वेलि क्रिसन रुकमणी री – महाकवि पृथ्वीराज राठौड़

महाकवि पृथ्वीराज राठौड़ रचित अनुपम प्रबंध काव्य।

भावार्थ – श्री मातु सिंह राठोड़

।।वेलि क्रिसन रुकमणी री।।

छंद वेलियो

।।मंगलाचरण।।
परमेसर प्रणवि, प्रणवि सरसति पुणि
सदगुरु प्रणवि त्रिण्हे तत सार।
मंगळ-रूप गाइजै माहव
चार सु एही मंगळचार।।1।।
परमेश्वर, सरस्वती और सद्गुरु ये तीनों संसार के सारतत्त्व हैं, अतः इन तीनों को प्रणाम करके मंगल रूप श्रीकृष्णा के गुणों का वर्णन किया जाता है। इन चारों का गुणगान ही सर्वश्रेष्ठ मंगलाचरण है।

आरम्भ मैं कियो जेणि उपायौ
गावण गुणनिधि हूं निगुण।
करि कठचीत्र पूतळी निज करि
चीत्रारै लागी चित्रण।।2।।
गुणों के भण्डार जिस ईश्वर ने मुझे जन्म दिया है, गुणहीन होते हुए भी मैं उस सृष्टिकर्ता का गुणगान करने जा रहा हूं। मेरा यह कार्य ऐसा है जैसे लकड़ी से निर्मित कोई प्रतिमां अपने बनाने वाले (निर्माणकर्ता) को ही बनाने की कोशिश करने लगे।

कमळापति तणी कहेवा कीरति
आदर करे जु आदरी।
जाणे वाद मांडियौ जीपण
वागहीण वागेसरी।।3।।
मैंने लक्ष्मीपति भगवान श्रीकृष्ण के यश का आदरपूर्वक गुणगान करना शुरू किया है लेकिन मेरा यह कार्य वैसा ही है जैसे किसी गूंगे व्यक्ति ने (वाणी से रहित होते हुए भी) वाणी की देवी सरस्वती को जीतने का हठ ठान लिया हो।

सरसती न सूझै ताइ तूं सोझै
वाउवा हुऔ कि वाउळौ।
मन सरिसौ धावतौ मूढ़ मन
पहि किम पूजै पांगुळौ।।4।।
(कथा की महत्ता और कवि की असमर्थता) हे मेरे मन! स्वयं सरस्वती भी जिस ईश्वर का यशगान पूरी तरह से नहीं कर पाती है तू उसका वर्णन करना चाहता है। ऐसा लगता है कि या तो तू वाचाल है या तू पागल हो गया है। अरे मूर्ख, एक लंगड़ा व्यक्ति भला मन के समान तेज गति से कैसे दौड़ सकता है ?

जिणि सेस सहस फण फणि फणि बि बि
जीह जीह नवनवौ जस।
तिणि ही पार न पायौ त्रीकम
वयण डेडरां किसौ वस।।5।।
जिस शेषनाग के हजार फण हैं और जो अपने प्रत्येक फण की दो-दो जीभों से ईश्वर के गुणों का नित्य वर्णन करता रहता है, तब भला हमारे जैसे मेंढ़कों की तरह टर्राने वालों की तो सामर्थ्य ही क्या है कि हम ईश्वर के गुणों का पूरी तरह से वर्णन कर सकें।

स्त्रीपति कुण सुमति तूझ गुण जु तवति
तारू कवण जु समुद्र तरै।
पंखी कवण गयण लगि पहुंचै
कवण रंक करि मेरु करै।।6।।
हे लक्ष्मीपति, ऐसा बुद्धिमान कौन है जो तेरे गुणों का पूरी तरह से गान कर सके ? ऐसा व्यक्ति कौन जो अगाध समुद्र को तैर कर पार कर सके? ऐसा पक्षी कौन है जो आकाश की सम्पूर्ण ऊंचाइयों तक पहुंच जाए ? ऐसा दरिद्र कौनसा है जो अपने हाथ में सुमेरु पर्वत को उठा सके ?

जिणि दीध जनम जगि मुखि दे जीहा
क्रिसन जु पोखण भरण करै।
कहण तणो तिणि तणौ कीरतन
स्रम कीधां विणु केम सरै।।7।।
जिस ईश्वर (कृष्ण) ने हमें जन्म (जीवन) दिया है, जिसने हमारे मुख में जीभ देकर बोलने की सामर्थ्य दी है और जो हमारा पालन पोषण भी करता रहता है, उस ईश्वर का गुणगान करने हेतु परिश्रम किए बिना भला कैसे रहा जा सकता है ?

सुकदेव व्यास जैदेव सारिखा
सुकवि अनेक ते एक सन्थ।
त्रीवरणण पहिलौ कीजै तिणि
गूंथियै जेणि सिंगार ग्रन्थ।।8।।
शुकदेव, व्यास, जयदेव जैसे एक से बढकर एक श्रेष्ठ कवि हुए हैं उन्होंने इस परिपाटी का अनुसरण किया है कि जो (कवि) श्रृंगार रस की रचना करना चाहता है वह अपने ग्रंथ में सबसे पहले स्त्री (या नायिका) के सौंदर्य का वर्णन करे।

दस मास उदरि धरि वळे वरस दस
जो इहां परिपाळै जिवड़ी।
पूत हेत पेखतां पिता प्रति
वळी विसेखै मात वड़ी।।9।।
माता ही दस मास तक पुत्र को अपने गर्भ में धारण करती है और फिर पैदा हो जाने के बाद भी इस संसार में दस वर्षों तक उसका पालन पोषण करती है। अतः संतान का हित करने की दृष्टि से पिता की अपेक्षा माता अधिक महत्त्वपूर्ण होती है।

– कथारम्भ –

दक्खिण दिसि देस विदरभति दीपति
पुर दीपति अति कुंदणपुर।
राजति एक भीखमक राजा
सिरहर अहि नर असुर सुर।।10।।
दक्षिण दिशा में विदर्भ नाम का एक अत्यंत शोभादायक प्रदेश था। उसमें कुन्दनपुर नाम का एक सुन्दर नगर था। वहां नागों, असुरों और मनुष्यों (तीनों लोकों के निवासियों) में श्रेष्ठ भीष्मक नाम का राजा राज्य करता था।

पंचपुत्र ताइ छठी सुपुत्री
कुंअर रुकम कहि विमळ कथ।
रुकमबाहु अनै रुकमाळी
रुकमकेश नै रुकमरथ।।11।।
उसके (राजा भीष्मक के) पांच पुत्र थे और छठी सुपुत्री थी। उन पांचों में विमल यश वाला सबसे बड़ा राजकुमार रुक्मकुमार था। अन्य राजकुमारों के नाम थे – रुक्मबाहु, रुक्ममाली, रुक्मकेस और रुक्मरथ।

– रुक्मिणी की बाल्यावस्था –

रामा अवतार नाम ताइ रुषमणि
मानसरोवरी मेरुगिरी।
बाळकति करि हंस चौ बाळक
कनकवेलि विहुं पान किरि।।12।।
उस राजा की पुत्री का नाम रुक्मिणी था जो लक्ष्मी के अवतार के समान थी। बाल्यावस्था में वह ऐसी दिखाई देती थी मानो मानसरोवर में हंस का बच्चा हो या सुमेरु पर्वत पर उगी हुई छोटे-छोटे दो पत्तों वाली नव विकसित कमल लता हो।

अनि वरसि वधै ताइ मास वधै ए
वधै मास ताइ पहर वधन्ति।
लखण बत्रीस बाळलीलामै
राजकुंअरि ढूलड़ी रमन्ति।।13।।
उस राजकुमारी के शरीर के अंगों का तेजी से विकास हो रहा था। अन्य लड़कियां जितनी एक वर्ष में बढती थी उतना वह एक मास में ही बढ जाती थी। इसी तरह अन्य लड़कियां जितना एक माह में बढती थी उतना वह एक पल में ही बढ जाती थी। बाल्यावस्था में गुडियों से खेलने वाली उस राजकुमारी के शरीर में बत्तीसों लक्षण दिखाई दे रहे थे।

संग सखी सीळ कुळ वेस समाणी
पेखि कळी पदमिणी परि।
राजति राजकुंअरि राय अंगण
उडीयण वीरज अम्ब हरि।।14।।
राजकुमारी के साथ उसकी सखियाँ थी जो शील, कुल एवं वेश में उसी के समान थी। उनका शरीर कमल की पंखुड़ियों की तरह कोमल था। राजमहल के आंगन में सखियों से घिरी हुई वह राजकुमारी ऐसे शोभित थी जैसे आकाश में तारागणों के बीच में द्वितीया का चंद्रमा शोभायमान होता है

– वयःसन्धि –

सैसव तनि सुखपति जोवण न जाग्रति
वेस सन्धि सुहिणा सु वरि।
हिव पळ पळ चढतौ जि होइसै
प्रथम ज्ञान एहवी परि।।15।।
राजकुमारी के शरीर में अब शैशव के लक्षण समाप्त हो गये थे लेकिन अभी तक यौवन का आगमन नहीं हुआ था। इस समय तक उसके शरीर में स्वप्न के समान वयःसन्धि की अवस्था थी। लेकिन अब उसके शरीर में यौवन पल पल बढता ही जायेगा। राजकुमारी को अपने शरीर में यौवन के प्रथम आगमन का ज्ञान इस रूप में हुआ।

पहिलौ मुख राग प्रगट थ्यौ प्राची
अरुण कि अरुणोद अम्बर।
पेखे किरि जागिया पयोहर
संझा वन्दण रिखेसर।।16।।
सर्वप्रथम राजकुमारी के चेहरे पर लालिमा दिखाई देने लगी जैसे सूर्योदय के समय पूर्वी दिशा के आकाश में ललाई दिखाई देने लगती है। जिस प्रकार सूर्योदय की लालिमा को देखकर ऋषि लोग जागकर संध्यावन्दन करने के लिए खड़े हो जाते हैं वैसे ही उसके शरीर में स्तन प्रकट हो गए।

जम्प जीव नहीं आवतौ जाणे
जोवण जावणहार जण।
बहु विलखी वीछड़ती बाळा
बाळ संघाती बाळपण।।17।।
दूसरी ओर अपने शरीर में आने वाले यौवन को देख कर भी उसको हृदय में शांति नहीं मिल रही थी। क्योंकि यौवन भी अल्पकाल तक ही शरीर में रहकर चला जाता है।

आगळि पित-मात रमन्ती अंगणि
काम-विराम छिपाड़ण काज।
लाजवती अंगि एह लाज विधि
लाज करन्ती आवै लाज।।18।।
माता-पिता के सामने आंगन में खेलते समय उस राजकुमारी को अपने शरीर के काम के निवास वाले कुच आदि अंगों को छुपाने में ऐसा संकोच होता था कि उसे लज्जा करने में भी शर्म आती थी।

सैसव सु जु सिसिर वितीत थयौ सहु
गुण गति मति अति एह गिणि।
आप तणौ परिग्रह ले आयौ
तरुणापौ रितुराउ तिणि।।19।।
राजकुमारी के शरीर में शैशव रूपी शीत ऋतु समाप्त हो गई है ऐसा देख कर यौवन रूपी वसन्त त्रृतु ने अपने गुण, गति, मति आदि परिवार के सदस्यों के साथ उसके शरीर में प्रवेश ले लिया।

यौवन – वर्णन –

दल फूलि विमळ वन नयण कमळ दळ
कोकिल कण्ठ सुहाइ सर।
पांपणि पंख संवारि नवी परि
भ्रूहांरे भ्रमिया भ्रमर।।20।।
वसन्त के आगमन से जैसे जंगल फूलों से भर जाता है वैसे ही राजकुमारी का सारा शरीर यौवनागमन से खिल उठा। उसकी आंखें कमल के समान विकसित हो गई। उसकी आवाज़ कोयल की आवाज़ जैसी मधुर हो गई और उसकी आंखें ऐसी थी मानो पलक रूपी पंखों को फैलाकर भौंह रूपी भौंरे मंडराने लगे हों।

मळियाचळ सुतनु मळै मन मौरे
कळी कि काम अंकूर कुच।
तणौ दखिणदिसि दखिण त्रिगुणमै
ऊरध सास समीर उच।।21।।

राजकुमारी का शरीर मानो मलय पर्वत था। उसमें मन रूपी चन्दन का पेड़ उत्पन्न हो गया। उस पर कामदेव के अंकुर जैसी कुच रूपी कलियाँ प्रकट हुई। दक्षिण दिशा से आने वाले शीतल, मन्द, सुगन्ध पूर्ण पवन की तरह उसकी सांसों की खुशबू थी।

आणंद सु जु उदौ उहास हास अति
राजति रद रिखपन्ति रुख।
नयण कमोदणि दीप नासिका
मेन केस राकेस मुख।।22।।
रुक्मिणी का मुख पूर्णिमा का चन्द्रमा है। उसके हृदय का आनंद ही चन्द्रमा का उदय है, उसकी सहज मुस्कान ही चांदनी, उसकी आंखें कुमुदिनी है। दन्त पंक्ति तारों के समान सुशोभित है। उसकी केश राशि रूपी रात्रि में उसकी नासिका दीपक के समान है।

वधिया तनि सरवरि वेस वधन्ती
जोवण तणौ तणौ जळ जोर।
कामणि करग सु बाण काम रा
आयु के बढने के साथ-साथ रुक्मिणी के शरीर रूपी सरोवर में (मुखचन्द्र के प्रभाव से) यौवन रूपी पानी में ज्वार आ गया। उसके हाथों की उंगलियां कामदेव के पांच बाणों के समान हैं और उसकी भुजाएं मानों वरुण के पाश हैं।

कामिणि कुच कठिन कपोळ करी किरि
वेस नवी विधि वाणि वखाणि।
अति स्यामता विराजति ऊपरि
जोवण दाण दिखाळिया जाणि।।24।।
रुक्मिणी के दोनों कठोर स्तन मानो हाथी के दृढ गण्डस्थल हैं और उसके कुचाग्र की कालिमा उस गण्डस्थल से टपकने वाले मद के समान हैं।

धरधर शूंग सधर सुपीन पयोधर
घणीं खीण कटि अति सुघट।
पदमणि नाभि प्रियाग तणी परि
त्रिवळि त्रिवेणी स्रोणि तट।।25।।
राजकुमारी के पुष्ट कुच पर्वत शिखरों के समान हैं, उसकी पतली कमर(कटि) बहुत सुगठित है। उस पद्मिनी नायिका की नाभि प्रयाग के समान है और पेट की त्रिवली नाभि रूपी प्रयाग की त्रिवेणी है तो नितम्ब ही तट हैं।

नितम्बणी जंघ सु करभ निरूपम
रम्भ खम्भ विपरीत रुख।
जुअळि नाळि तसु गरभ जेहवी
वयणै वाखाणै विदुख।।26।।
विद्वान लोग उसकी दोनों जंघाओं का हाथी के सूंड के समान या कदली के उल्टे तने के समान वर्णन करते हैं। उसकी दोनों पिण्डलियां कदली के तने के भीतरी भाग की तरह कोमल हैं।

ऊपरि पदपलव पुनर्भव ओपति
न्रिमळ कमळदळ ऊपरि नीर।
तेज कि रतन कि तार कि तारा
हरिहंस सावक ससिहर हीर।।27।।
उसके चरणों पर सुंदर नाख़ून सुशोभित हैं। उनकी शोभा ऐसी है मानो वे निर्मल कमल के पत्ते पर हीरे से चमकती पानी की बूंदें हों या रत्नों की चमक हो या तारे हों या हंस के बच्चे हों या बालचन्द्र हो या जगमगाते हीरे हों।

रुक्मिणी की शिक्षा –

व्याकरण पुराण समृति सासत्र विधि
वेद च्यारि खट अंग विचार।
जाणि चतुरदस चौसठि जाणी
अनंत अनंत तसु मधि अधिकार।।28।।
रुक्मिणी ने आठों व्याकरण, अठारहों पुराणों, अठारहों स्मृतियों, चारों वेदों, छहों अंगों, चारों शास्त्र रीतियों का गहन अध्ययन कर समस्त प्रकार की चौदह विद्याओं और चौसठ कलाओं में अनन्त अधिकार प्राप्त कर लिया।

वर प्राप्ति की इच्छा से रुक्मिणी द्वारा वन्दना –

सांभळि अनुराग थयो मनि स्यामां
वर प्रापति वंच्छती वर।
हरि गुण भणि ऊपनी जिका हर
हर तिणि वन्दे गवरि हर।।29।।
मनोवांछित वर प्राप्ति की इच्छा जगने पर जब उसने कृष्ण के गुणों को सुना, तो उनको प्राप्त करने के लिये वह शिव-पार्वती की अराधना करने लगी।

– पिता द्वारा कृष्ण को वर बनाने की इच्छा –

ईखे पित मात एरिसा अवयव
विमळ विचार करै वीवाह।
सुन्दर सूर सीळ कुल करि सुध
नाह किसन सरि सूझै नाह।।30।।
माता-पिता ने रुकमणी के शरीर के अंगों में ऐसा विकास देख कर उसके विवाह का पवित्र विचार किया। उन्हें सुन्दरता, शूरवीरता, शील और कुल की श्रेष्ठता की सुधि करने पर कृष्ण के समान दूसरा कोई वर दिखाई नहीं पड़ा।

पुत्र द्वारा पिता का विरोध –

प्रभणन्ति पुत्र इम मात पिता प्रति
अम्हां वासना वसी इसी।
ग्याति किसी राजवियां ग्वाळां
किसी जाती कुळ पांति किसी।।31।।
माता-पिता का कृष्ण के प्रति ऐसा रुझान देख कर राजकुमार रुक्मि उनसे यह कहा कि मेरे मन में यह भावना आई है कि (हम) राजवंशियों और ग्वालों का कैसा नाता ? (हमारी तुलना में) ग्वाल जाति के कृष्ण की क्या तो जाति-पांति है ? और क्या कुल ही है ?

सु जु करे अहीरां सरिस सगाई
ओलांडे राजकुळ इता।
व्रिधपणै मति कोई वेसासौ
पांतरिया माता इ पिता।।32।।
अतः इतने (सम्मानीय) राजकुलों को उलांघकर जो अहीरों(ग्वालों) के साथ सगाई करते हैं तो ऐसा जान पड़ता है कि बुढापे में माता-पिता सठिया गए हैं। बुढापे का भला क्या भरोसा ?

प्रभणै पित मात पूत मत पांतरि
सुर नर नाग करै जसु सेव।
लिखमी समी रुकमणी लाडी
वासुदेव सम सुत वसुदेव।।33।।
माता-पिता ने कहा, हे पुत्र तू मूर्खता मत कर। (क्योंकि) प्रिय रुक्मिणी तो लक्ष्मी के समान है और वासुदेव के पुत्र कृष्ण भगवान विष्णु के समान हैं जिनकी सभी देवता, मनुष्य और नाग पूजा करते हैं।

मावीत्र म्रजाद मेटि बोलै मुखि
सुवर न को सिसुपाळ सरि।
अति अंबु कोपि कुंवर ऊफणियौ
वरसाळू वाहळा वरि।।34।।
(इस पर) राजकुमार रुक्मि क्रोध में जल से भरे हुए बरसाती नाले की तरह उफनते हुए तथा माता-पिता की मर्यादा का तिरस्कार करते हुए बोला – ‘ शिशुपाल के बराबर दूसरा कोई श्रेष्ठ वर नहीं है’

पुत्र का पुरोहित के यहां जाकर शिशुपाल को निमन्त्रण भेजना

गुरु गेहि गयौ गुरु चूक जाणि गुरु
नाम लियौ दमघोख नर।
हेक वडौ हित हुवै पुरोहित
वरै सुसा सिसुपाळ वर।।35।।
माता-पिता से भारी भूल होते जानकर रुक्मि गुरु (पुरोहित) के घर गया। उसने (शिशुपाल के पिता) दमघोष का नाम लिया और कहा कि हे पुरोहित, यदि शिशुपाल वर रूप में बहिन रुक्मिणी को ब्याहे तो यह एक बड़ा काम होगा।

पुरोहित का चंदेवरी पुरी पहुंचना –

विप्र विलंब न कीध जेणि आइस वसि
बात विचारी न भली बुरी।
पहिलुं इ जाइ लगन ले पुहतौ
प्रोहित चन्देवरी पुरी।।36।।
उस ब्राह्मण ने देरी नहीं लगाई और आज्ञा के वश में होकर भली बुरी बात नहीं सोची। (ऐसा विचार करने से) पहले ही वह लग्न लेकर चन्देवरी पुरी जा पहुंचा।

शिशुपाल का प्रसन्न हो कर कुन्दनपुर आना –

हुइ हरख घणै सिसुपाळ हालियौ
ग्रंथे गायौ जेणि गति।
कुण जाणै संगि हुआ केतला
देस देस चा देसपति।।37।।
अत्यंत हर्ष से भर कर शिशुपाल शास्त्रों में कही गई विधि के अनुसार (विवाह करने के लिए) चल पड़ा। उस समय न जाने कितने देशों के राजा उसके साथ (रवाना) हुए।

शिशुपाल के स्वागत में कुन्दनपुर की शोभा –

आगमि सिसुपाळ मण्डिजै ऊछव
नीसाणे पड़ती निहस।
पटमण्डप छाइजै कुंदनपुरि
कुन्दणमै बाझै कळस।।38।।
शिशुपाल के आगमन की सूचना पाकर कुंदनपुर में अनेक उत्सव मनाए जाने लगे। नगर में तम्बू लगाए गए, सोने के कलश बांधे जाने लगे और (चारों ओर) नगाड़े बजाए जाने लगे।

