वीरता किसी की मोहताज नहीं होती !!

डिंगल़ के सुविख्यात कवि नाथूसिंहजीजी महियारिया ने क्या सटीक कहा है-

जो करसी जिणरी हुसी, आसी बिन नू़तीह!
आ नह किणरै बापरी, भगती रजपूतीह!!

अर्थात भक्ति और वीरता किसी की बपौती नहीं होती, यह तो जो प्रदर्शित अथवा करते हैं उनकी होती है। इसमें कोई जाति का कारण नहीं है। इस बात को हम दशरथ मेघवाल के गौरवमयी बलिदान की गाथा के मध्यनजर समझ सकते हैं। जब कालू पेथड़ और सूजा मोयल (दोनो राजपूत) ने करनी जी की गायों का उस समय हरण कर लिया जब वे पूगल राव व अपने ‘धर्म भाई’ शेखा की सहायतार्थ मुलतान गई हुई थी।

दशरथ उनका प्रिय सेवग था, जिनके जिम्मे उनकी गायों की रक्षा का भार था। उधर राजपूत ! इधर मेघवाल! लेकिन वीरता किसकी मोहताज नहीं होती है। उसने उन गौ चोरों को ललकारा ! और अदम्य साहस के साथ उनसे जा भिड़ा। लेकिन यह सही है कि ‘जोधार हारै अर घण जीते!’ यही बात दशरथ के साथ हुई। वह वीर भी अपनी स्वामीभक्ति और वीरता की मिशाल कायम कर गया। गायों की रक्षार्थ जूझता हुआ अपने काम के बल अपना नाम अमर कर गया।

कवियों ने दशरथ की इस वरेण्य वीरता को अपनी वाणी से अमर कर दिया। करनीजी को जैसे ही गायों के हरण और दशरथ के बलिदान का पता चला तो उन्होंने अपने दिव्य गुणों को प्रदर्शित करते हुए संवल़ी का रूप धारण कर कालू पेथड़ को अपने गांव गोगोल़ाव पहुंचने से पहले ही मार दिया- ”बणी चील दो बार।” ‘धावै अर छीलै बिचै, मार लीधो दैत नै।”

करनीजी ने अपने इस प्रिय सेवग के बलिदान को चिरस्थाई बनाए रखने हेतु इस वीर का स्थान अपने हाथों स्थापित करवाया।कवियों ने लिखा –

“दशरथ थान थपायो,पैथड़ आचरणी!!”

इस वीर को सादर नमन।

तस्वीर-साभार -रामचंद्र हितकर खजोड़ा

~~गिरधर दान रतनू “दासोड़ी”

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