, बिग्गाजी आद सपूत गायां री रक्षार्थ जूंझर इण दूहै नै सार्थकता देयग्या-

रिव ऊगां ससि कुंडल़ां, ताता खंभ थयाह।
छत्री पाणी नह पियै, गायां घेर लियांह।।

ईसर मोयल साधारण राजपूत हो पण असाधारण वीर हो। उण गायां री रक्षार्थ जकी वीरता बताई वा आज ई अमर है-

पड़ियां पछै धेन ली पैला,
ऊभां पगां न दीधी एक।
चवती खुरी धेन घर चाली,
टूक टूक ऊपर पग टेक।।

ओ ई कारण है कै आज ई जनकंठां में उणरी ढाणी वंदनीय मानीजै-

रंग गंगा रै पाणी नै
रंग ईसर री ढाणी नै।

सेवट में राजर्षि नाहरसिंहजी नै पुनः इण बात सारू रंग देवूं कै ऐ जे इतरी अजरी(अच्छी) पोथी रो राजस्थानी अनुवाद नीं करता तो इण पेटै रुचि राखणिया राजस्थानी पाठक इण अमोल ज्ञान सूं वंचित ई रैवता। आप राजस्थानी रा समर्थ अनुवादक हैं। कितरी ई गुजराती पोथ्यां रो सरस अर भावप्रवण राजस्थानी अनुवाद आप कियो है तो साथै ई गीता जैड़ी समादृत पोथी रो ई आप राजस्थानी गद्य अनुवाद कियो है। ताकि आम पाठक लाभान्वित हुय सकै।

अनुवाद पेटै पं. जवाहरलाल नेहरू रो ओ कथन मननजोग है कै- ‘अनुवाद करते समय में अनुवादक को अनुवादित शब्दों के अर्थ उसके सामाजिक भावों के संदर्भ में ज्ञात होने चाहिए। ‘

इणी खातर म्हारी जाण में मूल़ सिरजण सूं अनुवाद आंझो है। क्यूंकै अनुवाद करती बखत अनुवादक नै रचना रै मूल़ भावां, सरोकारां अर संदर्भां तक पूगणो पड़ै। ठाकुर साहब इण काम रा कुशल़ कारीगर है।

आखिर में राजस्थानी साहित्य, संस्कृति अर परंपरावां रै प्रति आपरी प्रीत टोरण री आखड़़ी(प्रण) सूं प्रभावित हुयर म्हैं एक गीत लिख्यो। जको अविकल रूप से दे रह्यो हूं इणमें आपरै व्यक्तित्व अर कृतित्व री कीं बधतायां बतावण री कोशिश करी हूं।

गीत नाहरसिंहजी जसोल रो-

मालाणी मुलक मिनख मन मोटो,
माहेचो मिणधारी।
नेही निछल़ नाहरो नामी,
धुर कीरत रो धारी।।
सरस भाव मिल़ै जी-सोरै,
जग बातां सत जाणी।
पातां प्रीत रीत पुरबली,
उर पाल़ै अमराणी।।
सतवट बह साहित रो सेवी,
रहै सदा इकरंगी।
जाहर नाहर आज जसोलो,
सत पातां रो संगी।।
आछा करम करै उपकारी,
किरीट छत्रियां कोड़ै।
मालो बीजो आज महेचां,
जोय राज-रिख जोड़ै।।
चितसुध मान अमोलख चारण,
धारण की व्रतधारी।
मांझी थल़वट माड मही रा,
साख मरूधर सारी।।
सादै वेस रेहणी सादी,
रजवट रीत रुखाल़ो।
परसै चरण ऊठ नै पातां,
भाव भायां सो भाल़ो।।
सँत माफक रैवै सतधारी,
अध्ययन ईस अराधै।
ख्यातां बात कविता खेवट,
सद मारग नै साधै।।
चारण की चीज देखणो चावो,
सह रजपूत सुणीजो।
सत री सीख बखत सिटल़ी में,
लेस नाहर सूं लीजो।।

म्है अंतस सूं आभारी हूं कै आप म्है जैड़ै अकिंचन नै घणै लाड साथै ओ आदेश दियो कै म्है ई दो ओल़्यां इण अमोल पोथी बाबत लिखूं। इण पोथी माथै लिखण सारू म्हैं किणी पण दीठ सूं जोगतो नीं हुवतां थकां आपरै स्नेह रो लोभ संवरण नीं कर सक्यो। आपनै लागै कै बात पोथी रै विषय रै ओल़ै-दोल़ै ई नीं है तो ई इण बात नै ध्यान में राखर सुधार लिरावजो-

बखतो कव तोछी बुद्धि, इल़ पर कवि अनेक।
कोई दोष मत काढजो, देवी रो जस देख।।

इति शुभम

~~गिरधरदान रतनू “दासोड़ी”
प्राचीन राजस्थानी साहित्य संग्रह संस्थान दासोड़ी, कोलायत, बीकानेर।

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