ग्रिह ग्रिह प्रति भींति सुगारि हींगलू
ईंट फिटकमै चुणी अचम्भ।
चन्दण पाट कपाट ई चन्दण
खुम्भी पनां प्रवाळी खम्भ।।39।।
घर-घर में हींगलू के गारे और स्फटिक की ईंटों से (नई) दीवारें चुनी गई। चन्दन के तख्त, चन्दन के ही दरवाजे एवं खम्भे मूंगों से तथा उनके आधार (खुम्भियां) पन्ने से बनाए गए।

जोइ जळद पटळ दळ सांवळ ऊजळ
घुरै नीसाण सोइ घणघोर।
प्रोळि प्रोळि तोरण परठीजै
मण्डै किरि तण्डव गिरि मोर।।40।।
चारों ओर काले-सफेद रंग के वितान रूपी बादल तने हुए हैं। नगाड़े मेघ गर्जन जैसी घनघोर आवाजें कर रहे हैं। द्वार-द्वार पर स्थापित किए गए तोरण ही मानो (वर्षा त्रृतु में) पर्वतों पर नाचने वाले मोर जैसे दिखाई दे रहे हैं।

राजान-जान संगि हुंता जु राजा
कहै सु दीध ललाटि कर।
दूरा नयर कि कोरण दीसै
धवळागिरि कि ना धवळहर।।41।।
राजा शिशुपाल के साथ जो राजा लोग आए थे वे ललाट पर हाथ रख कर देखते हुए बोले – दूर पर नगर दिखाई देता है या वे काले बादलों की घटाएं हैं ? वे ऊंचे-ऊंचे महल हैं या धवल गिरि हैं।

नगर नारियों की प्रसन्नता तथा रुक्मिणी की विकल दशा –

गावै करि मंगळ चढि चढि गौखे
मनै सूर सिसुपाळ मुख।
पदमिणि अनि फूलै परि पदमिणि
रुखमिणि कमोदणी रुख।।42।।
झरोखों में चढ-चढ कर नगर की औरतें मांगलिक गीत गाने लगी। शिशुपाल के मुखरूपी सूर्य को देख कर अन्य स्त्रियां तो कमलिनी की तरह खिल उठी परन्तु रुक्मिणी कुमुदिनी की तरह मुरझा गई।

जाळी मगि चढि चढि पन्थी जोवै
भुवणि सुतन मन तसु भिळित।
लिखि राखै कागळ नख लेखणि
मसि काजळ आंसू मिळित।।43।।
छत पर चढ चढ कर (रुक्मिणी) किसी पथिक को खोजने लगी। (क्योंकि) उसका शरीर तो (यहां) भवन में था पर उसका मन उस (कृष्ण) में रमा हुआ था। उसने आंसुओं में घुले हुए कागज की स्याही से नख रूपी लेखनी से एक पत्र लिखकर रख लिया था।

– ब्राह्मण का दर्शन तथा द्वारिका सन्देश भेजना –

तितरै हेक दीठ पवित्र गळित्रागौ
करि प्रणपति लागी कहण।
देहि संदेस लगी दुवारिका
वीर वटाऊ व्राहमण।।44।।
इतने में उसे एक पवित्र जनेऊधारी ब्राह्मण दिखाई दिया। उसे प्रणाम करते हुए रुक्मिणी ने कहा – ‘ हे भाई, हे पथिक, हे ब्राह्मण (कृपया) द्वारिका तक मेरा यह सन्देशा पहुंचा दो। ‘

म म करिसि ढील हिव हुए हेकमन
जाइ जादवां – इन्द्र जत्र।
माहरै मुख हुंता ताहरै मुखि
पग वन्दण करि देइ पत्र।।45।।
हे ब्राह्मण, अब हृदय को ढीला मत करो और दृढ निश्चय करते हुए शीघ्र ही वहां चले जाओ जहां यादवेन्द्र (कृष्ण) हैं। मेरे मुख से कही गई चरण वंदना को अपने मुख से प्रकट करते हुए उन्हें यह पत्र दे देना।

संध्या-वर्णन तथा ब्राह्मण का कुंदनपुर में ही सो जाना –

गई रवि किरण ग्रहे थई गहमह
रहरह कोई वह रहे रह।
सु जु दुज पुरा नीसरै सूतौ
निसा पड़ी चालियौ नह।।46।।
सूर्यास्त होने के पश्चात चारों ओर रोशनी की जगमगाहट हो गई, अतः अनेक पथिक ठहर गये। इक्का – दुक्का कोई पथिक ही यात्रा करते हुए दिखाई दे रहा था। वह ब्राह्मण भी रात्रि हो जाने के कारण यात्रा बंद कर नगर के बाहर सो गया।

दिन लगन सु नैड़ो दूरि द्वारिका
भौ पहुचेस्यां किसी भति।
सांझ सोचि कुन्दणपुरि सूतौ
जागियौ परभाते जगति।।47।।
लग्न का दिन निकट है और द्वारिका बहुत दूर है, यही चिंता है कि वहां कैसे पहुंच सकूंगा? यही चिंता करते हुए वह कुंदनपुर में ही सो गया। प्रातः जब वह जागा तो उसने स्वयं को द्वारिका में पाया।

द्वारका – वर्णन –

धुनि वेद सुणति कहुं सुणति संख धुनि
नद झल्लरि नीसाण नद।
हेका कह हेका हीलोहल
सायर नयर सरीख सद।।48।।
कहीं वेदपाठ की ध्वनि सुनाई पड़ रही थी, कहीं शंख ध्वनि सुनाई पड़ रही थी, कहीं झालर का शब्द सुनाई पड़ रहा था तो कहीं नगाड़ों का। एक ओर नगर में भीड़ का कोलाहल था तो दूसरी ओर समीपवर्ती समुद्र के लहरों की ध्वनि सुनाई पड़ रही थी।

पणिहारि पटळ दळ वरण चंपक दळ
कळस सीस करि कर कमळ।
तीरथि तीरथि जंगम तीरथ
विमळ व्राहमण जळ विमळ।।49।।
चम्पक पुष्प की पंखुड़ियों के समान गौरवर्ण वाली झुण्ड की झुण्ड पनिहारिनें सिर पर कलश रखे हुए, हाथों में कमल लिए हुए जा रही थी। निर्मल जल के पास प्रत्येक घाट पर चलते-फिरते (पवित्र) तीर्थ – से ब्राह्मण बैठे थे।

जोवै जां गृहि गृहि जगन जागवै
जगनि जगनि कीजै तप जाप।
मारगि मारगि अम्ब मौरिया
अम्बि अम्बि कोकिल आलाप।।50।।
उस ब्राम्हण ने देखा कि घर-घर में यज्ञ हो रहे थे। प्रत्येक यज्ञ में जप और तप किए जा रहे थे। उसने देखा कि प्रत्येक मार्ग पर आम के पेड़ मुकुलित हो रहे हैं और प्रत्येक आम के पेड़ पर कोयल कूक रही हैं।

ब्राह्मण का चकित होना तथा अन्तः पुर जाना –

सम्प्रति ए किना किना ए सुहिणौ
आयौ कि हूं अमरावती।
जाइ पूछियौ तिणि इमि जम्पियौ
देव सु आ दुआरामती।।51।।
ये सारी बातें देखकर ब्राह्मण ने विस्मित हो कर सोचा कि यह सब प्रत्यक्ष है या मैं स्वप्न देख रहा हूँ। क्या मैं स्वर्गपुरी में आ गया हूं ? जब उसने लोगों से पूछा तब उन्होंने बतलाया कि हे देवता ! यह सुंदर द्वारिकापुरी है।

सुनि स्रवणि वयण मन माहि थियौ सुख
क्रमियो तासु प्रणाम करि।
पूछत पूछत ग्यौ अन्तहपुरि
हुऔ सुदरसण तणौ हरि।।52।।
इन वचनों को कानों से सुनकर उस ब्राह्मण का मन सुखी हो गया। उन लोगों को प्रणाम करता हुआ वह आगे बढ चला। पूछता पूछता वह राजमहल के अन्तःपुर में जा पहुंचा जहां उसे कृष्ण के दर्शन हुए।

वदनारविन्द गोविन्द वीखियै
आलोचै आपो आप सूं।
हिव रुषमणि कृतारथ हुइस्यै
हुऔ कृतारथ पहिलौ हूं।।53।।
कृष्ण के मुख कमल को देखकर ब्राह्मण ने अपने आप से ही कहा कि अब रुक्मिणी अवश्य ही कृतार्थ होगी लेकिन मैं तो उससे भी पहले कृतार्थ हो गया हूं।

ऊठिया जगतपति अन्तरजामी
दूरन्तरी आवतौ देखि।
करि वन्दण आतिथ ध्रम कीधो
वेदे कहियौ तेणि विसेखि।।54।।
(उस ब्राह्मण को) दूर से ही आता देख कर अंतर्यामी जगतपति (कृष्ण) खड़े हो गए और उसकी वंदना करते हुए वेदों में बतलाए गए अतिथि धर्म से भी अधिक मात्रा में उसका आतिथ्य किया।

कस्मात् कस्मिन् किल मित्र किमर्थं
केन कार्य परियासि कुत्र।
ब्रूहि जनेन येन भो ब्राह्मण
पुरतो मे प्रेषितम् पत्र।।55।।
(कृष्ण ने उस ब्राह्मण से पूछा) हे मित्र ! आप कहां से आये हैं ? कहां रहते हैं ? आपके आगमन का प्रयोजन क्या है ? आप बतलाएं कि आपका किस व्यक्ति से काम है ? आप कहां जा रहे हैं ? जिसने यह पत्र भेजा है उसका नाम क्या है ?

पत्र देखकर कृष्ण की अवस्था, विप्र द्वारा पत्र पाठ –

कुन्दणपुर हुंता वसां कुन्दणपुरि
कागळ दीधो एम कहि।
राज लगैं मेल्हियौ रुषमणी
समाचार इणि माहि सहि।।56।।
भावार्थ – (ब्राह्मण ने जवाब दिया कि)-
मैं कुंदनपुर से आया हूं और वहां पर ही रहता हूं। उसने बतलाया कि रुक्मिणी ने आप के लिए यह पत्र भेजा है और सारे समाचार इसी के भीतर हैं।

आणन्द लखण रोमांचित आंसू
वाचत गदगद कंठ न वणै।
कागळ करि दीधौ करुणाकरि
तिणि तिणि हीज व्राहमण तणै।।57।।
पत्र हाथ में लेते ही कृष्ण का शरीर आनंद से रोमांचित हो गया, उनके आंसू बहने लगे और उनका कण्ठ गद् गद् हो गया। इसलिए उनसे पत्र पढा नहीं जा सका। उन्होंने ने(पढने के लिए) वह पत्र ब्राह्मण को ही दे दिया।

देवाधिदेव चै लाधै दूवै
वाचण लागौ व्राहमण।
विधि पूरवक कहे वीनवियौ
सरण तूझ असरण सरण।।58।।
देवाधिदेव कृष्ण से आज्ञा पाकर ब्राह्मण वह पत्र पढने लगा। पत्र-लेखन विधि के अनुरूप प्रारम्भ में लिखे गए शिष्टाचार के शब्दों को पढकर फिर उसने आगे निवेदन किया – ‘हे अशरणशरण ! मैं आपकी शरण में हूं। ‘

बळिबन्धण मूझ स्याळ सिंघ बळि
प्रासै जो बीजौ परणै।
कपिळ धेनु दिन पात्र कसाई
तुळसी करि चाण्डाळ तणै।।59।।
हे बलि को बांधने वाले (आप को छोड़कर) यदि कोई मुझ से विवाह करता है तो मानो गीदड़ किसी सिंह का भोजन खाता है, अथवा ऐसा होगा जैसे कोई कपिला गाय कसाई को बेच दी गई हो या तुलसी को चाण्डाळ को सौंप दिया गया हो।

अम्ह कजि तुम्ह.छण्डि अवर वर आणै
ऐठित किरि होमै अगनि।
साळिगराम सूद्र ग्रहि संग्रहि
वेदमन्त्र म्लेच्छां वदनि।।60।।
तुम्हें छोड़कर यदि मेरा विवाह किसी अन्य से होता है तो मानो होम की पवित्र अग्नि में जूठन को होम दिया गया हो या शालिग्राम को शूद्र के घर में रख दिया गया हो या म्लेच्छों के मुख में वेदमन्त्र रख दिए गए हों।

हरि हुए वराह हुए हरिणाकस
हूं ऊधरी पताळ हूं।
कहौ तई करुणामै केसव
सीख दीध किध तुम्हां सूं।।61।।
हे हरि ! आप ने वाराह रूप धारण कर हिरण्याक्ष के हाथों से पाताल से मेरा उद्धार किया था। हे करुणामय ईश्वर, कहो उस समय किसने तुम्हें ऐसा करने की सीख(प्रेरणा) दी थी।

आणे सुर असुर नाग नेत्रै नहि
राखियौ जई मन्दर रई।
महण मथे मूं लीध महमहण
तुम्हां किणै सीखव्या तई।।62।।
हे महासमुद्र के मन्थनकर्त्ता, जब आपने देवता और राक्षसों को एकत्र कर शेषनाग को रस्सी और मन्दराचल पर्वत को मथनी बनाकर समुद्र मंथन कर उसमें से मुझ लक्ष्मी का उद्धार किया था तब भला किसने आपको ऐसा करने की सीख दी थी ?

रामा अवतारि वहे रणि रावण
किसी सीख करुणाकरण।
हूं उधरी त्रिकुटगढ हूंती
हरि बन्धे वेळाहरण।।63।।
हे करुणा करने वाले, राम के अवतार के रूप में जब आपने युद्ध में रावण को मारा था, तब आपको किसने प्रेरणा दी थी ? हे करुणाकर! आपने किसकी सीख के कारण रामावतार में समुद्र को बांधकर मुझ सीता का लंकागढ से उद्धार किया था ?

चौथीआ वार वाहर करि चत्रभुज
संख चक्र धर गदा सरोज।
मुख करि किसूं कहीजै माहव
अन्तरजामी सूं आळोज।।64।।
हे शंख, चक्र, गदा व कमल धारण करने वाले चतुर्भुज! इस चौथी बार भी मेरा उद्धार करें। आपतो स्वयं अंतर्यामी हैं। हे माधव! फिर भला मैं आप के सामने अपने क्या विचार प्रकट करुं ? आप स्वयं ही जानते हैं कि मेरे मन में क्या है ?

तथापि रहे न हूं सकूं बकूं तिणि
त्रिया अनै प्रेम आतुरी।
राज दूरि द्वारिका विराजौ
दिन नेड़उ आइयौ दुरी।।65।।
(आपके अंतर्यामी होने से कुछ भी कहने की आवश्यकता नहीं है) फिर भी मैं कहे बिना नहीं रह सकती क्योंकि एक तो अबला हूं और दूसरी प्रेमातुर भी हूं। इसी कारण कहती हूं कि आप तो दूर द्वारिका में हैं और इधर (मेरे) विवाह का यह दुखदायी दिन निकट है।

त्रिणि दीह लगन वेळा आड़ा तै
घणूं किसूं कहिजै आघात।
पूजा मिसि आविसि पुरखोतम
अम्बिकाळय नयर आरात।।
विवाह के अब तीन दिन ही शेष रह गए हैं। मेरे साथ हो रही घात के बारे में मैं अधिक क्या कहूं ? (केवल इतना संकेत देना चाहती हूं कि उस दिन मैं आप को पाने के लिए) पूजा के बहाने नगर के निकट (बाहर) स्थित देवी के मन्दिर मैं आ जाऊंगी।

श्री कृष्ण का कुन्दनपुर को प्रस्थान –

सारङ्ग सिळीमुख साथी सारथी
प्रोहित जाणणहार पथ।
कागळ चौ ततकाळ कृपानिधि
रथ बैठा सांभळि अरथ।।67।।
कृपा के निधान कृष्ण (रुक्मिणी के) पत्र का आशय समझ कर शारंग धनुष, बाण, सारथी तथा मार्गदर्शक पुरोहित को साथ लेकर (उसी समय प्रस्थान करने के लिए) रथ पर बैठ गए।।

सुग्रीवसेन नै मेघपुहुप सम-
वेग बळाहक इसै वहन्ति।
खंति लागौ त्रिभुवनपति खेड़ै
धर गिरि पुर साम्हा धावन्ति।।68।।
उमंग से भरे हुए कृष्ण रथ को स्वयं चलाने लगे। उनके रथ में जुते हुए घोड़े सुग्रीवसेन, मेघपुष्प, समवेग और बलाहक इतनी तेजी से दौड़ रहे हैं कि पृथ्वी, पर्वत, पेड़ तेजी से (सामने आ रहे) पीछे छूट रहे हैं।

नगर के समीप आगमन, रुक्मिणी को संदेश भेजना –

रथ थम्भि सारथी विप्र छण्डि रथ
औ पुर हरि बोलिया इम।
आयौ कहि कहि नाम अम्हीणौ
जा सुख दे स्यामां नै जिम।।69।।
(कुंदनपुर पहुंच जाने पर) कृष्ण ने सारथी से कहा, यह नगर आ गया है तुम रथ रोक दो। ब्राह्मण से कहा कि अब तुम रथ से उतर जाओ और हमारा नाम लेकर आगमन की सूचना रुक्मिणी को दे देना जिससे उसे सुख मिल सके।

रुक्मिणी की चिंतातुरता तथा शकुन –

रहिया हरि सही जाणियौ रुषमणि
कीध न इवड़ी ढील कई।
चिन्तातुर चित इम चिन्तवती
थई छीक तिम धीर थई।।70।।
इधर चिंतातुर रुक्मिणी इस तरह से सोच रही थी कि शायद कृष्ण रुक ही गए हैं वरना उन्होंने ऐसी ढील कभी नहीं दी थी। इसी समय उसे शुभ-शकुन सूचक छींक आ गई। जिससे उसे तनिक धैर्य हुआ।

रुक्मिणी को विप्र का दर्शन और उसकी आकुलता –

चळपत्र पत्र थियौ दुज देखे चित
सकै न रहति न पूछि सकन्ति।
औ आवै जिम जिम आसन्नौ
तिम तिम मुख धारणा तकन्ति।।71।।
ब्राम्हण का दर्शन करते ही रुक्मिणी का चित्त शंका के कारण पीपल के पत्ते की तरह चंचल हो उठा। न तो वह धैर्य रख पा रही थी और न ही (सबके सामने ब्राह्मण से) पूछ ही सकती थी। जैसे जैसे वह निकट आ रहा था वैसे वैसे वह (उसके भाव जानने के लिए) उसकी मुख मुद्रा को ध्यानपूर्वक ताक रही थी।

संगि सन्ति सखीजण गुरुजण स्यामां
मनसि विचारि ए कही महन्ति।
कुससथळी हूंता कुन्दणपुरि
किसन पधारया लोक कहन्ति।।72।।
(उस ब्राह्मण ने) रुक्मिणी को सखियों, गुरुजनो से घिरा हुआ देख कर मन में सोच विचार कर कहा – ‘लोग कहते हैं कि श्रीकृष्ण द्वारिका पुरी से चलकर कुंदनपुर पधारे हैं। ‘

बम्भण मिसि वन्दै हेतु सु बीजौ
कही स्रवणि सम्भळी कथ।
लिखमी आप नमे पाइ लागी
अचरिज को लाधै अरथ।।73।।
ब्राह्मण के मुख से कही गई बात को सुनकर (रुक्मिणी ने) ब्राह्मण होने के नाते उसे प्रणाम किया किन्तु उसका वास्तविक उद्देश्य (कृष्ण को ले आने के रूप में) दूसरा था। लक्ष्मी खुद जिसके पांव छूती हो उसके लिए धन लाभ में भला क्या आश्चर्य ?

बलराम का सेना सहित आगमन –

चढिया हरि सुणि सड़्करखण चढिया
कटकबन्ध नह घणा किध।
एक उजाथर कळहि एहवा
साथी सहु आखाढसिध।।74।।
श्रीकृष्ण को सेना के साथ कुन्दनपुर जाने की बात सुनकर बलराम ने भी युद्ध के लिए प्रस्थान किया। उन्होंने बड़ी सेना एकत्र नहीं की क्योंकि एक तो वे स्वयं बड़े योद्धा थे और दूसरे उनके साथी भी रणकुशल थे।

पिण पन्थ वीर जूजुआ पधार् या
पुरि भेळा मिळि कियो प्रवेस।
जण दूजण सहि लागा जोवण
नर नारी नागरिक नरेस।।75।।
यद्यपि दोनों भाई भिन्न भिन्न मार्ग से चलकर आये थे लेकिन दोनों ने मिलकर एक साथ प्रवेश किया। मित्र-शत्रु, नर-नारी, राजा-प्रजा सभी उन्हें (आश्चर्य से) देखने लगे।

– कृष्ण-बलराम का दर्शन कर के पुरवासियों द्वारा वर्णन –

कामिणि कहि काम काळ कहि केवी
नारायण कहि अवर नर।
वेदारथ इम कहै वेदवंत
जोग तत्त जोगेसवर।।76।।
सभी ने कृष्ण को अपनी भावना के अनुसार देखा जैसे – स्त्रियों ने उन्हें साक्षात कामदेव बतलाया, शत्रुओं (दुर्जनों) ने उन्हें काल समझा, भक्तों ने उन्हें नारायण माना, वेदविज्ञों ने उन्हें वेदार्थ कहा और योगीश्वरों ने उन्हें योगतत्व मान।

वसुदेव कुमार तणौ मुख वीखे
पुणै सुणै जण आपपर।
औ रुषमणी तणौ वर आयौ
हर म करौ अनि रायहर।।77।।
वसुदेव के पुत्र श्रीकृष्ण के मुख को देखकर लोग परस्पर यह कहने लगे कि यह रुक्मिणी के पति आ गए हैं। अब दूसरे राजाओं को रुक्मिणी को प्राप्त करने की इच्छा नहीं करनी चाहिए।

आवासि उतारि जोड़ि कर ऊभा
जण जण आगै जणौ जणौ।
राम किसन आया राजा रै
तो को अचिरज मनुहार तणौ।।78।।
(कृष्ण और उनके साथियों को) आवास में ठहरने दिया गया और प्रत्येक अतिथि की सेवा में हाथ जोड़कर एक एक व्यक्ति खड़ा हो गया। राजा के यहां बलराम और श्रीकृष्ण (खुद) पाहुने होकर आये थे तब भला उनका ऐसा सत्कार किए जाने में आश्चर्य ही क्या है ?

रुक्मिणी की सखी द्वारा अम्बिकालय जाने के लिए माता से आज्ञा लेना –

सीखावि सखी राखी आखै सुजि
राणी पूछै रुषमणी।
आज कहौ तो आप जाइ आवूं
अम्ब जात्रा अम्बिका तणी।।79।।
(पहले से ही सिखाई गई) सखी ने रानी से कहा – हे महारानी ! रुक्मिणी पूछ रही है कि यदि आपकी अनुमति हो तो मैं आज माँ अम्बिका की यात्रा (पूजा) कर आऊँ ?

राणी तदि दूवौ दीध रुषमणी
पति सुत पूछि पूछि परिवार।
पूजा व्याज काज प्री परसण
स्यामां आरंभिया सिणगार।।80।।
तब रानी ने पति, पुत्र एवं परिवारजनों से पूछ कर आज्ञा दे दी। पूजा के बहाने प्रिय से मिलने के लिए रुक्मणी (श्यामा) ने श्रृंगा र प्रारम्भ कर दिया।

देवदर्शन हेतु रुक्मिणी का स्नान व नखशिख निरुपण –

कुमकुमै मंजण करि धौत वसत धरि
चिहुरे जळ लागौ चुवण।
छीणे जाणि छछोहा छूटा
गुण मोती मखतूल गुण।।81।।
गुलाब जल से सुगन्धित जल में स्नान करने के उपरांत उसने स्वच्छ (सुन्दर) वस्त्र धारण किए। उसके भीगे व खुले बालों से पानी की बूंदें ऐसे टपक रही थी मानो माला के काले रेशम के धागे के टूट जाने पर उसमें से मोती टपक रहे हैं।

लागी बिहुं करे धूपणै लीधै
केसपास मुगता करण।
मन मृग चै कारणै मदन ची
वागुरी जाणे विसतरण।।82।।
रुक्मिणी स्नान करने के बाद अपने दोनों हाथों से बालों को सुगंधित धूप देने के लिए फैलाने लगी। इस दृश्य को देख कर ऐसा लग रहा था कि मानों मन-रूपी मृग को फांंसने के लिए कामदेव का जाल फैलाया गया. है।

बाजोट ऊतरी गादी बेठी
राजकुंअरि स्रिंगार रस।
इतरै एक आली ले आवी
आनन आगळि आदरस।।83।।
रुक्मिणी श्रृंगार करने की इच्छा से काठ की चौकी (बाजोट) से उतर कर आरामदायक गद्दी पर बैठ गयी और उसी समय एक सखी दर्पण लेकर सामने आ कर खड़ी हो गयी।

कंठ पोत कपोत कि कहुं नीलकंठ
वडगिरि कालिन्द्री वळी।
समै भागि किरि संख संखधर
एकणि ग्रहियौ अंगुळी।।84।।
रुक्मिणी ने गले में काले रेशमी धागे में तैयार कंठी धारण की। यह ऐसी दिखाई दे रही थी मानो कबूतर के या नीलकंठ के गले की काली रेखा हो अथवा बड़े पर्वत (हिमालय) के चारों तरफ कालिंदी (यमुना नदी) घिर आई हो अथवा शंखधारी विष्णु भगवान ने शंख के मध्य में अंगुली डालकर उसे पकड़ रखा हो।

कबरी किरि गुन्थित कुसुम करम्बित
जमुण फेण पावन्न जग।
उतमंग किरि अम्बर आधो अधि
मांग समारि कुंआर मग।।85।।
गूंथी हुयी चोटी जो बीच-बीच में फूलों को सजाकर तैयार की गई है ऐसी दिखाई दे रही थी मानो जगत को पवित्र करने वाली फैनयुक्त (झाग से भरी हुई) यमुना नदी हो तथा सिर के बीचोंबीच संवारि गई मांग कुमार मार्ग (आकाश गंगा) हो।

अणियाळा नयण बाण अणियाला
सजि कुण्डळ खुरसाण सिरि।
वळे बाढ दे सिळी-सिळी वरि
काजळ जळ वाळियौ किरि।।86।।
नुकीले बाणों जैसे रुक्मिणी के तीखे नेत्र हैं जिन्हें कुण्डल रूपी साण पर तीखा कर सजाया गया है जैसे सिल्ली पर जल डाल कर बाणों को तीखा किया जाता है उसी प्रकार आँखों को तीखा करने के लिए सलाई पर काजल रूपी जल डालकर आँखों में लगाया गया है।

कमनीय करे कूँ कूँ चौ निज करि
कलँक धूम काढे बे काट।
सम्प्रति कियौ आप मुख स्यामा
नेत्र तिलक हर तिलक निलाट।।87।।
रुक्मिणी ने अपने ललाट पर शिव के तीसरे नेत्र की तरह कुंकुम से अर्द्धचन्द्र तिलक के साथ बिन्दी रूपी नेत्र बनाया है लेकिन शिव के ललाट पर विद्यमान नेत्र के अग्नि दोष और चन्द्रमा में स्थित धूएं दोष को हटा कर अपने तिलक रूपी तीसरे नेत्र को निर्दोष कर दिया।

मुख सिख संधि तिलक रतनमै मण्डित
गयौ जु हूंतौ पूठि गळि।
आयै क्रिसन मांग मग आयौ
भाग कि जाणे भालियळि।।88।।
रुक्मिणी के मुख और शिखा के संधि स्थल ललाट के ऊपरी भाग पर जो रत्न जड़ित टीका धारण किया है, मानो यह गहना न हो कर उसका भाग्य है जो शिशुपाल के आगमन से भयभीत हो कर शिखा के पीछे छुपा हुआ था वह अब श्रीकृष्ण के आने पर निर्भय होकर मांग मार्ग से चलकर ललाट पर आ गया है।

जूं सहरी भ्रूह नयण मृग जूता
विसहर रासि कि अलक वक्र।
वाळी किरि वांकिया विराजै
चन्द रथी ताटंक चक्र।।89।।
रुक्मिणी के जो नेत्र रूपी मर्ग हैं वो भौंह रूपी रथ के जूए में जुते हुए हैं। उसके विषधर जैसे काले घुंघराले बाल उनकी लगाम हैं। ऐसा लगता है मानो रुक्मिणी का मुख-चन्द्र ही रथ का सारथी है और कुण्डल रथ के पहिये हैं।

इभ कुंभ अन्धारी कुच सु कंचुकी
कवच सम्भु काम क कळह।
मनु हरि आगमि मंडे मण्डप
बन्धण दीध कि वारगह।।90।।
रुक्मिणी के स्तनों पर धारण की गई आंगी (कांचली, कंचुकी) ऐसे लग रही है मानो हाथी के कुम्भ स्थल पर डाली गई जाली हो अथवा महादेव ने कामदेव से युद्ध करने के लिए अपनी सुरक्षा हेतु कवच धारण किया हो। ऐसा भी लगता है मानो कृष्ण के स्वागत में ताने गए तम्बू हैं और कंचुकी को बांधने वाली रस्सियां तम्बू के रस्से हैं।

हरिणाखी कंठ अंतरिख हूंती
बिम्ब रूप प्रगटी बहिरि।
कळ मोतियां सुसरि हरि कीरति
कंठसरी सरसती किरि।।91।।
मृगनयनी रुक्मिणी ने सोने की कंठी धारण की है जिसके दोनों ओर मोतियों की लड़ें हैं जो मानो हृदय में स्थित सरस्वती साकार हो कर बिम्ब के रूप में प्रकट हुई हैं। मोतियों की लड़ें ऐसे लग रही हैं मानो सरस्वती द्वारा विष्णु का यशोगान किया जा रहा है।

बाजूबंध बन्धे गोर बाहु बिहुं
स्याम पाट सोहन्त सिरी।
मणिमै हींडि हींडलै मणिधर
किरि साखा श्रीखंड की।।92।।
रुक्मिणी की दोनों गौर-वर्ण भुजाओं में बंधे हुए बाजुबन्धों के लटकते काले रंग के रेशमी छोर ऐसे शोभायमान हो रहे हैं मानों चंदन वृक्ष की शाखाओं से बंधे हुए मणि जड़ित झूलों में मणियों वाले सर्प (मणिधर) झूल रहे हैं।

गजरा नवग्रही प्रोंचिया प्रोंचे
वळे वळे विधि विधि वळित।
हसत नखित्र वेधियौ हिमकरि
अरध कमळ अलि आवरित।।93।।
रुक्मिणी ने अपनी कलाइयों में मोतियों के गजरे में नवरत्नों जड़ित पहुंचियां धारण की हैं और भांति – भांति के कंगन धारण कीए हुए उनके हाथ ऐसे लग रहे हैं मानों हाथ रूपी हस्त नक्षत्र ने गजरे युक्त पहुंची रूपी गोलाकार चंद्रमा को वेध दिया है और इनके हाथ ऐसे भी लग रहे हैं मानो भंवरों से घिरे हुए अर्द्धविकसित कमल हैं।

आरोपित हार घणौ थियौ अंतर,
उरस्थळ कुम्भस्थळ आज।
सु जु मोती लहि न लहै सोभा,
रज तिणि सिर नांखै गजराज।।94।।
रुक्मिणी द्वारा वक्षस्थल पर मोतियों का हार धारण कर लेने के कारण हाथी के कुम्भस्थल और रुक्मिणी के वक्षस्थल में काफी समानता होते हुए भी अन्तर आ गया है। हाथी कुम्भस्थल में मोती रखने के उपरांत भी रुक्मिणी के वक्षस्थल जैसी शोभा प्राप्त न होने के कारण लज्जित हो कर अपने मस्तक पर धूल डाल रहा है।

धारिया सु उतारे नव तन धारे,
कवि तै वाखाणण किमत्र।
भूखण पुहप पयोहर फळ भति,
वेलि गात्र तौ पत्र वसत्र।।95।।
जो धारण किए हुए वस्त्र थे रुक्मिणी ने उतार कर नए वस्त्र धारण किये। कवि इसकी सुंदरता का वर्णन करने में सक्षम नहीं है। फिर भी कवि कहता है कि रुक्मिणी का शरीर लता है, उसके धारण किए गए वस्त्र बेल के पत्ते हैं, आभूषण पुष्पों की तरह शोभायमान हैं तथा उसके स्तन फल के समान हैं।

स्यामा कटि कटिमेखला समरपित
क्रिसा अंग मापित करल।
भावी सूचक थिया कि भेळा
सिंघरासि ग्रहगण सकल।।96।।
रुक्मिणी ने सिंह जैसी पतली कमर में करधनी पहन रखी है मुट्टी से नापी जा सकने वाली यह क्षीण कटि (पतली कमर) ऐसे शोभायमान हो रही है मानो सौभाग्यशाली भविष्य की सूचना देने वाले समस्त ग्रहगण सिंह राशि में एकत्र हो गए हैं।

चरणे चामीकर तणा चंदाणणि
सज नूपुर घूघरा सजि।
पीळा भमर किया पहराइत
कमळ तणा मकरन्द कजि।।97।।
चन्द्रमुखी रुक्मिणी ने अपने पैरों में सोने के नूपुर व घुंघरू धारण किए हुए हैं, ये इस तरह शोभायमान हो रहे हैं मानो पीले वस्त्र वाले भंवरे रूपी पहरेदार कमल-रस(मकरन्द) की रक्षा के लिए नियुक्त किए गए हैं।

दधि वीणि लियौ जाइ वणतौ दीठौ,
साखियात गुणमै ससत।
नासा अग्रि मुताहळ निहसति,
भजति कि सुक मुख भागवत।।98।।
समुद्र से चुन लिया (उठा लिया) गया मोती अब रुक्मिणी की नासिका के अग्रभाग में स्थित हो कर गुणवान हो गया। यह प्रतिष्ठा प्राप्त मोती ऐसे लग रहा है, मानो नासिका रूपी शुकदेव मुनी मोती रूपी भागवत का पाठ कर रहे हैं।

मकरन्द तंबोळ कोकनद मुख मझि,
दन्त किंजळक दुति दीपन्ति।
करि इक बीड़ौ वळे वाम करि,
कीर सु तसु जाति क्रीड़न्ति।।99।।
रुक्मिणी के कमल के समान मुख में पान पुष्परस के तथा दांत पुष्पकेशर के समान सोभायमान हो रहे हैं। बायें हाथ में पान का एक और धारण किया बीड़ा ऐसे लग रहा है मानो तोते का बच्चा चमेली की बेल पर खेल रहा है।

सिणगार करे मन कीधौ स्यामा,
देवि तणा देहरा दिसि।
होड छण्डि चरणे लागा हंस,
मोती लगि पाणही मिसि।।100।।
रुक्मिणी के श्रृंगार करने के उपरांत देवी के मन्दिर जाने की इच्छा की। पैरों में पहनते समय उसकी रत्नजड़ित जूतियां ऐसे लग रही हैं मानों हंस समता करने की प्रतिस्पर्धा त्याग कर पगरखी के बहाने पैरों से लिपट गये हों।

अन्तर नीळम्बर अबळ आभरण,
अंगि अंगि नग नग उदित।
जाणे सदनि सदनि सञ्जोई,
मदन दीपमाळा मुदित।।101।।
नीले झीने चीर के अंदर से अंग-प्रत्यंग पर धारण किए आभूषण ऐसे झलक रहे हैं मानों प्रसन्न हुए कामदेव ने घर-घर में दीपमाला जलाई हो।

किहि करगि कुमकुमौ कुंकुम किहि करि,
किहि करि कुसुम कपूर करि।
किहि करि पान अरगजौ किहि करि,
धूप सखी किहि करगि धरि।।102।।
रुक्मिणी की किसी सखी ने हाथ में गुलाब जल लिया, किसी ने कुमकुम, किसी ने हाथों में पुष्प और कपूर लिया है, और किसी ने पान, किसी ने चंदन तथा किसी सखी ने हाथ में धूप लेकर तैयारी की।

चकडोळ लगै इणि भांति सुं चाली,
मति तै वाखाणण न मूं।
सखी समूह मांहि इम स्यामा,
सीळ आवरित लाज सूं।।103।।
इस तरह सखियों के समूह के साथ रुक्मिणी पालकी की तरफ चली जिसकी शोभा का वर्णन करने की क्षमता मेरी बुद्धि में नहीं है। रुक्मिणी सखियों के समूह के बीच ऐसे दिखाई दे रही थी मानो लज्जा से घिरा हुआ शील हो अर्थात सखियाँ लाज का तथा रुक्मिणी शील का स्वरूप हैं।

आइस्यै जाइ साथि सु चढि चढि आया,
तुरी लाग ले ताकि तिम।
सिलह मांहि गरकाब संपेखी,
जोध मुकुर प्रतिबिम्ब जिम।।104।।
रुक्मिणी के साथ जाने के लिए जिन योद्धाओं को आज्ञा दी गई थी वे अपने – अपने घोड़ों पर चढकर लगाम हाथ में पकड़ कर आ पहुंचे। योद्धाओं के शरीर कवच में ढके हुए ऐसे प्रतीत हो रहे थे जैसे दर्पण में प्रतिबिंब समाया हुआ हो।

पदमिणि रखपाळ पाइदळ पाइक,
हिळवळिया हलिया हसति।
गमे गमे मदगलित गुड़न्ता,
गात्र गिरोवर नाग गति।।105।।
रुक्मिणी के साथ पैदल चलने वाले अंगरक्षक हड़बड़ा कर तेज गति से चले। दाएँ – बाएँ दोनों तरफ चलने वाले पहाड़ों जैसे विशालकाय हाथी सर्पों की चाल चलते हुए एवं मद टपकाते हुए धीरे-धीरे चलने लगे।

श्रीकृष्ण द्वारा रुक्मिणी का अनुगमन –

अस वेगि वहै रथ वहै अन्तरिख,
चालिया चन्दाणणि मग चाहि।
किरि वैकुण्ठ अयोध्यावासी,
मंजण करि सरयू नदि मांहि।।106।।
घोड़े तेज गति से दोड़ रहे हैं एवं रथ का वेग अंतरिक्ष में उड़ने जैसा लग रहा है। यह दृश्य ऐसा भी दिखाई दे रहा है जैसे सुमेर पर्वत के चारों ओर नक्षत्र फैले हों अथवा शिव भगवान ने गले में मुण्डमाला धारण कर रखी हो।

पारस प्रासाद सेन सम्पेखे,
जाणि मयंक कि जळहरी।
मेरु पाखती नखित्र माळा,
ध्रू माळा संकर धरी।।107।।
जगदम्बा मन्दिर के चारों तरफ तैनात सेना चन्द्रमा की जलहरी की तरह दिखाई दे रही है। यह दृश्य ऐसा भी लगरहा है जैसे सुमेरु पर्वत के चारों और नक्षत्र फैले हैं अथवा शिवभगवान ने गले में मुण्डमाला धारण कर रखी है।

देवाळै पैसि अम्बिका दरसे,
घणै भाव हित प्रीति घणी।
हाथे पूजि कियौ हाथालगि,
मन वञ्छित फळ रुषमणी।।108।।
मन्दिर में प्रवेश कर बहुत ही भक्तिभाव एवं श्रद्धा से रुक्मिणी ने अम्बिका के दर्शन किए और अपने हाथों से पूजा करके उसी समय मनोवांछित फल प्राप्त किया।

आकरषण वसीकरण उनमादक,
परठि द्रविण सोखण सर पंच।
चितवणि हसणि लसणि गति संकुचणि,
सुन्दरि द्वारि देहरा संच।।109।।
रुक्मिणी अम्बिका की पूजा के पश्चात चितवन रूपी आकर्षण, मोहिनी मुस्कान रूपी वशीकरण करण, अंग भंगिमा रूपी उन्मादन, गति रूपी द्रविण और संकोच रूपी शोषण कामदेव के इन पांच बाणों को धारण कर अम्बिका मन्दिर के द्वार पर आई।

मन पंगु थियौ सहु सेन मूरछित,
तह नह रही संपेखतै।
किरि नीपायौ तदि निकुटी ए,
मठ पूतळी पाखाणमै।।110।।
रुक्मिणी के अलौकिक सौंदर्य को देख कर सारी सेना का मन स्थिर (गति -हीन)हो गया, सेना मूर्छित जैसी हो गई, उसमें चेतना नहीं रही। इन्हें देखकर ऐसा लग रहा है मानो मन्दिर निर्माण के समय ये पत्थर की मूर्तियां भी बनाई हों।

आयौ अस खेड़ि अरि सेन अन्तरै,
प्रथिमी गति आकास पथ।
त्रिभुवन नाथ तणौ वेळा तिणि,
रव संभळी कि दीठ रथ।।111।।
उसी समय घोड़ों को हांकते हुए, शत्रु सेना के मध्य तीनों लोकों के स्वामी कृष्ण आ गये। पता ही नहीं चला कि वो पृथ्वी या आकाश किस मार्ग से आये हैं क्योंकि अचानक ध्वनि के साथ ही रथ दिखाई दिया है।

बळिबंध समरथि रथ ले बैसारी,
स्यामा कर साहे सु करि।
वाहर रे वाहर कोइ छै वर,
हरि हरिणाखी जाइ हरि।।112।।
बलि को भी बांधने में समर्थ श्रीकृष्ण ने रुक्मिणी का हाथ पकड़ कर अपने हाथों का सहारा देते हुए रथ में बैठाया और रुक्मिणी की सुरक्षा में लगाये गये सैनिकों को चिढाने के लिए जोर से पुकार कर कहा, रुक्मिणी का कोई वर है तो रक्षा करो क्योंकि कृष्ण मृगनयनी रुक्मिणी का हरण कर ले जा रहा है।

सम्भळत धवळ सर साहुळि सम्भळि,
आळूदा ठाकुर अलल।
पिंड बहुरूप कि भेख पालटे,
केसरिया ठाहे क्रिगल।।113।।
मंगल गीतों का आनंद लेते हुए शिशुपाल के सुसज्जित सरदारों ने जब यह पुकार सुनी तो पहले से पहने हुए केशरिया वस्त्रों को बहरूपिये की तरह तुरंत उतार कर युद्ध के लिए कवच धारण किए।

लारोवरि अस चित्राम कि लिखिया,
निहषरता नरवरै नर।
मांखण चोरी न हुवै माहव !
महियारी न हुवै महर ! ।।114।।
नर श्रेष्ठ श्रीकृष्ण का लगातार पीछा करते घोड़ों पर चढ़े हुये सरदार तेज गति से दोड़ते हुए ऐसे लग रहे हैं मानों तैयार किये गये चित्र हैं। पीछा करते हुये ये वीर ललकार रहे हैं, हे माधव ! ये माखन की चोरी नहीं है, हे गोप ! ये गोपिका नहीं है।

ऊपड़ी रजी मझि अरक एहवौ,
वातचक्र सिरि पत्र वसन्ति।
निव़इ सहस नीसाण न सुणिजै,
वरहासां नासां वाजन्ति।।115।।
घोड़ों के दोड़ने से उड़ती हुई धूल और उससे ढका हुआ सूर्य ऐसा दिखाई दे रहा है मानो मिट्टी भरी हुई हवा के चक्रवात (बतुलिये) के ऊपर पीला पत्ता रखा हुआ है। दोड़ते हुए घोड़ों के नथुनों से इतनी तेज आवाज निकल रही है कि नब्बे हजार नगाड़ों की आवाज़ भी सुनाई नहीं दे।

अळगी ही नैड़ी की ऊख्रवते,
देठाळौ हुवौ दळां दुंह।
वागां ढेरवियां वाहरुए,
मारकुए फेरिया मुंह।।116।।
दोनों सेनाओं के बीच की दूरी को समाप्त करते हुए पीछा करने वाली सेना निकट पहुंच गई। दोनों सेनाओं ने आमने-सामने देखा। आगे दोड़ने वाली सेना (श्रीकृष्ण) ने मुंह फेरा और पीछा करने वाली सेना ने घोड़ों की लगाम को ढीला छोड़ा।

युद्ध – वर्षा रूपक वर्णन –

कठठी बे घटा करे काळाहणि,
समुहे आमहो सामुहै।
जोगिणि आवी आडंग जाणे,
वरसै रत बेपुड़ी वहै।।117।।
दोनों सेनाएं सजकर काली घटनाओं की तरह उमड़ कर आमने-सामने हुई। वर्षा की सम्भावना जानकर जैसे वर्षाकाल में विशेष प्रकार के पक्षी आते हैं उसी प्रकार युद्ध की सम्भावना जानकर योगनियां खप्पर ले कर युद्ध मैदान में पहुंची क्योंकि अब दोनों सेनाएं रक्त की वर्षा करने को तैयार थी।

हथनालि हवाई कुहक बाण हुवि,
होइ वीरहक गैगहण।
सिलहां ऊपरि लोह लोह सर,
मेह बूंद माहे महण।।118।।
हाथी पर लेकर चलने वाली तोपें, हवाई (बारुद निर्मित अस्त्र) तथा बाणों की वर्षा हो रही है। वीर ललकार रहे हैं जिससे आकाश गूंज रहा है। वीरों द्वारा पहने हुए लोहे के कवचों पर लोहे के गिरते हुए बाण ऐसे लग रहे हैं मानों समुद्र में मेह की बूंदें गिर रही हैं।

कळकळिया कुन्त किरण कळि ऊकळि,
वरजित विसिख विवरजित वाउ।
धड़ि धड़ि धबकि धार धारूजळ,
सिहरि सिहरि समरवै सिळाउ।।119।।
बाणों की जो हवा चल रही थी सेनाओं के निकट आने के कारण बंद हो गई। सूर्य की किरणों का रूप धारण कर भाले चमकने लगे जिससे युद्ध भूमि जलने लगी। सैनिकों के सिर-धड़ पर तलवारों के प्रहार हो रहे हैं वो ऐसे लग रहे हैं मानों पर्वतों के शिखर-शिखर पर बिजली की रेखा चमक रही है।

कांपिया उर कायरां असुभ-कारियां,
गाजंते नीसाणे गड़ड़ै।
ऊजळियां धारां ऊवड़ियौ,
परनाळे जळ रुहिर पड़ै।।120।।
कायरों और अशुभ चिंतकों के हृदय कांपते हैं जिस प्रकार बादल गर्जन करने से आमलोगों के अशुभ चिंतक व्यापारियों के हृदय कांपते हैं उसी प्रकार युद्ध के नगारे बजने पर कायरों के हृदय कांप उठते हैं। वर्षा-त्रृतु में जिस प्रकार पानी के नाले बहते हैं उसी प्रकार चमती हुई तरवारों के धारों के प्रहार से वीरों के खून के नाले बहने लगे।

चोटियाळी कूदै चौसठि चाचरी,
ध्रू. ढळियै. ऊकसै धड।
अनंत. अनै सिसुपाल औझड़ै
झड़ मातौ मांडियौ झड़।।121।।
चोटी वाली चौसठ प्रकार की योगिनी रणभूमि में आनन्द से नाच रही हैं। सिर कट रहे हैं, सिर कटे धड़ उठने का प्रयास कर रहे हैं। वर्षा की झड़ी की तरह श्रीकृष्ण एवं शिशुपाल ने बाणों की झड़ी लगा रखी है।

रिण अंगणि तेणि रुहिर रळतळिया,
घणा हाथ हूं पड़इ घणा।
ऊंधा पत्र बुदबुद जळ आकृति,
तरि चालै जोगिणी तणा।।122।।
रणभूमि में शस्त्र वर्षा से वर्षा-त्रृतु के नालों (धाराओं) की तरह खून के नाले भूमि पर बह रहे हैं योगिनियों के हाथों से गिरते हुए नर-मुण्ड उल्टे खप्पर जैसे लगते हैं जो पानी में उठने वाले बुदबुदों की भांति दिखाई दे रहे हैं।

बेली तदि बळभद्र बपूकारै,
सत्र साबतौ अजे लगि साथ।
वूठै वाहवियै आ वेळा,
हळ जीपिस्यै जु वाहिस्इ हाथ।।123।।
अपने साथियों को बलराम ने ललकार कर प्रेरित करते हुए कहा कि शत्रुपक्ष अभी तक जीवित (साबतो) है। इस समय तो बरसते ही खेत बीजने वाली बात लागू होती है, जो जितनी तेजी से युक्ति पूर्ण प्रहार करते हैं, रणभूमि में वही जीतते हैं।

विसरियां विसर जस बीज बीजिजै,
खारी हळाहळां खळांह।
त्रूटै कन्ध मूळ जड़ त्रूटै,
हळधर का वाहतां हळांह।।124।।
दूसरी बार हल चलाकर बलराम युद्ध भूमि में शत्रुओं के लिए विष से भी अधिक कड़वा लगने वाला यश रूपी बीज बोने लगा। बलराम के प्रहार से शत्रुओं के बाहुमूल टूटने लगे। जिस प्रकार किसान द्वारा हल जोतने पर पेड़ पौधों की जड़ें आदि टूट जाती हैं।

घटि घटि घण घाउ घाइ घाइ रत घण,
ऊंच छिंछ ऊछळै अति।
पिड़ि नीपनौ कि खेत्र प्रवाळी,
सिरा हंस नीसरै सति।।125।।
योद्धाओं के शरीर – शरीर (प्रत्येक) में अनेकों घाव हो गये हैं। प्रत्येक घाव में रक्त के फव्वारे छूट रहे हैं। खून से भरा हुआ युद्ध क्षेत्र मूंगों का खेत जैसा लग रहा है। खून के फव्वारे लाल कोपलों जैसे तथा शरीर से निकलने वाले प्राण सचमुच में धान के सिट्टे (बालियां) लग रहे हैं।

बळदेव महाबळ तासु भुजाबळि,
पिड़ि पहरन्तै नवी परि।
बिजड़ां मुहे बेड़ते बळभद्र,
सिरां पुंज कीधा समरि।।126।।
बलदेव महाशक्तिशाली है, वह अपनी भुजाओं के बल से शत्रुओं रूपी अन्नाज की ढेरी पर प्रहार करके तहस-नहस कर रहा है। तलवार रूपी हंसिऐ कि धार से रणक्षेत्र में शत्रुओं के सिर रूपी बालियों को काटकर इक्ठा कर रहा है।

रिण गाहटतै राम खळां रिण,
थिर निज चरण स मेढि थिया।
फिरि चड़ियै संघार फेरता,
केकाणां पाइ सुहग किया।।127।।
रणभूमि रूपी खलियान में शत्रुओं का गाहटन (कुचलना) करनेवाले बलराम के स्थिर पैर खलियान की मेढ (स्तंभ) हैं वह घोड़ों को रणक्षेत्र में घुमा कर शत्रुओं के सिर रूपी धान (अन्नाज के पौधे या ऊपर का भाग) कुचल-कुचल कर अच्छी प्रकार गाहटन कर रहा है।

कण एक लिया किया एक कण कण,
भर खंचे भंजियौ भिड़।
बळभद्र खळै खळां सिरि बैठी,
चारौं पळ ग्रीधणी चिड़।।128।।
युद्ध भूमि के खलियान में बलराम द्वारा कुचले गये योद्धाओं के सिरों को दानों की तरह बीन कर मानों गाड़ी भर कर खैंच कर लाया गया है जिसे चिड़ियों के रूप में गिद्धनियां भक्षण कर रही हैं।
प्रसंगवश – – हम में से अधिकांश जानते हैं कि गाहटा अन्नाज निकालने की एक परम्परागत विधि है जिसमें अन्नाज के पौधे या अग्र भाग को गोलाकार आकृति में फैलाया जाता है, उसके मध्य में स्थम्भ गाड़ा जाता है (कई बार नहीं) उस पर ऊंटों या बैलों को चढा कर गोल आकृति में घुमाया जाता है उनके पैरों से कुचलने पर अन्नाज अलग हो जाता है। पंक्तियों के लेखक ने ऊंट पर बैठ कर गाहटा गाहने का आनंद कई बार लिया है।

सरिखां सू बलभद्र लोह साहियै,
वडफरि ऊछजतै विरुधि।
भलाभली सति तोईज भंजिया,
जरासेन सिसुपाळ जुधि।।129।।
बराबर वाले योद्धाओं से युद्ध करते हुए बलराम ने इस कहावत को साबित कर दिया है कि पृथ्वी पर बड़ों से भी बड़े रहते हैं, तभी तो बलराम ने युद्ध में जरासंध और शिशुपाल को परास्त कर दिया।

आडो अड़ि एकाएक आपड़े,
वाग्यो एम रुषमणी वीर।
अबळा लेइ घणी भुंइ आयौ,
आयौ हूं पग मांडि अहीर।।130।।
श्रीकृष्ण के सामने आकर रुक्मिणी के भाई रुक्मि ने ललकारते हुए कहा, अरे अहीर! इस अबला को लेकर बहुत दूर तक आ गया, अब ठहर, मैं तेरे से मुकाबला करने आया हूं।

विळकुळियौ वदन जेम वाकार् यौ,
संग्रहि धनुख पुणच सर सन्धि।
क्रिसन रुकम आउधि छेदण कजि,
वेलखि अणी मूठि द्रिठि बन्धि।।131।।
रुक्मिणी के भाई रुक्मि द्वारा ललकारे जाने पर श्रीकृष्ण का मुख क्रोध से तमतमा गया और उसके अस्त्रों को काटने के लिए श्रीकृष्ण ने धनुष की प्रत्यंचा चढ़ाते हुए बाण के पुंख भाग और नोक पर मुठ्टी और दृष्टि को बांधा।

रुकमइयौ पेखि तपत आरणि रणि,
पेखि रुषमणी जळ प्रसन।
तणु लोहार वाम कर निय तणु,
माहव किउ सांडसी मन।।132।।
श्रीकृष्ण ने रुक्मि को अहरण पर तपते हुए लोह की भांति तथा रुक्मिणी को शीतल जल की तरह देखा और स्वयं के शरीर को लुहार के बायें हाथ की तरह तथा मन को संडासी बना लिया। अर्थात रुक्मि को देख कर श्रीकृष्ण को क्रोध आ रहा है तथा रुक्मिणी को देख कर प्रसन्नता है।

सगपण ची सनस रुषमणी सन्निधि,
अण मारिबा तणै आळोजि।
ए अखियात जु आउधि आउध,
सजै रुकम हरि छेदै सोजि।।133।।
रुक्मिणी के सानिध्य और सम्बन्ध का लिहाज करते हुए श्रीकृष्ण रुक्म कुमार को मारने का विचार त्याग कर शस्त्रहीन करने का अद्भुत कार्य किया। रुक्म कुमार जो हथियार तैयार करता श्रीकृष्ण उसे काट डालते।

निराउध कियौ तदि सोनानामी,
केस उतारि विरूप कियौ।
छिणियै जीवि जु जीव छण्डियौ,
हरि हरिणाखी पेखि हियौ।।134।।
श्रीकृष्ण ने रुक्म कुमार (सोना नामी) को शस्त्रहीन कर उसके केश काट कुरूप कर दिया, उसे मारा नहीं क्यों कि क्षण मात्र जीवित रहने वाले रुक्म कुमार को रुक्मिणी (मृगनयनी) के मनोभावों को समझ कर जीवित ही छोड़ दिया।

अनुज ए उचित अग्रज इम आखै,
दुसट सासना भली दई।
बहिनि जासु पासै बैसारी,
भलौ काम किउ भला भई।।135।।
हे अनुज ! तुमने यह उचित कार्य किया है। जिस की बहिन को अपने पास बैठाया, उसी को दुष्ट मान कर सजा दी है। बलराम ने व्यंग्य पूर्वक कहा, हे भले भाई ! तुमने तो भला काम किया है।

सुसमित सुनमित निज वदन सुव्रीड़ित,
पुंडरीकाख थिया प्रसन।
प्रथम अग्रज आदेस पाळिवा,
मिरिगाखी राखिवा मन।।136।।
बड़े भाई की बात को सुन कर कमल नयन कृष्ण को प्रसन्नता हुई, मुस्कुराते हुए सिर झुका लिया। एक तो बड़े भाई की आज्ञा का पालन करना और दूसरी मृगनयनी (रुक्मिणी के मन की बात रखनी।

कृत करण अकरण अन्नथा करणं,
सगळे ही थोके ससमत्थ।
हा लिया जाइ लगाया हूंता,
हरि साळै सिरि थापे हत्थ।।137।।
श्रीकृष्ण असम्भव को सम्भव करने वाले तथा हर प्रकार से सामर्थ्यवान हैं। जिन हाथों से रुक्मि कुमार के सिर के बाल उतार लिए थे, उन्हीं हाथों को रुक्मि के सिर पर फेर कर बाल लगा दिये।

परदळ पिण जीपि पदमणी परणे,
आणंद उभै हुआ एकार।
वहतै कटकि माहि वादोवदि,
वाधण लागा वधाइहार।।138।।
कृष्ण ने शत्रुपक्ष (परदळ) को पराजित कर रुक्मणी से विवाह किया। एक साथ दो प्रकार के आनन्द प्राप्त हुए। इस कारण चलती हुई सेना में से बधाईदारों में आगे पहुंचने की होड लग गई।

ग्रिह काज भूलिग्या गृहि गृहि ग्रहगति,
पूछीजै चिन्ता पड़ी।
मन अरपण कीधै हरि मारग,
चाहै प्रज ओटे चढी।।139।।
द्वारिका में कृष्ण के कुंदनपुर जाने के पश्चात सभी लोग चिन्ताग्रस्त हैंं एवं घर के समस्त काम भूलगये हैं। द्वारिका के नागरिक कृष्ण के लोटने वाले मार्ग की तरफ ऊंचे चढकर इन्तज़ार कर रहे हैं।

देखतां पथिक उतामळा दीठा,
झांखाणा उरि उठी झळ।
नीळ डाळ करि देखि नीळाणा,
कुससथळी वासी कमळ।।140।।
मार्ग की तरफ देखते हुए नगरवासियों को दूर मार्ग पर दोड़ते हुए पथिक आते दिखाई दिये तो अनिष्ट की सम्भावना जानकर एक बार तो चिन्तित हो गये लेकिन उनके हाथों में हरी डालियां दिखाई दी तो उन्हें बधाईदार जानकर द्वारिका वासी (कुससथळी) कमल की तरह खिल उठे।

सुणि आगम नगर सहू साऊजम,
रुषमिणि कृसन वधावण रेसि।
लहरिउं लियै जाणि लहरीरव,
राकादिन दरसण राकेसि।।141।।
श्रीकृष्ण-रुक्मिणी के आगमन की सूचना जानकर नगरवासी उत्साह से बधाई देने हेतु तैयार हो गये। एक साथ समूह में उमड़े हुए नर-नारी ऐसे लग रहे थे मानों पूर्णिमा के दिन पूर्ण चन्द्रमा के दर्शन कर समुद्र हिलोरें लेने लग रहा है।

वधाउआं गृहे गृहे पुरवासी,
दळिद्र तणौ दीधौ दळिद्र।
ऊछव हुआ अखित ऊछळिया,
हरी द्रोब केसर हळिद्र।।142।।
बधाईदारों को घर-घर से नगरवासियों ने इतना पुरस्कार दिया कि उनकी दरिद्रता समाप्त हो गई अर्थात उनकी दरिद्रता को भी दरिद्र कर दिया।

नर मारगि एक एक मगि नारी,
क्रमिया अति ऊछाह करेउ।
अंकमाळ हरि नयर आपिवा,
बाहां तिकरि पसारी बेउ।।143।।
एक मार्ग से नर और दूसरे मार्ग से नारी मांगलिक कलश आदि ले उमंग से भर कर स्वागत के लिए प्रस्थान किया। यह दृश्य ऐसा लग रहा है मानो श्रीकृष्ण का स्वागत करने के लिए द्वारिकापुरी अपनी दोनों बाहें फैला कर आगे बढ रही है।

वीजळि दुति दंड मोतिए वरिखा,
झालरिए लागा झड़ण।
छत्रे अकास एम औछायौ,
घण आयौ किरि वरण घण।।144।।
स्वागत के लिए तैयार किए गए सोने के छत्रों के दण्ड बिजली की तरह चमक रहे थे तथा उनकी झालरों से झड़ते हुए मोती वर्षा की बूंदों के समान हैं। छत्रों से आकाश इस प्रकार छाया हुआ था मानो बादल अनेक रंग ले कर छाये हुए हैं।

मुकरमै प्रोळि प्रोळिमै मारग,
मारग सुरंग अबीरमई।
पुरि हरि सेन एम पैसार् यौ,
नीरोवरि प्रवसन्ति नई।।145।।
शीशे से सजे हुए अनेक स्वागत द्वार नगर में शोभायमान थे इन मार्गों पर रंग अबीर बिखरा हुआ था सजे हुए द्वारों से श्रीकृष्ण की सेनाएं इस प्रकार प्रवेश कर रही थी मानो समुद्र में नदी ने प्रवेश किया है।

धवळहरे धवळ दियै जस धवळित,
धण नागर देखे सधण।
सकुसळ सबळ सदळ सिरि सामळ,
पुहप बूंद लागी पड़ण।।146।।
यश से उज्जवल चतुर श्रीकृष्ण को वधू के साथ देख ऊंचे महलों पर चढ कर स्त्रियां मांगलिक गीत गाने लगी। सकुशल, बलराम और सेना के साथ लौट कर आये समर्थ श्रीकृष्ण पर चारों ओर से पुष्प वर्षा होने लगी।

जीपे सिसुपाळ जरासिंधु जीपे,
आयौ गृहि आरती उतारि।
देखे मुख वसुदेव देवकी,
वार वार वारै पै वारि।।147।।
शिशुपाल और जरासंध को जीत कर आये श्रीकृष्ण के घर पहुंचने पर आरती उतारी जा रही है। वसुदेव और देवकी उसके मुख को देख कर बार-बार ऊपर से जल वार (अंवार) कर न्योछावर कर रहे हैं।

विधि सहित वधावे वाजित्र वावे,
भिन भिन अभिन बाणि मुख भाखि।
करै भगति राजान क्रिसन ची,
राजरमणि रुषमिणि गृह राखि।।148।।
विधिपूर्वक सत्कार कर एवं बाजे बजा तथा मुख से विभिन्न प्रकार यशोगान कर राजमहल वासियों ने स्वागत किया। राजागण श्रीकृष्ण के गुणगान कर रहे हैं। राजपरिवार की स्त्रियों ने रुक्मिणी को रनिवास में प्रवेश करवाया।

दैवग्य तेड़ि वसुदेव देवकी,
पहिलौ ई पूछै प्रसन।
दियौ लगन जोतिख ग्रंथ देखे,
कइ परणै रुषमणी क्रिसन।।149।।
ज्योतिषियों को बुलाकर वसुदेव – देवकी ने पहला प्रश्न यह पूछा कि ज्योतिष ग्रंथ देख कर बताओ, कृष्ण-रुक्मिणी का विवाह किस शुभ मुहूर्त में हो?

वेदोगत धरम विचारि वेदविद,
कम्पित चित लागा कहण।
हेकणि सुत्री सरिस किम होवै,
पुनह पुनह पाणिग्रहण।।150।।
शास्त्रों में कथित धर्म का विचार कर भयभीत से हुए वेदज्ञाता ज्योतिष के ग्रंथ देख कर कहने लगे कि एक ही स्त्री के साथ बार-बार विवाह कैसे हो सकता है ?

निरखे तत्काळ त्रिकाळ निदरसी,
करि निरणै लागा कहण।
सगळे दोख विवरजित साहौ,
हूंतौ जई हूऔ हरण।।151।।
भूत, भविष्य, वर्तमान, इन तीनों कालों की गणना कर ज्योतिषियों ने तुरंत निर्णय कर कहा कि सब दोष रहित मुहूर्त तो उस समय बना जब रुक्मिणी का हरण हुआ।

वसुदेव देवकी सूं व्राहमणे,
कही परसपर एम कहि।
हुए हरण हथलेवौ हूऔ,
सेस संसकार हुवइ सहि।।152।।
वासुदेव देवकी से ब्राह्मणों ने आपस में विचार विमर्श कर कहा कि हरण के समय हाथ पकड़ते ही हथलेवा हो गया, शेष संस्कार अब किये जा सकेंगे।

विप्र मूरति वेद रतनमै वैदी,
वंस आद्र अरजुनमैं वेह।
अरणी अगनि अगरमै इन्धण,
आहुति घृत घणसार अछेह।।153।।
विवाह संस्कार कराने के लिए वेदमूर्ति ब्राह्मण आये, रत्नजड़ित वेदिका तैयार की गई, सोने-चांदी के कलश हरे बांसों के बीच बांधे गये। अरणि(एक वृक्ष का नाम) की लकड़ी से अग्नि प्रज्वलित की और अगरु की समिधा बनाई तथा कपूर व घी की लगातार आहुतियां दी जाने लगी।

पच्छिम दिसि पूठ पूरब मुख परठित,
परठित ऊपरि आतपत्र।
मधुपर्कादि संसकार मण्डित,
त्री वर बे बैसाणि तत्र।।154।।
पश्चिमी दिशा में पीठ व पूर्व दिशा में मुख करके परिस्थित किया और ऊपर छत्र स्थापित किया। मधुपर्व आदि संस्कारों से शोभित वहां पर वधू और दूल्हा दोनों को बैठाया।

आरोपित आंखि सहू हरि आननि,
गरभ उदधि ससि मछे गृहीत।
चाहै मुख अंगणि ओटे चढि,
गावै मुखि मंगळ करि गीत।।155।।
उपस्थित सभी स्त्रियों की आंखें कृष्ण पर केंद्रित हैं जिससे ऐसा लग रहा है मानो समुद्र के गर्भ में मछलियों से घिरा हुआ चन्द्रमा है। श्रीकृष्ण के मुख को देखते हुए ऊंची अटारियों में चढी हुई स्त्रियां मंगल गीत गा रही हैं।

आगळै प्रिया प्री चौथे आंरभि,
फेरा त्रिण्हि इण भांति फिरि।
कर सांगुसट ग्रहण कर सूं करि,
करी कमळ चम्पियौ किरि।।156।।
तीन फेरों में वधू (रुक्मिणी) आगे रही तथा चौथे फेरे के प्रारंभ में वर श्रीकृष्ण आगे हुए। इस समय अंगुठे सहित वधु का हाथ वर ने ग्रहण पकड़ रखा है, यह दृश्य ऐसा लग रहा है मानो कमल के फूल को हाथी ने सूंड से पकड़ रखा है।

पधरावि त्रिया वामै प्रभणावे,
वाच परसपर यथाविधि।
लाधी वेळा मांगी लाधी,
निगम पाठके नवे निधि।।157।।
वधू को बायीं ओर बैठा कर पंडितों ने विधिपूर्वक दोनों (श्रीकृष्ण-रुक्मिणी) से प्रतिज्ञाएं करवाई। इस प्रकार सब को मुंह-मांगा शुभ समय मिला और ब्राम्हणों ने इस शुभ कार्य को कर नव निधियां प्राप्त की।

– रुक्मिणी और कृष्ण का मिलन –

दूलह हुइ आगइ, पाछइ दुळहणि,
दीना क्रम सूण-हर दिसि।
छंडि चउंरी हथळेवइ छूटइ,
मन बंधे अंचळां मिसि।।158।।
चंवरी को छोड़कर दूल्हा (कृष्ण) आगे और दुलहिन(रुक्मिणी) पीछे शयन गृह की तरफ धीरे-धीरे चले। हथलेवा अलग करने पर चंवरी को छोड़कर चले लेकिन मन अंचल(वस्त्रों के छोर) के बहाने बंधे हुए हैं।

आगइ जाइ आलि केळि-ग्रह अंतरि,
करि अंगण मारजण करेण।
सेज-वियाजि खीर-सागर सजि,
फूल-वियाजि सजे तसु फेण।।159।।
आगे जाकर सखियों ने क्रीड़ा भवन के भीतर हाथों से आंगन की सफाई की और शय्या के बहाने क्षीरसागर को तथा फूलों के बहाने उस पर फेन राशि को सजाया। अर्थात शय्या क्षीरसागर की भांति और उस पर सजे हुए फूल सागर के फैन की तरह दिखाई दे रहे थे।

आभा चित्र रचित तेणि रंगि अनि अनि,
मणि दीपक करि सूध मणि।
मांडि रहे चन्द्रवा तणै मिसि,
फण सहसेई सहस फणि।।160।।
रंगमहल में शय्या के ऊपर चांदनी में अलग-अगल प्रकार के रंग प्रयोग में लिये गये हैं तथा उसमें मणियों के दीपक सजाए हुए हैं उससे विचित्र शोभा हो रही है। चांदनी में लगे हुए चंदोवा ऐसे लग रहे हैं मानों चांदनी के बहाने शेषनाग के हजारों फन फैले हुए हैं।

मन्दिरन्तरि किया खिणन्तरि मिळिवा,
विचित्रे सखिए समाव्रित।
कीधइ तिणि वीवाह संसक्रिति,
करण सु तणु रति संसक्रित।।161।।
रुक्मिणी के रति संस्कार के लिए एकत्रित सखियों ने विवाह की रीतियां सम्पन्न हो जाने के बाद चतुराई से उन दोनों को अलग – अलग महलों में भेज दिया।

संकुड़ित समसमा सन्ध्या समयै,
रति वंछिति रुषमणि रमणि।
पथिक वधू द्रिठि पंख पंखियां,
कमळ पत्र सूरिज. किरणि।।162।।
संध्या के समय पथिक वधू की दृष्टि (पथिक वधू द्रिठि), पक्षियों के पंख, कमल के पत्ते, सूर्य की किरणें एक साथ संकुचित हो जाते हैं। इसी तरह रमणी रुक्मिणी भी रति की इच्छा करती हुई संकुचित हो रही थी।

पति अति आतुर त्रिया मुख पेखण,
निसा तणौ मुख दीठ निठ।
चन्द्र किरणि कुलटा सु निसाचर,
द्रवडित अभिसारिका द्रिठ।।163।।
पति(श्रीकृष्ण) पत्नी से मिलने के लिए व्याकुल हैं इसलिए बड़ी कठिनाई से समय व्यतीत किया और रात्रि का मुख देखा। रात्रि में चंद्रमा की किरणें, व्यभिचारिणी स्त्रियों व निशाचरों के क्रियाकलाप तथा अभिसारिका की दृष्टि में फैलाव (विस्तार) होनें लगता है।

अनि पंखि बन्धे, चक्रवाक असन्धे,
निसि संधे इमि अहोनिसि।
कामिणि कामि तणी कामागनि,
मन लाया दीपकां मिसि।।164।।
दिन-रात के मिलन पर अन्य पक्षी(नर-मादा) तो मिले लेकिन चकवा-चकवी बिछुड़ गये। संध्या के समय घरों में जलते हुए दीपक ऐसे लग रहे हैं मानों कामी नर-नारियों की कामाग्नि प्रज्वलित हो रही है।

ऊभी सहु सखिए प्रसंसिता अति,
क्रितारथी प्री मिळण कृत।
अटत सेज द्वार विचि आहुटि,
स्रुति दे हरि घरि समाश्रित।।165।।
सब सखियों द्वारा प्रशंसित व कृतार्थ हुई रुक्मिणी द्वार के पास खड़ी हैं। उधर कृष्ण प्रिया मिलन के लिए महल में शय्या और द्वार के बीच प्रत्येक आहट पर कान लगाये हुए हैं।

हंसागति तणौ आतुर थ्या हरि सूं,
वाधाऊवा जेही वहे।
सूंधावास अनै नेउर सद,
क्रमि आगै आगमन कहे।।166।।
मिलन के लिए व्याकुल कृष्ण को द्रव्यों की खुशबू एवं नूपुर के शब्दों नै बधाईदारों की तरह आगे पहुंच कर हंस की गति से आ रही रुक्मिणी के आगमन की सूचना दे दी।

अवलम्बि सखी कर पगि पगि ऊभी,
रहती मद वहती रमणि।
लाज लोह लंगरे लगाए,
गय जिमि आणी गयगमणि।।167।।
सखी के हाथ का सहारा लेकर संकोच से कदम-कदम पर खड़ी रहते हुए यौवन मद को बहाती हुई लाज रूपी लोहे का लंगर लगाये हुए गजगामिनी रुक्मिणी को सखियों ने रंगमहल तक पहुंचाया।

देहली धसति हरि जेहड़ि दीठी,
आणंद को ऊपनौ अमाप।
तिण आपही करायौ आदर,
ऊभा करि रोमां सूं आप।।168।।
देहरी में प्रवेश करते हुए रुक्मिणी को ज्यों ही कृष्ण ने देखा तो उनके ह्रदय में आनन्द प्रकट हुआ जिससे रोम रोम खड़ा हो गया। इस कृत्य ने रुक्मिणी का अपने आप ही स्वागत करवा दिया।

वहि मिळी घड़ी जाइ घणा वांछता,
घण दीहां अन्तरै घरि।
अंकमाळ आपे हरि आपणि,
पधरावी त्री सेज परि।।169।।
कृष्ण के मन में रुक्मिणी से मिलन के जिस क्षणों (घड़ी) की तीव्र इच्छा थी वह लम्बे समय के पश्चात घर में ही प्राप्त हुआ। हरि ने अपने अंक में लेकर प्रिया को शय्या पर बैठाया।

अति प्रेरित रूप आंखियां अ-त्रिपत,
माहव जद्यपि त्रिपत-मन।
वार-वार तिम करइ विलोकण,
धण-मुख, जेही रंक धन।।170।।
कृष्ण की आंखें अति प्रेरित रूप के द्वारा अतृप्तह हैं यद्यपि मन तृप्त है लेकिन फिर भी प्रिया के मुख को बार-बार देख रहे हैं, जैसे दरिद्र धन को बार बार देखता है

आजाति जाति पट घूंघट अन्तरि,
मेळण एक करण अमिळी।
मन दम्पती कटाछि दूति-मय,
निय मन सूत्र कटाछि नळी।।171।।
अभितक न मिले हुए दम्पतियों के मनों को मिलाने के लिए रुक्मिणी के नेत्रों की कटाक्ष रूपी दूती घूंघट के भीतर-बाहर बार-बार आ जारही। अर्थात घूंघट में से रुक्मिणी का देखना दूती का कार्य कर रहा है।

वर नारि नेत्र निज वदन विलासा,
जाणियौ अंतहकरण जई।
हसि हसि भ्रूहे हेक हेक हुइ,
गृह बाहरि सहचरी गई।।172।।
वर – वधू के नेत्रों एवं मुख के हाव भाव से उनके हृदयों के भावों को जब सखियों ने समझ लिया तब वे भौंहों में मुस्कराती हुयी एक – एक करके शय्यन कक्ष से बाहर चली गयी।

एकंति उचित क्रीड़ा-चउ आरंभ,
दीठउ सु न किहि देव-दुजि।
अ-दिठ अ-स्रुत किम कहणउ आवइ,
सुख तइ जाणणहार सु-जि।।173।।
एकांत में करने योग्य क्रीड़ा का प्रारंभ हुआ। जिसे किसी देव या द्विज ने नहीं देखा। न देखा हुआ, न सुना हुआ का वर्णन कैसे किया जावे ? उस सुख को तो भोग करने वाले दंपति ही जानते हैं।

पति पवन प्रारथित, त्री तत्र निपतित,
सुरति अति एहवी सिरी।
गजेन्द्र क्रीड़तां सु वियाकुल-गति,
नीरासइ परि कमळिणी।।174।।
पति(कृष्ण) को पवन की चाह हुई। पत्नी (रुक्मिणी) रति के अंत में थक कर पड़ी है जो सरोवर में हाथी के क्रीड़ा करने से अति व्याकुल दशा प्राप्त कमलिनी के समान लग रही हैं।

कीधै मधि माणिक हीरा कुन्दण,
मिळिया कारीगर मयण।
स्यामा तणै ललाट सोहिया,
कुंकुम विन्दु प्रसेद कण।।175।।
कामदेव रूपी कारीगर ने मानों लालमणी को बीच में रखकर सोने पर हीरे जड़े हों। ऐसा दृश्य रुक्मिणी के ललाट पर कुंकुम के टीके के चारों तरफ शोभायमान पसीनें की बूंदों से बना है।

त्री वदन पीतता चित व्याकुलता,
हियै ध्रगध्रगी खेद हुह।
धरि चख लाज पगे नेउर धुनि,
करे निवारण कंठ कुह।।176।।
वधू का मुख फीका पड़ गया, चित व्याकुल हो गया, ह्रदय में धुकधुकी शुरु हो गई एवं मन में अत्यधिक खिन्नता महसूस हो रही थी। उसने लज्जा से आंखों पर घूंघट डाल लिया था। पैरों में नूपुरों की ध्वनि एवं कंठ से कोयल सा मधुर स्वर बंद हो गया

तिण तालि सखी गळि स्यामा तेही,
मिळी भमर भारा जु महि।
वळि ऊभि थई घणा घाति वळ,
लता केळि अवलंब लहि।।177।।
शय्या पर लेटी हुई रुक्मिणी सखी के गले से लिपट कर पुनः उसी प्रकार खड़ी हो गई जैसे भ्रमरों के भार से पृथ्वी पर पड़ी हुई कोई लता कदली के सहारे से अपने में अनेक बल डाल कर फिर से खड़ी हो गई हो।

पुनरपि पधरावी कन्है प्राणपति,
सहित लाज भय प्रीति सा।
मुगत केस त्रूटी मुगतावलि,
कस छूटी छुद्र घंटिका।।178।।
लज्जा, भय एवं प्रेम से भरी हुई रुक्मिणी को सखियों ने श्रीकृष्ण के पास पुनः पहुंचाया। उस समय रुक्मिणी के बाल खुले हुए थे, मोतियों की माला छिन्न-भिन्न थी, कंचुकी के बंधन ढीले पड़े हुए थे और करधनी खुल गई थी।

सुख लाधै केलि स्याम स्यामा संगि,
सखिए मनरखिए संघट।
चौकि चौकि ऊपरि चित्रसाळी,
हुई रहियौ कहकहाहट।।179।।
कृष्ण ने जिस समय रुक्मिणी के साथ संसारिक सुख प्राप्त किया, उनसे मन रखनेवाली सखियाँ जो रंगमहल में थी उनके मध्य हास्यविनोद की बातें होने लगी

राता तत-चिंता रत-चिंता रत,
गिरि-कंदरि घरि बिन्हे गण।
निद्रा-वसि जगि ऐहु हा-निसि,
जामिऐ. कामिऐ. जागरण।।180।।
समस्त संसार अर्द्धरात्रि में जिस समय नींद में डूबा रहता है योगियों व कामियों का ही जागरण होता है। पर्वत की गुफाओं में योगीजन तत्वचिंतन में डूबे रहते हैं और कामीजन रति के चिंतन में लीन रहते हैं।

लिखमीवर हरख निगरभर लागी,
आयु रयणि त्रूटन्ति इम।
क्रीड़ाप्रिय पोकार किरीटी,
जीवितप्रिय घड़ियाल जिम।।181।।
हर्षित लक्ष्मीपति को रात बीतने के सूचक मुर्गे की पुकार इतनी अप्रिय लगी जितनी प्राणों से मोह रखने वाले व्यक्तियों को घड़ियाल का शब्द अप्रिय लगता है।

गत प्रभा थियौ ससि रयणि गळन्ति,
वर मन्दा सइ वदन वरि।
दीपक परजळतौ इ न दीपै,
नासफरिम सू रतनि नरि।।182।।
रजनी के बीतने पर तेजहीन चन्द्रमा ऐसे लगता है जैसे पति की अस्वस्थता के समय सती पत्नी का उदास मुख हो। जलता हुआ दीपक भी शोभा नहीं दे रहा है जैसे मनुष्य में आज्ञा-भंग होने पर वीरता शोभा नहीं देती।

मेली तदि साध्र सुरमण कोक मनि,
रमण कोक मनि साध्र रही।
फूले छंडी वास प्रफूले,
ग्रहणे सीतळताइ ग्रही।।183।।
प्रातः काल होते ही चकवे में क्रीड़ा की इच्छा जाग्रत हुई। जो व्यक्ति कोक शास्त्र के अनुसार रमण करते हैं प्रभात होते ही इच्छा निवृत हो गए। फूलों ने खिल कर सुगन्ध छोड़ी तथा आभुषणों ने शीतलता धारण की।

घुनि उठी अनाहत संख भेरि धुनि,
अरुणोदय थियौ जोग अभ्यास।
माया पटल निसामै भंजै,
प्राणायामे ज्योति प्रकास।।184।।
सूर्योदय के साथ ही योगाभ्यास प्रारंभ हुआ। शंख तथा भेरी का शब्द रूपी अनहद नाद सुनाईं देने लगा। माया के पर्दे का रूप धारण किए हुए रात्रि का अंधकार हट गया। सूर्य ज्योति के साथ ही मानों प्रणायाम द्वारा ईश्वरीय ज्योति का प्रकाश दिखाई देने लगा हो।

संजोगिणि – चीर रई कैरव – श्री,
घर हट ताळ भमर गोधोख।
दिणयर ऊगि एतला दीधा,
मोखियां बंध बंधियां मोख।।185।।
सूर्य के उदय होने से रात्रि में मुक्त रहने वाली संयोगिनी स्त्रियों के वस्त्रों को, मथानी (रई) को और कुमुदिनी की शोभा को बंधन दे दिया और रात्रि के बंधन में रहने वाले घरों, बाजारों, तालों, भ्रमर एवं गौशालाओं को मुक्त कर दिया।

वाणिजां वधू गो वाछ असइ विट,
चोर चकव विप्र तीरथ वेळ।
सूर प्रगटि एतला समपिया,
मिळियां विरह विरहियां मेळ।।186।।
सूर्य के उदय होने से रात्रिभर साथ रहने वाले व्यापारियों को उनकी पत्नियों से, गायों को उनके बछड़ों से तथा कुलटा स्त्रियों को लम्पटों से अलग होना पड़ा। और चोरों से उनकी पत्नियों से, चकवे को चकवी से तथा ब्राह्मण को घाट के पवित्र जल से मिला दिया।
असइ-विट =कुलटाओं और कामुकों, विप्र तीरथ वेळ =ब्राह्मणों और घाटों के जलों

– ग्रीष्म त्रृतु-वर्णन –

नदि दीह वधे, सर-नीर घटे निसि,
गाढ धरा द्रव हेम-गिरि।
सु-तरु छांह तदि दीध जगत-सिरि,
सूर राह किय जगत-सिरि।।187
वेलि का रचनाकार लिखता है कि ग्रीष्म ऋतु के आने पर नदि और दिन बढने लगे हैं, सरोवर का जल और रात्रि घटने लगे। पृथ्वी कठोर हो गई है तथा हिमालय नरम हो कर पिंघल रहा है सूर्य ने जगत के सिर से मार्ग बनाया तो सुंदर वृक्षों ने उनके सिर पर छाया की।

आकुळ थ्या लोक, केहवउ अचिरज?
वंछित छाया, ए विहित।
सरण हेम-दिसि लीधउ सूरिज,
सूरिज – ही. व्रिख-आसरित।।188।।
व्याकुल हुए लोग छाया की इच्छा करते हैं तो इसमें आश्चर्य की क्या बात है? क्यों कि सूर्य भी वृष राशि में आकर उतरायण हो गया है।

स्रीखंड-पंक कुमकुमउ सलिल सरि,
दळि मुगता- आहरण- दुति।
जळ-क्रीड़ा क्रीड़ंति जगत-पति,
जेठ मासि एही जुगति।।189।।
श्रीकृष्ण ज्येष्ठ मास में शरीर पर आभावान मोतियों की माला धारण किए हुए, चंदन के कीच व गुलाब जल युक्त वाले तालाब में जल विहार (क्रीड़ा) करने लगे।
श्रीखंड-पंक=चन्दन का कीच, कुमकुमउ=गुलाब जल

मिळि माह तणी माहुटि-सूं मसि-व्रन,
तपि आसाढ तणउ तपन।
जण न्रीजण-पण अधिक जाणियउ,
मध्य-रात्रि प्रति मध्याहन।।190।।
माह मास में मावठ की वर्षा के समय घंनघोर बादलों से होने वाली अंधेरी रात्रि की अपेक्षा आषाढ़ में तपते हुए सूर्य के कारण दिन में निर्जन सन्नाटा ज्यादा हो जाता है।
माह तणी =माह मास की, माहुटि =मावठ (माह मास में होने वाली वर्षा), मसि-व्रन=काले वर्ण की, न्रीजण-पण =सन्नाटा (आवागमन बंद होना)।

नैरन्ति प्रसरि निरधण गिरि नीझर,
धणी भजै धण पयोधर।
झीळे वाइ किया तरु झंखर,
तवळी दहन कि लू लहर।।191।।
नैत्रृत्यकोण (दक्षिण – पश्चिम) चलनेवाली हवा के कारण पेड़-पौधे सूख कर झंखाड़ हो गये हैं। बेलों को जला दिया है। ऐसी स्थिति में पत्नी रहीत ने पहाड़ो व झरनों का तथा प्रिया वालों ने पत्नी के स्तनों का आश्रय लिया है।

कसतूरी गारि कपूर ईंट करि,
नवै विहाणै नवी परि।
कुसुम कमळ दळ माळ अलंक्रित,
हरि क्रीड़ै तिणि धवळहरि।।192।।
कसतूरी का गारा व कपूर की ईंटों से बनाए गए अपने महल में कमल पुष्पों की माला को धारण करने वाले श्रीकृष्ण प्रत्येक नए दिन नए-नए प्रकार से जल विहार करते हैं।

ऊपड़ी धुड़ी रवि लागी अम्बरि,
खेतिए ऊजम भरिया खाद्र।
मृगशिर वाजि किया किंकर मृग,
आद्रा वरसि कीध धर आर्द्र।।193।।
मिट्टी उड़कर सूर्य से जा लगी है। मृगशिरा नक्षत्र में प्रचण्ड वायु ने चल कर मृगों को व्याकुल कर दिया है। आद्रा नक्षत्र में मेघों ने वर्षा करदी है। किसान खेती का कार्य करने लगे हैं। वर्षा के कारण पृथ्वी सजल हो गई है।

– वर्षा वर्णन –

बग रिखि राजान सु पावसि बैठा,
सुर सूता थिउ मोर सर।
चातक रटै बलाहकि चंचळ,
हरि सिणगारै अम्बहर।।194।।
वर्षा त्रृतु के आगमन के साथ ही बगुलों, त्रृषियों व राजाओं ने यात्रा बंद कर एक जगह ही ठहर गए हैं। देवता सो गये हैं। मोर और चातक बोलने लगे हैं। सारस आकाश में उड़ने लगे हैं। बादलों के द्वारा इन्द्र आकाश को सजाने लगे हैं।

काळी करि कांठळि ऊजळ कोरण,
धारे श्रावण धरहरिया।
गळि चालिया दिसो दिसि जळग्रभ,
थंभि न विरहिण नयण थिया।।195।।
सावण की काली घटाओं व उनको घेरे हुए सफेद घटाओं ने मूसलाधार वर्षा करना प्रारंभ कर दिया है। दशों दिशाओं में बादल मानों पिघल गये हैं जो रुक नहीं रहे हैं। बरसने वाले बादल विरहिणी नारी के नेत्र बने हुए हैं जो लगातार बरस रहे हैं (आंसूं बहा रहे हैं)

वरसतै दड़ड़ नड़ अनड़ वाजिया,
सघण गाजियौ गुहिर सदि।
जळनिधि ही सामाई नहीं जळ,
जळबाळा न. समाइ जळदि।।196।।
बरसते समय ‘दड़दड़’ की आवाज़ के साथ पर्वतों के नाले तीव्र आवाज कर रहे हैं। बादलों की घनघोर घटाएं बहुत जोर से बरस रही हैं। जल की बाला बिजली बादलों में समा नहीं रही है और अत्यधिक मात्रा में बरसने वाला जल समुंदर में नही समा रहा है।

निहसे वूठौ घण विणु नीलाणी,
वसुधा थळि थळि जळ वसइ।
प्रथम समागम वसत्र पदमणी,
लीधे किरि ग्रहणा लसइ।।197।।
बिना हरियाली के स्थानों पर बादल खूब गरज कर बरस रहे हैं। जगह-जगह पानी भरा हुआ है पृथ्वी का यह दृश्य ऐसा लग रहा है कि प्रथम समागम के समय किसी स्त्री के वस्त्र उतार लिए गये हैं और केवल गहने सुशोभित हो रहें।

तरु लता पल्लवित तृणे अंकुरित,
नीलाणी नीळम्बर न्याइ।
प्रथमी नदिमै हार पहरिया,
पहिरे दादुर नूपुर पाइ।।198।।
पेड़ और बेलें नये पत्तों से युक्त हो गये हैं। सूखे तरुण भी अंकुरित हो रहे हैं। पृथ्वी की हरियाली ऐसी लग रही है जैसे नायिका ने हरी साड़ी पहन कर नदी रूपी हार से सुशोभित होकर मेंढक रूपी नूपुर धारण किए हुए हैं

काजळ गिरि धार रेख काजळ करि,
कटि मेखला पयोधि कटि।
मामोलौ बिन्दुलौ कुंकूंमै,
पृथिमी दीध निलाट पटि।।199।।
वर्षा के बाद पृथ्वी रूपी नायिका ने धुली हुई स्याम पर्वत श्रेणियां रूपी काजल को लगा लिया है। समुद्र रूपी करधनी को धारण किया है तथा बीर बहूटी (मामोली) रूपी कुंकुम की बिन्दी को लगा लिया है।

मिळियै तटि ऊपटि बिथुरी मिळिया,
धण धर धराधर धणी।
केस जमण गंग कुसुम करम्बित,
वेणी किरि त्रिवेणी वणी।।200।।
पृथ्वी रूपी पत्नी का मेघ रूपी पति से मिलन होने के कारण प्रसन्न होकर फैलाव हुआ है अर्थात अधिक वर्षा हो गई है जिसके कारण यमुना का स्याम जल एवं गंगा का श्वेत जल दोनों मिल कर एक हो गये हैं। मानो पृथ्वी त्रिवेणी का रूप धारण किए हुए नायिका के समान है जिसकी फूलों से गुंथी हुई वेणी समागम के उपरांत बिखर गई है।

धर श्यामा सरिस स्यामतर जळधर,
गेघूंबे गळि बाहां घाति।
भ्रमि तिणि सन्ध्या वंदन भूला,
रिखिय न लखे सकै दिन राति।।201।।
पृथ्वी रुक्मिणी के सदृश है, बादल कृष्ण के समान हैं। दोनों गलबहियां डालकर एक हो गए हैं। इस स्थिति में ऐसा अंधकार छाया कि तपस्वी भ्रम में पड़कर दिन रात का अन्तर न समझते हुए सन्ध्या वंदन करना भूल गए हैं।

रूठा पै लागि मनावि करे रस,
लाधी देह तणौ गिणि लाभ।
दम्पतिए आलिंगन दीधा,
आलिंगन देखे धर आभ।।202।।
रूठे हुए दम्पति पृथ्वी और मेघ के आलिंगन को देख कर मानव शरीर का लाभ उठाने के लिए परस्पर पैर पकड़ कर मनाते हैं और आलिंगन करते हुए संसारिक क्रीड़ा कर रहे हैं।

जळजाळ श्रवति जळ काजळ ऊजळ,
पीळा हेक राता पहल।
आधोफरै मेघ ऊधसता,
महाराज राजै महल।।203।।
जिस महल में महाराज श्रीकृष्ण विराजे हुए हैं उस महल के छज्जों से पीले एवं लाल रंग के बादल स्पर्श कर रहे हैं। काले और सफेद बादल सर्वत्र जल बरसा रहे हैं।

करि ईंट नीळमणि कादो कुंदण,
थम्भ लाल पट पांचि थिर।
मंदिरे गौख सु पदमरागमै,
सिखरि सिखि रमै मन्दिर सिर।।204।।
नीलम की ईंटों, स्वर्ण मिश्रित गारा (मसाला) लालमणी के स्तम्भ और पांच प्रकार के रत्नों से निर्मित छत के मजबूत आधार (शहंतीर) व पद्मराग मणि के झरोखों वाले महलों के शिखरों पर मोर नृत्य कर रहे हैं।

धरिया तनि वसत्र कुमकुमै धोया,
सौंधा प्रखोळित महल सुख।
भर श्रावणि भाद्रवि भोगविजै,
रुषमणि वर एहवी रुख।।205।।
गुलाब जल से धुले हुए वस्त्रों पर सुगन्धित पदार्थ छिड़क कर सुवासित महलों में रुक्मिणी के पति श्रीकृष्ण ने सावन-भादों में सुख प्राप्त किया।

– शरद त्रृतु-वर्णन –

विरखा रितु गई सरद रितु वळती,
वखाणि सु वयणा वयणि।
नीखर धर जळ रहिउ निवाणे,
निधुवनि लज्जा त्री नयणि।।206।।
वर्षा त्रृतु बीतने के उपरांत शरद ऋतु का आगमन हुआ, जिसका विविध प्रकार से बखान किया जाता है। वर्षा-त्रृतु का धूल मिश्रित पानी अब निर्मल होकर जलाशय आदि नीचे स्थानों पर इस प्रकार इक्ठा हो गया है जैसे संसारिक क्रीड़ा के समय लज्जा स्त्री के आंखों में सिमट जाती है।

पीळाणी धरा ऊखधी पाकी,
सरदि काळि एहवी सिरी।
कोकिल निसुर प्रसेद ओसकण,
सुरति अंति मुख जिम सुत्री।।207।।
ओषधिये एवं अन्य वनस्पतियों के पकने के कारण धरा पीली हो गयी है जिससे शरद ऋतु की शोभा बढ रही है। संसारिक क्रीड़ा के बाद पसीनें से भरे हुए स्त्री मुख की तरह पृथ्वी पर औस की बूंदें प्रतीत होती हैं और कोयल मोन हो गई हैं।

वितए आसोज मिळे नभि वादळ,
पृथी पंक जळि गुडळपण।
जिम सतगुरु कळि कलुख तणा जण,
दीपति ग्यान प्रगटे दहण।।208।।
आश्विन मास के आने से आकाश से बादल दूर हो गये हैं। पृथ्वी पर बिखरा हुआ कीचड़ और जल का गंदलापन उसी प्रकार विलुप्त हो चुके हैं जिस प्रकार सद्गुरु के मिलने से ज्ञान रूपी अग्नि प्रकट हो कर कलियुग में मनुष्य के पाप नष्ट कर देती है।

गो खीर श्रवति रस धरा उदगिरति,
सर पोइणिए थई सुश्री।
वळी सरद श्रगलोग वासिए,
पितरे ही मृत लोक प्री।।209।।
शरद त्रृतु के आगमन के साथ ही गायें दूध देने लगी, पृथ्वी रस उगलने लगी, तालाबों में कमल शोभायमान हो गये हैं। इस प्रकार का वातावरण बनने के कारण स्वर्ग में निवास कर रहे पितरों को मृत्युलोक अच्छा लगने लगा है।

बोलन्ति मुहुरमुह विरह गमै बै,
तिसि सुकळ निसि सरद तणी।
हंसणी ते न पासै देखै हंस,
हंस न देखै हंसणी।।210।।
हंस व हंसिनी पास बैठे हुए हो कर भी शरद त्रृतु की रात्रियों की उज्जवलता के कारण एक-दूसरे को देख नहीं पा रहे हैं। आपस में स्पष्ट रूप से देख न पाने के कारण विरह वेदना से दुःखी अपने-आप के दुखों को भुलाने के लिए बार-बार एक-दूसरे को पुकार रहे हैं।

ऊजळे अदरसणि निसि उजुयाळी,
घणूं किसूं वाखाण घणै।
सोळह कळा समाइ गयौ ससि,
ऊजासहि आप आपणै।।211।।
उज्जवल रंग की समस्त वस्तुएं शरद ऋतु की चांदनी के कारण दिखाई देनी बन्द हो गई हैं। अधिक कहने से क्या लाभ है ? (घणूं किसूं वाखाण घणै) उज्जवलता के कारण सोलह कलाओं वाला चन्द्रमां भी लुप्त हो गया प्रतीत हो रहा है।

तुलि बैठौ तरणि तेज तम तुलिया,
भूप कणय तुलता भू भाति।
दिणि दिणि तिणि लघुता प्रामै दिन,
राति राति तिणि गौरव राति।।212।।
दिन-रात (प्रकाश-अंधकार) बराबर हो गये हैं। सूर्य तुला राशि में प्रविष्ट हो गया है। राजा लोग भी सोने के बराबर तुलादान करते हुए शोभित हो रहे हैं। अब दिन प्रति दिन छोटा हो रहा है और रातें गौरव प्राप्त करती(बड़ी होती) जा रही हैं।

दीधा मणि मंदिरे कातिग दीपक,
सुत्री समाणियां माहि सुख।
भीतर थका बाहिर इम भासै,
मनि लाजती सुहाग मुख।।213।।
मन्दिरों में कार्तिक मास में मणिदीप प्रज्वलित किये गये हैं, मन्दिर के भीतर होते हुए भी उनका प्रकाश बाहर ऐसे जगमगा रहा है जैसे लज्जा का अनुभव करने वाली समवयस्का सखियों के बीच बैठी हुई सुंदरी के मन में निवास करने वाला सुहाग सुख मुख पर झलकता दिखाई देता है।

छवि नवी नवी नव नवा महोछव,
मंडियै जिणि आणंद मई।
कातिग घरि घरि द्वारि कुमारी,
थिर चीत्रंति चित्राम थई।।214।।
नए-नए ढंग से शोभित कार्तिक मास में आनन्द से भरे महा उत्सवों के आयोजन से कुमारी कन्याएं घर के दरवाज़े पर इतनी तन्मयता से चित्र बना रही हैं कि स्वयं निश्चल चित्र सी प्रतीत होती हैं।

सेवन्ति नवै प्रति नवा सवे सुख,
जग चा मिसि वासी जगति।
रुषमणी रमण तणा जु सरद त्रृतु,
भुगति रासि निसि दिन भगति।।215।।
संसारिक सुखों के बहाने द्वारकावासी नए-नए प्रकार के अलौकिक सुखों को प्राप्त कर रहे हैं। रुक्मिणी के पति श्रीकृष्ण की शरद – त्रृतु की रात्रियां संसारिक क्रीड़ाओं में तथा दिन लोगों से मिलने में व्यतीत हो रहे हैं।

एहिज परि थई भीरि कजि आयां,
धनंजय अनै सुयोधन।
मासे मंगसिर भलउ जु मिळियौ,
जागिया मींट जनारजन।।216।।
जिस प्रकार महाभारत के समय श्रीकृष्ण से सहायता मांगने आये अर्जुन और दुर्योधन को नींद में जागने व प्रथम दिखाई देने पर अर्जुन को प्राथमिकता दी, उसी प्रकार शरद-त्रृतु में नींद से जागने पर श्रीकृष्ण के सामने मार्गशीर्ष का महीना आया इसलिए ही बारह महीनों में इसे श्रेष्ठ माना जाता।

फिरियौ पछि वाउ ऊतर फरहरियौ,
सहुए सूहव उर सरग।
भुयंग धनी प्रथमी पुड़ भेदे,
विवरे पैठा बे वरग।।217।।
हेमन्त त्रृतु के आगमन से पश्चिम दिशा की तरफ से आने वाली हवा उत्तर दिशा की तरफ से ठंडी होकर आने लगी। ऐसे वातावरण में पतियों को अपनी पत्नियों के वक्षस्थल स्वर्ग की तरह सुख देने वाले लगने लगे। धनी व्यक्ति और सर्प ऐसे समय में पृथ्वी की सतह फोड़ कर तहखाने और बिलों में निवास करने लगे।

हुवइ घटि नदी हेम हेमाळै,
विमल श्रृंग लागा वधण।
जोवनागमि कटि कृस थायै जिम,
थायै थूळ नितम्ब थण।।218।।
नदियों में जल बर्फ जमनें के कारण घटने लगा और हिमगिरि की निर्मल चोटियों में वृद्धि होने लगी, जिस प्रकार यौवन आगमन के समय नायिका की कमर क्षीण हो जाती है और उसके नितम्ब व कुच स्थूल हो जाते हैं।

भजन्ति सुगृह. हेमन्ति सीत भै,
मिलि निसि तु. न कोई वहै मगि।
कोई कोमळ वसत्रे कोई कम्बळी,
जण. भारियौ रहन्ति जगि।।219।।
शीत के डर से हेमन्त त्रृतु में लोग घरों में ही दुबके रहते हैं। रात्रि के समय कोई भी राहगीर मार्ग में नहीं चलता दिखाई देता। जगत में सर्दी के भय से कोई कोमल वस्त्र में तो कोई कम्बल आदि के बोझ से दबे रहते

दिन जेही रिणी रिणाई दरसणि,
क्रमि क्रमि लागा संकुडिणि।
नीठि छुडै आकास पोस निसि,
प्रौढा करषणि पंगुरिणि।।220।।
दिन धीरे धीरे ऐसे सिकुड़ रहे हैं जैसे कोई कर्जदार कर्जदाता को देख कर संकुचित हो जाता है। जिस प्रकार प्रोढ नायिका पति द्वारा वस्त्रों को खींचे जाने पर भी कठिनाई से छोड़ती है उसी प्रकार पौष मास में रात्रि आकाश को बड़ी कठिनाई से छोड रही है।

उलझाया तन मन आप आपमै,
विहत सीत रुषमणी वरि।
वाणि अरथ जिम सकति सकतिवंत,
पुहप गंध गुण गुणी परि।।221।।
सर्दी को दूर करने के लिए श्रीकृष्ण – रुक्मिणी के तन-मन में भेद नहीं किया जा सकता है, जिस प्रकार शब्द – अर्थ, शक्ति – शक्तिमान, पुष्प – सुगंध एवं गुण-गुणी एक दूसरे से अलग होते हुए भी अविभाज्य हैं।

मकरध्वज वाहणि चढयौ अहिमकर,
उत्तर वाउ बाए अउर।
कमळ वाळि विरहिणीवदन किय,
अम्ब पाळि संजोगि उर।।222।।
कामदेव के वाहन मकर राशि में सूर्य प्रवेश कर गया है। उतर दिशा से आने वाली शीत लहर ने कमल समुहों को जला कर वियोगिनी स्त्रियों के मुख के समान मलिन क र दिया है तथा आम की मंजरियों को पोषित कर संयोगिनी स्त्रियों के मुख के समान प्रसन्नचित्त कर दिया है।

पाथरिया कृपण वयण दिसि पवणै,
विण अम्बह बाळिया वण।
लागै माघि लोक प्रति लागौ,
जळ दाहक सीतळ जळण।।223।।
माघ मास के लगते ही उतर दिशा से आने वाली शीत लहर(पवन) ने आम को छोड़कर शेष सभी वनों को जला दिया है। जल अग्नि की तरह जलाने वाला तथा अग्नि अब जल की तरह सुखद (सुहानी) लगती है।

निय नाम सीत जाळै वण नीला,
जाळै नळणी थकी जळि।
पातिग तिण द्वारिका न पैसै,
मंजियै विणु मन तणै मळि।।224।।
इस पवन का नाम यद्यपि शीतल है परन्तु यह अपने नाम के अनुरूप शीतलता प्रदान न कर हरे वनों के साथ जल में स्थित कमलिनी को भी जला रहा है। यह इसकी पाप भावना है जिसे धोये बिना द्वारिका में प्रवेश नहीं कर सकता।

प्रतिहार प्रताप करे सी पाले,
दम्पति ऊपरि दसै दिसि।
अरक अगनि मिसि धूप आरती,
निय तणु वारै अहोनिसि।।225।।
दम्पति (श्रीकृष्ण एवं रुक्मिणी) का तेज पहरेदार बन कर शीत को भीतर नहीं आने दे रहा है। अग्नि – सूर्य धूप – आरती बन कर रात-दिन दम्पति के ऊपर समर्पित हैं। धूप के बहाने अग्नि का शरीर तथा आरती के बहाने सूर्य का शरीर जल रहा है।

रवि बैठौ कळसि थियौ पालट रितु,
ठरे जु डहकियौ हेम ठंठ।
ऊडण पंख समारि रहे अलि,
कंठ समारि रहे कळकंठ।।226।।
सूर्य के कुम्भ राशि में आने पर त्रृतु परिवर्तन प्रारंभ हुआ। ठंड से ठूंठ हुए पेड़ पुनः हरे भरे हो गये। उड़ने के लिए भंवरे पंख संवारने लगे और कोयल मधुर वाणी बोलने (कूकने) के लिए अपने कंठ संवारने लगी।

वीणा डफ महुयरि वंस वजाए,
रोरी करि मुख पंचम राग।
तरुणी तरुण विरहि जण दुतरणि,
फागुण घरि घरि खेलै फाग।।227।।
फाल्गुन महीना विरहिजनों को अत्यंत दुखदायी होता है लेकिन अन्य जन हाथों में गुलाल लेकर वीणा, डफ, अलगूजा, बंशी बजाते एवं मुख से पंचम-राग गाते हुये (युवक-युवतियां) घर-घर फाग खेल रहे हैं।

अजहुं तरु पुहप न पल्लव अंकुर,
थोड़ डाळ गादरित थिया।
जिम सिणगार अकीधै सोहित,
प्री आगमि जाणियै प्रिया।।228।।
यद्यपि पेड़ों के नये अंकुर, पत्ते एवं पुष्प अभी पूर्ण रूप से प्रकट नहीं हुये हैं लेकिन शाखाएं कुछ मंजरियों से ऐसे हरी-भरी हो गयी हैं जैसे श्रृंगार न करने पर भी पति आगमन मात्र जानकर स्त्री सुशोभित हो जाती है।

– वसन्त त्रृतु-वर्णन –

दस मास समापित गरभ दीध रित,
मत व्याकुल मधुकर मुणणन्ति।
कठिण वेयणि कोकिल मिसि कूजति,
वनसपती प्रसवती वसन्ति।।229।।
वसन्त रुपी शिशु को वनस्पति रूपी माता ने दस मास गर्भ में धारण किये रखा, उसके प्रसव का समय आ गया है। भंवरों के द्वारा किया गया गुन गुन का स्वर प्रसवा के मन की व्याकुलता को तथा कोयल की कूक उसकी पीड़ा को प्रकट करती हुयी लग रही है।

पकवाने पाने फले सुपुहपे,
सुरंगे वसत्रे दरब स्रब।
पूजियै कसटि भंगि वनसपती,
प्रसूतिका होळिका प्रब।।230।।
नवप्रसूता वनस्पति रूपी जच्चा प्रसव वेदना समाप्त हो जाने पर पके हुये अन्न, फलों, पत्रों, पुष्पों व प्रकृतिक द्वारा धारण किये सुन्दर वस्त्रों से होली के पर्व पर उसकी पूजा कर रही है।

ळागी दळि कळि मळयानिळ ळागै,
त्रिगुण परसतै षुधा त्रिस।
रटति पूत मिसि मधुप रूंखराइ,
मात श्रवति मधु दूध मिसि।।231।।
सत, रज, तम रूपी संसारिक हवा लगजाने से वसन्त रूपी शिशु को जन्म लेते ही शीतल, मन्द, सुगन्ध के स्पर्श के लिए भूख लगने लगी है। भंवरों का गुंजन मानों उसके रोने की आवाज़ है एवं झरता हुआ मधु वसन्त के लिए माता का दूध है।

वनि नयरि घराघरि तरि तरि सरवरि,
पुरुख नारि नासिका पथि।
वसन्त जनमियौ देण वधाई,
रमै वास चढि पवन रथि।।232।।
सुगन्ध रूपी बधाईदार वसन्त रूपी शिशु के जन्मते ही पवन के रथ पर चढ गया और वन, नगर, घर-घर, घूम कर नासिका मार्ग से बधाई देता फिर रहा है, हर जगह उत्साहपूर्ण वातावरण बना हुआ है।

अति अम्ब मौर तोरण अजु अम्बुज,
कळी सु मंगळ कळस करि।
वन्नरवाळ बंधाणी वल्ली,
तरुवर एका बियै तरि।।233।।
आम के पेड़ों पर लगे हुए मौर शिशु के जन्मोत्सव पर बांधे गए तोरण के समान लग रहे हैं। कमल की कलियाँ मंगल कलश जैसी लग रही हैं। एक पेड़ से दूसरे पेड़ तक फैली हुई लताएं ही बच्चों के जन्मोत्सव पर बांधी गई बंदनवार की तरह दिखाई दे रही हैं।

फुट वानरेण कच नालिकेर फळ,
मज्जा तिकरि दधि मंगळिक।
कुंकुम अखित पराग किंजळक,
प्रमुदित अति गायन्ति पिक।।234।।
बंदरों द्वारा कच्चे नारियल फोड़कर निकाला गया गुद्द्दा मांगलिक दही जैसा लग रहा है। पद्म-पराग कुंकुम एवं केशर अक्षत की तरह लग रहे हैं। महिलाओं की तरह कोयल प्रसन्न होकर मांगलिक गीत गा रही हैं।

आयौ इलि वसंत वधावण आई,
पोइणि पत्र जळ एणि परि।
आणंद वणे काचमै अंगणि,
भामिणि मोतिए थाल भरि।।235।।
सरोवर में कमल के पत्रों पर ठहरी पानी की बूंदें मोतियों जैसी लग रही हैं। मानों पृथ्वी पर बसंत का अवतीर्ण हुआ जान कर कांच से जड़े आंगन में महिलाएं मोतियों के थाल भर कर बधाने के लिए आयी हैं।

कामा वरखन्ती कामदुधा किरि,
पुत्रवती थी मन प्रसन।
पुहप करणि करि केसू पहिरे,
वनसपती पीळा वसन।।236।।
कनेर और टेसू के पीले खिले हुए पुष्प ऐसे लग रहे हैं मानों वसंत रूपी माता ने वसंत रूपी पुत्र को पाकर पीले वस्त्र पहने हैं तथा हर्षित मन से सब की मनोकामनाएं पूर्ण कर रही है।

कणियर तरु करणि सेवंती कूजा,
जाती सोवन गुलाल जत्र।
किरि परिवार सकळ पहिरायौ,
वरणि वरणि ईए वसत्र।।237।।
विभिन्न जातियों के वृक्ष यथा, कनेर, सेवती, करना, कूजा, मालती, चमेली, सोन चम्पा, गुल्लाला आदि नाना प्रकार के सुंदर पुष्पों से लद गये हैं। यह दृश्य ऐसा लग रहा है मानो वसन्त के आगमन पर वनस्पति ने अपने परिवार के समस्त सदस्यों को रंग – बिरंगे वस्त्र पहना दिए हैं।

विधि एणि वधावे वसंत वधाए,
भालिम दिन दिन चढि भरण।
हुलरावणे भाग हुलरायौ,
तरु गहवरिया थिय तरुण।।238।।
वसन्त रूपी बालक को नाना प्रकार के श्रृंगार कर बधाईदारों ने बधाया। उसकी सुन्दर दिन – प्रतिदिन बढ रही है और शरीर पुष्ट हो रहा है। माता ने फागुन के गीतों की लोरियाँ सुनाकर हुलराया है। बढते हुए शरीर के कारण वसन्त हष्ट-पुष्ट होकर तरुण हो गया है।

मंत्री तहां मयण वसंत महीपति,
सिला सिंघासण धर सधर।
माथ अम्ब छत्र मंडाणा,
चलि वाइ मंजरि ढलि चमर।।239।।
वसंत ही वन के राजा हैं, कामदेव मंत्री हैं एवं सिंहासन के रूप में पर्वतों की शिलाएं विद्यमान हैं। आम की मंजरियों का छत्र मुकट पर शोभा दे रहा है। चंवर के रूप में पवन से हिलती हुई मंजरियां माथे पर ढुलाई जा रही हैं।

दाड़िमी बीज विसतरिया दीसै,
निउंछावरि नांखिया नग।
चरणे लुंचित खद फळ चुम्बित,
मधु मुंचंति सीचन्ति मग।।240।।
पक कर फटे हुए दाड़िमी के अनारदानों से वसंत राजा पर रत्नों की निछरावल की गयी है। पक्षियों द्वारा खाते एवं नोचते समय फलों से टपकने वाला रस ही मानों मार्ग में सुगन्धित द्रव्यों का छिड़काव है।

राजति अति एण पदाति कंज रथ,
हंस माळ बन्धि लास हय।
ढालि खजूरि पूठि ढलकावै,
गिरिवर सिणगारिया गय।।241।।
कविराज ने वसन्त की चतुरंगिणि सेना का वर्णन किया है – हरिण सेना के पैदल सैनिक हैं, पेड़ों के समुह रथ हैं, हंसो की पंक्तियां घुड़साल में बंधे हुए घोड़े हैं। बड़े-बड़े पहाड़ वसंत की सेना के सजे हुए हाथी हैं और पहाड़ों पर उगे हुए खजूर के पेड़ मानों लटकती हुयी ढालें हैं।

तरु ताळ पत्र ऊंचा तड़ि तरला,
सरला पसरन्ता सरगि।
बैठे पाटि वसन्त बन्धिया,
जगहथ किरि ऊपरि जगि।।242।।
स्वर्ग तक पहुंचे हुए सीधे एवं लम्बे ताड़ के वृक्षों के पत्ते इस प्रकार फैले हुए हैं मानों वसन्त ने राज सिंहासन पर बैठ कर जगत को अभय वरदान देने के लिए अपने हाथ पसारे हैं।

आगळि रितुराय मंडियौ अवसर,
मण्डप वन नीझरण मृदंग।
पंचबाण नायक गायक पिक,
वसुह रंग मळगर विहंग।।243।।
वसन्त राजा की महफ़िल में कामदेव सुत्रधार(नायक) है। वन ही मण्डप है, निर्झर ही मृदंग हैं, गायिका के रूप में कोयल हैं। इस वनरूपी मंच पर एकत्रित पशु-पक्षी इस दृश्य (खेल) को देखने वाले दर्शक हैं।

कळहंस जाणगर मोर निरतकर,
पवन तालधर ताल पत्र।
आरि तन्तिसर भमर उपंगी,
तीवट उघट चकोर तत्र।।244।।
कला पारखी के रूप में राजहंस उपस्थित हैं, नर्तकों का कार्य मोर कर रहे हैं, वायु ताल दे रहा है, पत्ते करतालों का कार्य कर रहे हैं। झिल्ली की झणकार तार के वाद्यों का स्वर है। नसतरंग बजाने वाला भ्रमर है और चकोर त्रिवट ताल देनें का कार्य कर रहा है।

विधि. पाठक सुक सारस रस वंछक,
कोविद खंजरीट गतिकार।
प्रगलभ लाग दाट पारेवा,
विदुर वेस चक्रवाक विहार।।245।।
राजा वसंत के यहां शुक विधि बताने वाला है, सारस रस का ज्ञाता है, चतुर खंजन पक्षी नृत्य की विविध प्रकार की गति कर रहे हैं, कपोत लाग व दाट आदि नृत्य के भावों को बताने वाले हैं तथा चकवे की क्रीड़ा ही विदूषक का अभियान है।

आंगणि जळ तिरप उरप अलि पिअति,
मरुत चक्र किरि लियत मरु।
रामसरी खुमरी लागी रट,
धूया माठा चन्द धरूं।।246।।
भंवरे खुले स्थानों पर जल पीते हुए ऐसे प्रतीत हो रहे हैं जैसे त्रिसम व उरप नामक ताल ले रहे हैं। चलती हुई हवा का चक्रवात मानों मूर्च्छना ले रहा है। ध्रुवा, माठा व चन्द्रक नामक रागिनियों को रामसरी व खुमसरी नामक चिड़ियां गा रही हैं।

निगरभर तरुवर सघण छांह निसि,
पुहपित अति दीपगर पळास।
मौरित अम्ब रीझ रोमांचित,
हरखि विकास कमळ कृत हास।।247।।
वन के घनें पेड़ों के समूह की छाया रात्रि का स्वरूप लिए हुए है पलास के पुष्पित पेड़ दीपयुक्त दीवटे हैं। दर्शकों के रोमांच के रूप में आम्र मंजरियां हैं। कमलों का विकास ही हर्षित दर्शकों का हास्य है।

प्रगटै मधु कोक संगीत प्रगटिया,
सिसिर जवनिका दूरि सिरि।
निज मंत्र पढे पात्र रितु नांखी,
पुहपंजळि वणराय परि।।248।।
चकवे बोलने लगे, मधुमास वसंत रूपी राजा के रंगशाला में प्रकट होते ही मानों संगीत प्रारम्भ हो गया है। शिशिर त्रृतु का चला जाना रंगशाला का पर्दा हटने के समान है तथा वनराजा रुपी प्रधान ने आशीर्वचन का मंत्रोच्चार कर त्रृतुराज वसंत पर पुष्पांजलि वारी।

प्रज उदभिज सिसिर दुरीस पीड़तौ,
ऊतर ऊथापिया असन्त।
प्रसन वायु मिसि न्याय प्रवर्त्त्यौ,
वनि वनि नयरे राज वसंत।।249।।
वृक्षों रूपी प्रजाजनों को शिशिर रूपी राजा अत्यधिक शीत के द्वारा सता रहा था। शिशिर रूपी दुष्ट राजा व उत्तरी दिशा से आने वाले शीत पवन रूपी अन्यायकारी प्रधान को वसंत राजा ने हटा दिया तथा वन रूपी नगर नगर में सुखदायक पवन रूपी न्याय को फैला दिया।

पुहपां मिसि एक एक मिसि पातां,
खाडिया द्रव मांडिया ऊखेळि।
दीपक चम्पक लाखे दीधा,
कोड़ि धजा फहराणी केळि।।250।।
वनस्पतियों रूपी धनपतियों ने शिशिर रूपी अत्याचारी राजा के भय से छुपाये हुए धन को वसंत राजा के सुराज में गुप्त स्थान से निकाल कर प्रगट किया। चम्पक रूपी लखपति ने लाखों के धन पर पुष्प रूपी दीपक प्रज्वलित किये। केली रूपी करोड़पति ने करोड़ों के धन पर पत्ते रूपी पताकाएं फहरा दी हैं

मळयानिळ वाजि सुराज थिया महि,
भई निसंकित अंक भरि।
वेलि गळि तरुवरां विलागी,
पुहप भार ग्रहणां पहरि।।251।।
मलय पवन के रूप में वसंत राजा के राज्य में निर्भयता एवं न्याय का एहसास होने लगा है। जिस प्रकार सुराज्य में स्त्रियां निश्चिंत होकर आभूषण धारण कर प्रियतमों के गले मिलती हैं उसी प्रकार पुष्प रूपी आभूषण धारण कर लताएं निर्भय होकर पेड़ों से लिपट गयी हैं।

पीड़न्ति हेमन्त सिसिर रितु पहिलौ,
दुख टाळ्यौ वसन्त हितदाखि।
व्याए वेली तणी तरुवरां,
साखां विसतरियां वैसाखि।।252।।
हेमन्त और शिशिर ने दुष्ट राजाओं की तरह वनस्पतियों को खूब सताया। वसंत रूपी राजा द्वारा पूर्व राजाओं के दिये गये कष्टों से मुक्त किया। वसन्त के वैसाख मास में पेड़ों के विस्तार के कारण वंशवृद्धि हुयी।

दीजै तिहां डंक न दंड न दीजै,
ग्रहणि मवरि तरु गानगर।
करग्राही परवरिया मधुकर,
कुसुम गंध मकरन्द कर।।253।।
वसंत राजा के भ्रमर रूपी कर वसूलने वाले नोकर चारों तरफ घूम रहे हैं। गुंजार के रूप में आवाज करते हुए वृक्षों रूपी प्रजा से मंजरि, सुगंध और रस के रूप में कर ले रहे हैं। जिस प्रकार प्रजा हितेषी राजा के सेवक प्रजा को दंड दिये बिना कर वसूलते हैं उसी प्रकार भंवरे फूलों को डंक नहीं मार रहे हैं।

भरिया तरु पुहप वहे छूटा भर,
काघ बाण ग्रहिया करगि।
वळि रितुराइ पसाइ वेसन्नर,
जण भुरड़ीतौ रहै जगि।।254।।
वृक्षों पर पुष्प छा गये हैं, उनके हिलने से झड़ते हुए पुष्प ऐसे लग रहे हैं मानों कामदेव ने पुष्पबाणों को कराग्र में पकड़ लिया है। कामदेव के प्रभाव से अब लोगों ने अग्नि से तापने की जगह कामाग्नि के ताप से शीत को भगा दिया है इसलिये संसार के लोगों ने अग्नि तापना बंद कर दिया है।

वरखा जिम वरखत चातक वंचित,
वंचि न को तिम राज वसन्त।
फुल्ल पंख कृत सेव लबध फळ,
बंदि कोलाहल खग बोलन्त।।255।।
वर्षा होने के उपरांत भी चातक प्यासा रह जाता है लेकिन राजा वसंत के राज्य में कोई वंचित नहीं है। राजा की प्रशंसा में जिस प्रकार बंदीजन गान कर धन प्राप्त करते हैं वैसे ही पक्षी पंख फैलाकर यशोगान कर रहे हैं। ये पक्षी ऐसे लग रहे हैं मानों बन्दीजन सेवा का पुरस्कार प्राप्त कर हर्षित मन से वार्तालाप कर रहे हैं।

कुसुमित कुसुमायुध औटि केळि कृत,
तिहि देखे थिउ खीण तन।
कन्त संजोगणि किंसुख कहिया,
विरहणि कहे पळास वन।।256।।
रतिक्रीड़ा की इच्छा करने वाली संयोगिनी नारी ने कामदेव के आश्रय स्थल खिले हुए किंशुक को देख कर कितना सुखद है (किंसुख) कहा और वियोगिनी नारी ने उसे सुख कहां? (किंसुख) कहा, अर्थात उसे जला देने वाला राक्षस (पलास) माना।

तसु रंग वास तसु वास रंग तण,
कर पल्लव कोमल कुसुम।
वणि वणि माळिणि केसरि वीणति,
भूली नख प्रतिबिम्ब भ्रम।।257।।
वन में केशर बीनने वाली मालिनियों के शरीर का रंग एवं सुवास केशर जैसा हो गया है। कोमल फूलों के समान कोमल हाथ हैं। अपने सुंदर नखों में केशर जैसे प्रतिबिंब को देख कर भ्रमित हो गयी हैं, उन्होंने नखों को ही केशर समझ केशर बीनना बंद कर दिया है।

सबळ जळ सभिन्न सुगंध भेट सजि,
डिगमिगि पाउ वाउ क्रोध डर।
हालियौ मळयाचळ हूंत हिमाचल,
कामदूत हर प्रसन कर।।258।।
शीतल और सुगंधित मलय पवन मलियाचल हिमालय के उत्तर से दक्षिण की तरफ चला। मार्ग में आये गहरे जलाशयों में भीगकर वह शीतल बन गया। यह दृश्य ऐसा लगता है मानो महादेव को कामदेव ने प्रसन्न करने के लिए मलय पवन रूपी दूत भेजा था वह सुगंध रूपी भेंट लेकर भय से भरा हुआ डगमगाते कदमों से आ रहा।

तरतौ नदि नदि ऊतरतौ तरि तरि,
वेलि वेलि गळि गळै विलग्ग।
दखिण हूंत आवतौ उतर दिसि,
पवन तणा तिणि वहै न पग्ग।।259।।
मार्ग में आयी नदियों को पार करते हुए, तरु समूह को लांघते हुए और प्रत्येक लता के गले लगते हुए उत्तर से दक्षिण की तरफ आने वाले उस पवन के पग आगे नहीं बढ रहे हैं इसलिए मार्ग में विश्राम करने के कारण उसकी गति मन्द हो गयी है।

केवड़ा कुसुम कुन्द तणा केतकी,
श्रम सीकर निरझर श्रवति।
ग्रहियौ कन्धे. गन्ध भारगुरु,
गंधवाह. तिणि. मन्द गति।।260।।
गन्धवाही पवन केवड़ा, कुंद तथा केतकी के पुष्पों की सुगन्धि का भारी भार कन्धों पर उठा कर चलने के कारण ही गति मंद हो गयी है। मलय पवन में झरने के पानी के कण मिले हुये थे वो एसे लग रहे हैं मानो ये उसके माथे के पसीने की बूंदे हैं

लीयै तसु अंग वास रस लोभी,
रेवा जळि कृत सौच रति।
दखिणानिळ आवतौ उतर दिसि,
सापराध. पति. जिम सरति।।261।।
कोई नायक अन्य नायिका से रतिक्रीड़ा करने के बाद नदि के जल में स्नान करने के उपरांत भी अपराध भाव से भरकर पत्नी के सामने जाता है, उसी प्रकार मलय पवन भी जल के स्पर्श से शीतल और सुगंधित होकर मानो संकुचित हो मन्द गति से चल रहा है।

पुहपवती लता न परस पमूंके,
देतौ अंग आलिंगन दान।
मतवाळौ पय ठाइ न मंडै,
पवन वमन करतौ मधुपान।।262।।
निषिद्ध होने पर भी जिस प्रकार मद्य पीया हुआ नायक रजस्वला नायिका का आलिंगन कर लेता है। वह लड़खड़ाता हुआ और मद्यपान की उल्टियां करता हुआ चलता है उसी प्रकार पुष्पवती लताओं का स्पर्श करते हुए मतवाला बना हुआ पवन फूलों से ग्रहण किये मधु की सुगन्धि के झोंकों के रूप में वमन करता हुआ चल रहा है।

तोय झरणि छंटि ऊघसत मळय तरि,
अति पराग रज धूसर अंग।
मधु मद श्रवति मंद गति मल्हपति,
मदोनमत्त मारुत मातंग।।263।।
झरने से झरते हुए पानी के छींटे उछालता हुआ, चंदन के पेड़ों से अंग स्पर्श करता हुआ, पराग रूपी रजकणों से धूसरित अंगों वाला, मधु रूपी मद को टपकाता हुआ हुआ उन्मत्त पवन रूपी हाथी मस्ती से झूमते हुए मंद-मंद गति से चल रहा है।

गुण गंध ग्रहित गिळि गरळ ऊगळित,
पवन वाद ए उभय पख।
स्रीखंड सैळ संयोग संयोगिणि,
भणि विरहिणि भुयंग भख।।264।।
मलय पवन के सम्बंध में संयोगिनी और वियोगिनी स्त्रियों के अलग अलग विचार हैं। संयोगिनियों का कहना है कि मलय पर्वत स्थित चंदन के पेड़ों का स्पर्श कर यह पवन उसके गुणों को धारण कर सुगंधित एवं सुखदायी हो गया है। वियोगिनियों का कहना है कि चंदन के पेड़ों पर लिपटे सर्पों द्वारा निगल कर पुनः उगल दिया गया भोजन है जो विषैला होने के साथ-साथ दुखदायी भी है।

रितु किहि दिवस सरस राति किहि सरस,
किहि रस संध्या सुकवि कहन्ति।
बे पख सूधति बिहूं मास बे,
वसन्त ताइ सारिखौ वहन्ति।।265।।
सुकवि किसी त्रृतु के दिन को सरस बतलाते हैं तो किसी त्रृतु की रात्रि को अथवा किसी त्रृतु की संध्या को सरस बतलाते हैं लेकिन वसंत अपने दोनों महिनों के शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष के दिनों एवं रात्रियों को समान रूप से रखता है अर्थात इस समय के सभी क्षण सुखदायक हैं।

निमिख पळ वसन्ति सारिखौ अहोनिसि,
एकण एक न दाखै अन्त।
कन्त गुणे वसि थायै कान्ता,
कान्ता गुणि वसि थायै कन्त।।266।।
वसंत त्रृतु के प्रभाव से कन्त (श्रीकृष्ण) और कान्ता (रुक्मिणी) एक दूसरे के गुणों के वशीभूत हो रहे हैं, इन्हें वसंत त्रृतु के रात-दिन एवं पल-क्षण सब समान भाव से सुखदायी लग रहे हैं, ऐसे समय में एक दूसरे के प्रति प्रेम का अंत नहीं है।

गृह पुहप तणौ तिणि पुहपित ग्रहणौ,
पुहप ई ओढण पाथरणि।
हरखि हिंडोळि पुहपमै हिण्डति,
सहि सहचरि पुहपां सरणि।।267।।
पुष्पों से सजे हुए महल में पुष्पों के ही आभूषण धारण किये हुये हैं एवं पुष्पों के ही ओढ़ने – बिछोने हैं। पुष्पों के झूले पर झूल कर आनन्दित हो रहे हैं, उनकी सखियाँ भी फूलों पर ही आश्रित (सरणि) हैं।

पौढाड़ै नाद वेद परबोधै,
निसि दिनि वाग विहार नितु।
माणग मयण एण विधि माणै,
रुषमिणि कन्त वसन्त रितु।।268।।
रुक्मिणी के पति श्रीकृष्ण कामदेव स्वरूप हैं। वसंत त्रृतु में संसारिक क्रीड़ाओं का सुख भोगते हुए संगीत के मधुर स्वर के साथ सोते हैं तथा प्रभात में वेदपाठ की ध्वनि उन्हें जगाती है। श्रीकृष्ण इस त्रृतु में नित्य ही रात-दिन वाटिकाओं और उद्यानों में विहार करते हैं।

अवसरि तिणि. प्रीति पसरि मन अवसरि,
हाइ. भाइ मोहिया हरि।
अंग अनंग गया आपाणा,
जुड़िया जिणि वसिया जठरि।।269।।
वसंत त्रृतु के इस अवसर पर रुक्मिणी के मन में प्रेम के प्रसार के कारण हाव-भावों में बदलाव आया जिसने श्रीकृष्ण का मन मोहलिया। रुक्मिणी के उदर में महादेव के तीसरे नेत्र की अग्नि में जल कर नष्ट हुये कामदेव के अंग बसकर वापस जुड़ गये।

वसुदेव पिता सुत थिया वासुदे,
प्रदुमन सुत पित जगतपति।
सासू देवकी रामा सुवहू,
रामा सासू वहू रति।।270।।
वसुदेव के पुत्र श्रीकृष्ण (वासुदेव) हुये। जगत्पति श्रीकृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न हुये। सास देवकी की पुत्रवधू रुक्मिणी हुयी और रुक्मिणी की पुत्रवधू रति हुयी।

लीलाधण ग्रहे मानुखी लीला,
जगवासग वसिया जगति।
पित प्रदुमन जगदीस पितामह,
पोतौ अनिरुध ऊखापति।।271।।
लीलाधारी श्रीकृष्ण ने संसारिक लीला को अपनाया। जगत को बसाने वाले भगवान स्वयं द्वारिका पुरी में बसगये। जगत्पति श्रीकृष्ण पितामह एवं प्रद्युम्न पिता बने तथा अनिरुद्ध पौत्र हुये जिनकी वधू उषा बनी।

किं कहिसु तासु जसु अहि थाकौ कहि,
नारायण निरगुण निरलेप।
कहि रुषमिणि प्रदुमन अनिरुध का,
सह सहचरिए नाम संखेप।।272।।
निर्गुण, निर्लेप, नारायण जिस श्रीकृष्ण का गुणगान करते हुए शेषनाग भी पार नहीं पा सका उनका मैं क्या वर्णन कर सकता हूं, अतः अधिक गुणगान न कर साखियों सहित रुक्मिणी एवं प्रद्युम्न तथा अनिरुद्ध के नामों का संक्षेप में वर्णन करता हूं।

लोकमाता सिंधुसुता श्री लिखमी,
पदमा पदमाळया प्रमा।
अवर गृहे अस्थिरा इन्दिरा,
रामा हरिवल्लभा रमा।।273।।
रुक्मिणी के नाम – लोकमाता, सिंधुसुता, श्री, लक्ष्मी, पद्मा, पद्यालया, प्रभा, चंचला, इंदिरा, रामा, हरिवल्लभा और रमा हैं।

दरपक कंदरप काम कुसुमायुध,
सम्बरारि रति पति तनुसार।
समर मनोज अनंग पंचसर,
मनमथ मदन मकरध्वज मार।।274।।
प्रद्युमन के नाम – दर्पक, कंदर्प, काम, कुसुमायुध, शंबरारि, रति-पति, तन सार, स्मर, मनोज, अलंग, कामबाण, मन्मथ, मदन, मकरध्वज और मार हैं।

चतुरमुख चतुरवरण चतुरातमक,
विग्य चतुर जुग विधायक।
सर्वजीव विश्वकृत व्रह्मसू,
नरवर हंस देहनायक।।275।।
अनिरुद्ध के नाम इस प्रकार हैं – चतुर्मुख, चतुर्वर्ण, चतुरात्मा, विज्ञ, चतुर्युग विधाता, सर्वजीत, विश्वकृत, ब्रह्म-सू, नर-वर, हंस और देह नायक।

सुन्दरता लज्जा प्रीति सरसती,
माया कान्ती क्रिपा मति।
सिद्धि वृद्धि सुचिता रुचि सरधा,
मरजादा कीरति महति।।276।।
रुक्मिणी की सखियों के नाम – सुन्दरता, लज्जा, प्रीति, सरस्वती, माया, कान्ति, कृपा, मति, त्रृद्धि, वृद्धि, शुचिता, रुचि, श्रद्धा, मर्यादा, कीर्ति और महत्ता हैं।

संसार सुपहु करता गृह संगृह,
गिणि तिणि हीज पंचमी गाळि।
मदिरा रीस हिंसा निन्दा मति,
च्यारे करि मूंकिया चंडाळि।।277।।
जगत के श्रेष्ठ स्वामी श्रीकृष्ण ने गृहस्थ जीवन का पालन करते हुए मदिरा, क्रोध, हिंसा व निंदा के अतिरिक्त गाली को भी चाण्डाल मान कर त्याज्य बताया है।

हरि समरण रह समझण हरिणाखी,
चात्रण खळ खगि खेत्र चढि।
बैसे सभा पारकी बोलण,
प्राणी वंछइ त वेलि पढि।।278।।
हे प्राणी ! यदि हरि स्मरण करना, सुंदरी (हरिणाक्षी) के प्रेम को समझना, रणक्षेत्र में शत्रुओं को तलवार से काटना तथा दूसरों की सभा में बराबर बैठ कर बोलने की इच्छा रखता है तो वेलि का पाठ करना चाहिए।

सरसती कंठि श्री गृहि मुखि सोभा,
भावी मुगति तिकरि भुगति।
उवरि ग्यान हरि भगति आतमा,
जपै वेलि त्यां ए जुगति।।279।।
युक्तिपूर्वक वेलि का पाठ करने वाले व्यक्ति के कंठ में सरस्वती का निवास, घर में लक्ष्मी का निवास एवं मुख पर शोभा विराजमान हो जाती है और हृदय में ज्ञान तथा आत्मा में हरि भक्ति प्रकट होकर संसारिक भोग सुख लेकर मुक्ति को प्राप्त होते हैं।

महि सुइ खटमास प्रात जळ मंजै,
आप अपरस अरु जित इन्द्री।
प्रामै वेलि पढन्तां नित प्रति,
त्री वंछित वर वंछित त्री।।280।।
छह माह तक पृथ्वी को बिछोना बना कर शयन करके, नित्य प्रातःकाल स्नान कर अपने आप को जितेन्द्रिय रखते हुये शुद्ध रहकर वेलि का नित्य पाठ करते हैं उन्हें मनवांछित पत्नी एवं वधू को वांछित वर प्राप्त होता है।

ऊपजै अहोनिस आप-आप मै,
रुषमणि क्रिसन सरीख रति।
कहै वेलि वर लहै कुमारी,
परणी पूत सुहाग पति।।281।।
वेलि का पाठ करने पर कन्या सुयोग्य वर प्राप्त करती है। विवाहिता पति का सुहाग एवं पुत्र प्राप्त करती है। वेलि का पाठ करने वाले दम्पति में श्रीकृष्ण – रुक्मिणी जैसा प्रेम रात-दिन उत्पन्न होता है।

परिवार पूत पोत्रे पड़पोत्रे,
अरु साहण भंडार इम।
जण रुषमिणि हरि वेलि जपंतां,
जग पुड़ि वाघै वेलि जिम।।282।।
श्रीकृष्ण – रुक्मिणी की इस वेलि का पाठ करने से इस जीवन संसार के परिवार में पुत्र-पौत्र, हाथी-घोड़े, रथादि उपयोगी संसाधन तथा धन भण्डार इस प्रकार बढते जाते हैं जिस प्रकार लता (बेल) बढती है।

पेखे कोइ कहति एक एक प्रति,
विमळ मंगळ गृह्व एक वगि।
एणि कवण सुभ क्रम आचरतां,
जणियै वेलि जपन्ति जगि।।283।।
एकसाथ किसी व्यक्ति की समृद्धि एवं घर में अनेक मंगल कार्य होते देख कर एक व्यक्ति दूसरे से पूछता है कि इसने ऐसा कौनसा शुभ कार्य किया है जो इतना वैभवपूर्ण जीवन जी रहा है ? मुझे तो ऐसा लगता है कि इसने वेलि का पाठ किया है।

चतुरविध वेद प्रणीत चिकित्सा,
ससत्र उखध मंत्र तंत्र सुवि।
काया कजि उपचार करन्तां,
हुवै सु वेलि जपन्ति हुवि।।284।।
वेदों में शरीर का उपचार करने के लिए शस्त्र चिकित्सा, औषधि चिकित्सा, मंत्र चिकित्सा और तंत्र चिकित्सा ये चार विधियां बतायी गयी हैं। वेलि का पाठ करने से चारों प्रकार के उपचार का लाभ मिल जाता है।

आधिभूतक आधिदेव अध्यात्म,
पिंड प्रभवति कफ वात पित।
त्रिविध ताप तसु रोग त्रिविधिमै,
न भवति वेलि जपन्त नित।।285।।
वेलि का नित्य पाठ करने वाले व्यक्ति को आधि भौतिक, आधि दैविक और अध्यात्म जनित, ये तीनों प्रकार के ताप तथा तीनों प्रकार के विकार वात, कफ, पित्त से प्रभावित रोग नहीं होते हैं।

मन सुद्धि जपन्तां रुषमिणि मंगल,
निधि सम्पति थाइ कुसल नित।
दुरदिन दुरग्रह दुसह दुरदसा,
नासै दुसुपन दुर निमित।।286।।
रुक्मिणी के इस विवाह-मंगल का शुद्ध मन से पाठ करने से नित्य कुशल मंगल, सम्पति और निधियां प्राप्त होती हैं। बुरे दिन, बुरे ग्रह, असहनीय दुर्दशा, दुःस्वप्न और अशुभ शकुन नष्ट (नासै) हो जाते हैं।

मणि मंत्र तंत्र बळ जंत्र अमंगळ,
थळि जळि नभसि न कोई छळन्ति।
डाकिणि शाकिणि भूत प्रेत डर,
भाजै उपद्रव वेलि भणन्ति।।287।।
मणि, मंत्र, तंत्र, तथा यंत्र आदि के द्वारा जल, थल व आकाश में कोई भी अनिष्ट नहीं कर सकता, यदि वेलि का पाठ किया गया है। वेलि का पाठ करने से डाकिनी, शाकिनी, भूत, प्रेत आदि के द्वारा किए गए छल, उपद्रव आदि भी भयभीत हो कर भाग जाते है।

सन्यासिए जोगिए तपसि तापसिए,
कांइ इवड़ा हठ निग्रह किया।
प्राणी भवसागर वेलि पढन्तां,
थिया पार तरि पारि थिया।।288।।
वेलि का पाठ करने से ही व्यक्ति भवसागर से पार हो जाते हैं। संन्यासियों, योगियों और तपस्वियों को ऐसे हठयोग और संयम व साधना की आवश्यकता ही क्या थी ? यह स्पष्ट है कि वेलि का पाठ करने वाले भवसागर से पार उतर गये हैं, इस में संदेह नहीं है।

किं जोग जाग जप तप तीरथ किं,
व्रत किं दानाश्रम वरणा।
मुख कहि कृसन रुषमिणि मंगल,
कांइ ! रे मन कलपसि कृपणा।।289।।
योग, यज्ञ जप, तप तथा तीर्थ स्नान से क्या लाभ है? उपवास करने, दान देने एवं वर्णाश्रम धर्म पालन करने से भी क्या लाभ है? इन सब की कोई आवश्यकता नहीं है। हे कृपण (दीन) मन क्यों कलपता है? निज मुख से रुक्मिणी और कृष्ण के विवाह का मंगल पाठ कर, उसी से मुक्ति हो जायेगी।

बे हरि हर भजै अतारू बौळै,
ते ग्रव भागीरथी म तूं।
एक देस वाहणी न आणां,
सुरसरि सम सरि वेलि सूं।।290।।
हे भागीरथी, तूं तो विष्णु और शिव का आश्रय लेती है, इसलिए गर्व मत कर। तूं एक ही स्थान पर बहती ( सुलभ) है, तैरना न जानने वालों को डुबो देती है। गंगा भला बेलि की समानता कहां कर सकती है। बेलि हरि को एकनिष्ठ हो कर भेजती है, सब का उद्धार करती है और सर्वत्र सुलभ है।

वल्ली तसु बीज भागवत वायौ,
महि थाणौ प्रिथु दास मुख।
मूळ ताल जड़ अरथ मण्डहे,
सुथिर करणि चढि छांह सुख।।291।।
भागवत इस वेलि का बीज है। भक्त पृथ्वीराज के मुख रूपी थांवले में पृथ्वी लोक पर बोया गया है। इसका मूल पाठ डालियाँ हैं, अर्थ इसकी जड़ें हैं। मण्डप के रूप में श्रोताओं के एकाग्रचित कान हैं जिस पर चढ कर यह सुख की छाया करती है।

पत्र अक्खर दळ द्वाळा जस परिमळ,
नव रस तन्तु व्रिधि अहोनिसि।
मधुकर रसिक सु भगति मंजरी,
मुगति फूल फळ भुगति मिसि।।292।।
अक्षर समूह ही इस वेलि रूपी लता के पत्ते हैं, दोहले इसके दल हैं। भगवान का यश इसकी सुगन्ध है। नव रस इसके तन्तु हैं जो दिन – रात बढते रहते हैं। भक्ति साहित्य रसिक व्यक्ति ही भ्रमर हैं। भक्ति मंजरी है। मुक्ति इसका फूल है। बैकुण्ठ में आनन्दभोग (मुक्ति) ही इसका फल है।

कळि कलप वेलि वळि कामधेनुका,
चिन्तामणि सोमवल्लि चत्र।
प्रकटित पृथिमी पृथु मुख पंकज,
अखरावळि मिसि थाइ एकत्र।।293।।
कलियुग में पृथ्वीराज के मुखकमल से कल्पलता, कामधेनु, चिन्तामणि तथा सोमलता जैसे चारों दुर्लभ पदार्थ बेलि के अक्षर समूह के रूप में पृथ्वी पर एक साथ ही प्रकट हुए हैं।

प्रिथु वेलि कि पंचविध प्रसिध प्रणाळी,
आगम नीगम कजि अखिळ।
मुगति तणी नीसरणी मंडी,
सरग लोक सोपान इळ।।294।।
पृथ्वीराज द्वारा रचित वेलि मानो पांच प्रकार के शास्त्र, वेद तथा अखण्ड कार्य सिद्धि के एक साधना मार्ग की प्रसिद्ध प्रणाली है। यह वेलि पृथ्वी से स्वर्ग ले जाने वाली सीढ़ी है या मुक्ति मार्ग की सुशोभित नसैनी(निसरणी) है।

मोतिए विसाहण ग्रहि कुण मूंकै,
एक एक प्रति एक अनूप।
किल सोझण मुख मूझ वयण कण,
सुकवि कुकवि चालणी न सूप।।295।।
मंहगे मोतियों का व्यवसाय करने वाला जिस प्रकार एक से बढ कर एक मोती देखकर उन्हें चलनी या सूप (छाज) लेकर नहीं छांटता है, इसी तरह मेरे वचनों रूपी कणों की समीक्षा करने में केवल मेरा मुख ही सक्षम है, इसके लिए सुकवियों रूपी छलनी और कुकवि रूपी सूप की जरूरत नहीं है क्योंकि यह सब पहले से ही छांट लिये गये हैं।

पिंडि नख सिख लगि ग्रहणे पहिरिए,
महि मूं वाणी वेलि मई।
जग गळि लागी रहै असै जिमि,
सहै न दूखण जेम सई।।296।।
मेरी यह कविता इस पृथ्वी पर उस स्त्री के समान है जो नख-शिख तक आभूषण (अलंकार) धारण किये हुये है। यह उस कुलटा नारी की तरह भी है जो सब के गले लगी रहती है अर्थात सब का कंठहार बन गई है, लेकिन वास्तव में यह उस सती-साध्वी स्त्री की तरह है जो दोष सहन नहीं करती अर्थात मेरी कविता में काव्य दोष नहीं है।

भाषा संस्कृत प्राकृत भणंता,
मूझ भारती ए मरम।
रस दायिनि सुन्दरी रमतां,
सेज अन्तरिख भूमि सम।।297।।
काव्य रचना करने के लिए मेरी इस ‘वेलि’ का मर्म यह है कि इसमें देशभाषा, संस्कृत तथा प्राकृत आदि भाषाऐं साधन मात्र हैं। जिस प्रकार संसारिक क्रीड़ा के समय भूमि या शय्या का महत्त्व नहीं होता अर्थात मेरी कविता में वास्तविक महत्त्व भावों का है, भाषा का नहीं है।

विवरण जौ वेलि रसिक रस वंछौ,
करो करणि तौ मूझ कथ।
पूरे इते प्रामिस्यौ पूरौ,
इऐ ओछे ओछौ अरथ।।298।।
हे रसिक जन ! यदि बेलि में प्रयुक्त विविध प्रकार के रस का आनन्द लेने की इच्छा रखते होतो मेरा कथन सुनो। पूरा रस प्राप्त करने के लिए आगे लिखित बातों की पूर्ति होने पर ही रसास्वादन सम्भव है, नहीं तो अधुरा अर्थ ही प्राप्त होगा।

ज्योतिषी वैद पौराणिक जोगी,
संगीती तारकिक सहि।
चारण भाट सुकवि भाखा चित्र,
करि एकठा तो अरथ कहि।।299।।
ज्योतिषी, वैद्य, पौराणिक, योगी, संगीतज्ञ, तार्किक, चारण, भाट, सुकवि और भाषाविदों को एक स्थान पर इकठ्ठा करने पर ही वेलि का सही अर्थ जाना जा सकता है।

ग्रहिया मुखि मुखा गिळित ऊग्रहिया,
मूं गिणि आखर ए मरम।
मोटां तणौ प्रसाद कहै महि,
एठौ आतम सम अधम।।300।।
मैंने हरि गुणों को अनेक महापुरुषों के मुख से वर्णन करते हुए सुना और सुनकर मनन किया तथा उसे पुनः ज्यों का त्यों कह दिया (उगल दिया)। मेरी कविता की श्रेष्ठता का यही रहस्य है। पृथ्वी पर सज्जन व्यक्ति इसे श्रेष्ठजनों द्वारा दिया प्रसाद कहेंगे और दुष्टजन इसे जूठन (एंठौ) कहेंगे अर्थात असत्य व निरर्थक परिश्रम कहेंगे।

हरि जस रस साहस करे हालिया,
मो पंडिता वीनती मोख।
अम्हीणा तम्हीणे आया,
श्रवण तीरथे वयण सदोख।।301।।
हरि यश गान के लिये मेरे ये सदोष वचन साहस कर आपके श्रवण रूपी तीर्थ में अपने दोषों को दूर करने के लिए आये हैं। कविता के रूप में मेरे ये वचन अनेक दोषों से युक्त हैं। हे विद्वानों ! मेरी वीनती है कि आपके श्रवण तीर्थों के सम्पर्क से इन्हें निर्दोष कर देना।

रमतां जगदीसर तणौ रहसि रस,
मिथ्या वयण न तासु महे।
सरसै रुषमणि तणी सहचरी,
कहिया मूं मैं तेम कहे।।302।।
जगत के स्वामी श्रीकृष्ण एवं रुक्मिणी के एकांत क्रीड़ा का जो वर्णन मैंने किया है, इसमें मेरी कल्पना नहीं है। रुक्मिणी की सखी सरस्वती ने जैसा मुझे बताया वैसा ही मैंने कह दिया।

तूं तणा अनै तूं तणी तणा त्री,
केसव कहि कुण सकै क्रम।
भलौ ताइ परसाद भारती,
भूंडो ताइ माहरौ भ्रम।।303।।
हे केशव ! आप एवं आपकी प्रिया रुक्मिणी जी के चरित्रों का वर्णन कैसे किया जा सकता है ? मेरी इस रचना में जो कुछ भी अच्छा है, वह सरस्वती की कृपा के कारण है तथा जो कुछ बुरा (भूंडो) है वह मेरी अज्ञानता के कारण है।

रूप लखण गुण तणा रुषमिणी,
कहिवा सामरथीक कुण।
जाइ जाणिया तिसा मैं जम्पिया,
गोविंद राणी तणा गुण।।304।।
श्रीकृष्ण प्रिया रुक्मिणी जी का रूप, गुण और सुलक्ष्णों के बारे में कहने में कौन सामर्थ है ? श्री कृष्ण प्रिया के जिन गुणों को जैसा, जितना मैं समझ सका, उनका वैसा यशोगान मैंने कर दिया है।

– रचना काल –

वरसि अचळ गुण अंग समी संवति,
तवियौ जस करि श्री भरतार।
करि श्रवणे दिन रात कंठ करि,
पामै स्त्री फळ भगति अपार।।305।।
पर्वत, गुण, वेदांग तथा शशि वाले संवत वर्ष में अर्थात 7 पर्वत, 3 गुण, 6 वेदांग, 1 शशि वाले (संवत 1637) में मैंने (पृथ्वीराज) श्रीकृष्ण-रुक्मिणी जी का यशगान किया, जिसके कारण यह वेलि प्रस्तुत हुयी है। इसे पढ़ने, सुनने व कंठस्थ करने वाले श्रद्धावान व्यक्ति अपार धन – सम्पत्ति तथा अतुल भक्ति रूपी सुन्दर फल निश्चित रूप से प्राप्त करते हैं।
।।इति।।

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