व्रजलालजी रो विविध वरणो काव्य : विजय विनोदः गिरधर दान रतनू दासोड़ी

चारण जाति आपरी विद्वता, प्रखरता, सत्यवादिता अर चारित्रिक दृढ़ता रै पांण चावी रह्यी है। इणी गुणां रै पांण इण जाति नैं मुलक में मांण मिलतो रह्यो है। संसार रै किणी पण कूंट में अेक ई अैड़ो उदाहरण नीं मिलै कै चारणां टाळ दूजी कोई पण जाति समग्र रूप सूं आपरै साहित्यिक अवदान रै पांण ओळखीजती हुवै! चारण ई अेक मात्र अैड़ी जाति है जिणरो राजस्थानी अर गुजराती साहित्य रै विगसाव पेटै व्यक्तिगत ई नीं अपितु सामूहिक अंजसजोग अवदान रह्यो है। इणी अवदान रै पेटै लोगां इणां री साहित्यिक सेवा रो मोल करतां थकां राजस्थानी साहित्य रै इतियास रै अेक काळखंड रो नाम ‘चारण साहित्य’ तो गुजराती में इणां री प्रज्ञा अर प्रतिभा री परख कर’र इणां रै रच्यै साहित्य रो या इण परंपरा में रच्यै साहित्य रो नाम ‘चारण साहित्य’ रै नाम सूं अभिहित कियो जावै।

चारण जाति रै साहित्यिक अवदान रै कायल लोगां इणां रै साहित्यिक समर्पण री कीरत मन सूं करी है। चारणां री साहित्यिक समझ अर अभिव्यक्ति खिमता रा बखांण करतां सांईदीन दरवेष कितरी सटीक लिखी है:

दीन कहै दुनियांण में, देखी बुसतां दोय।
राजी चारण सों रहो, मुगत नाम सो होय।।

किणी लोककवि दूहै (कविता) नैं चारणां रै देस इण सारू हालण री बात कैवै कै जे दूहो पूरो है तो दिल खोल’र प्रषंसा करैला अर जे अधूरो है तो पूरो करावैला:

हाल दूहा उण देसड़ै, जठै चारण वसै सुजांण।
करै अधूरा पूरती, पूरां करै बखांण।।

चारणां री साहित्यिक मेधा चारित्रिक दृढ़ता वैचारिक पवित्रता अर विद्या व्यसनता नैं सहज रूप सूं स्वीकारतां महाराजा मानसिंहजी (जोधुपर) चारणां नैं क्षत्रियां सूं इण चार बातां में सिरै मानिया है:

अकल विद्या चित ऊजळो, इधको घर आचार।
बधता रजपूतां बिचै, चारण बातां चार।।

इणी बधतायां नैं गिणावतां जादूरामजी आढा (पांचेटिया) आपरै अेक गीत में लिखै:

आखर ऊजळा बुधजोड़ उटीपी, भारी वडा रीझावण भूप।
बैठोड़ा द्रगपाळ बराबर, रेणव जका सभा रा रूप।।

चारणां री कोई ‘बीसासौ’ यानी अेक सौ बीस तो कोई बीसोतर यानी तैईस शाखावां तो कोई बीसोतर यानी बीस मूळ तरु मानै है:

दूजा चारण देस रा, सह पोसाक समांन।
तुररो वीसोतर तणो, कवियो करनीदांन।।
(कविराजा करनीदानजी कविया रो दूहो-खोड़जी मोतीसर)

बलू थारा बोल, साखां वीसांसौ सिरै।
सारी बात सतोल, रतन जड़ावूं राघवत।।
(रतनू बलूजी राघावत दासोड़ी रो दूहो-मोतीसर हररूपजी)

इणी ‘बीसा सौ’ या ‘बीसोतर’ शाखावां मांय सूं अेक शाखा है-‘चौराड़ा’। इणी चौराड़ा शाखा में प्रसिद्ध चारण भक्त कोलजी बावली (गुजरात) में हुया:

चौमुख चौळा चंड, जगत ईसर गुण जांणै।
परमाणंद रू कोल, अलू आखर परमांणै।।
ग ग
ईसरा कोल अलू, महा हरि भगत सिरोमण।

इणी कोलजी री वंस परंपरा में कवियोजी हुया, जिणां सूं चारणां री प्रसिद्ध शाखा कविया चाली। इण विषय में डॉ. शक्तिदानजी कविया आपरी पोथी ‘मान-प्रकास’ री भूमिका में लिखै, ‘‘चारणों की शाखाओं के निम्नांकित नाम उनके प्रख्यात पूर्वजों अथवा आदि पुरुषों के ही सूचक हैं, यथा-आढा, सांदू, आसिया, देथा, रतनू, लाळस, कविया, संडायच, रोहड़िया, कनिया, वणसूर, मीसण, मेहड़ू आदि। ’’ कवियोजी गुजरात सूं मारवाड़ में आयग्या। इणां री प्रतिभा सूं रीझ मंडोर नरेश नाहड़राव पड़िहार चंगावड़ा गांम इनायत कियो (जिणरो जूनो नाम सूरासद हो)। अबार चंगावड़ा बिराई रो ई अेक बास है। कवियोजी री सातवीं पीढी में समरसी हुया। समरसी आपरी बगत रा सपूत अर नामचीन चारण हा। इणी समरसी कविया रै घरै टीकमजी कविया रो जलम हुयो। टीकमजी नामी कवि, साहसी पुरुष, प्रखर वक्ता अर सत्यवादी चारण हा। इणां रै इणी गुणां सूं प्रभावित होय’र तोळैसर राव तोळैजी सूंडा (राठौड़), बिराई गांम इनायत कियो। टीकमजी दो ब्यांव किया। पैलो ब्यांव माड़वा (जैसलमेर) रै आढा पृथ्वीराजजी सूजावत री बेटी चांदाबाई रै साथै कियो। चांदाबाई री कूख सूं टीकमजी रै पांच बेटा हुया-1. राजसी, 2. घड़सी, 3. बाहड़जी, 4. सुदनजी, 5. देदाजी।

दुजोग सूं टीकमजी री जोड़ायत चांदाबाई जवानी में काळ कवलित हुयग्या, जिणसूं टीकमजी नैं दूजो ब्यांव करणो पड़्यो। टीकमजी रो दूजो ब्यांव बिराई (शेरगढ़) रै प्रसिद्ध चारण आलाजी बारठ रै बेटै दूलहजी री बेटी मालणदेवी साथै हुयो। सालमजी कविया बिराई रै आखरां में:

सांसण भांडू सारखा, बंका वरदाई।
रोहड़ बारठ रै, सुखथांन सदाई।
आलावत दूलै इसा, कवराज कहाई।
राज काज घर रिये, जुग साख जमाई।

उल्लेखजोग बात आ है कै इणी आलाजी रै घरै रैय मंडोवर रै राव चूंडाजी वीरमदेवोत आपरो कष्टसाध्य बाळपण बीतायो। जद मंडोवर माथै चूंडाजी आपरो राज थापित कर लियो तो अेक दिन कवि आलाजी, चूंडाजी सूं मिलण मंडोवर गया। कीं राजकाज री व्यस्ततावां अर कीं राज रै मद में चूंडाजी आपरै बचपन रै पाळणहार कवि नैं पूगतो सनमान नीं दियो। कवि रो स्वाभिमांन जागियो अर भरियै दरबार में चूंडाजी नैं खरी सुणावतां खासा दूहा कह्या, जिणां मांय सूं दो दाखलै सरूप:

रह सकै तो रेह, थिर हेतो सबळो थियो।
घर बसियो घण नेह, चीत न बसियौ चूंडड़ा।।
चूंडा नावै चीत, काचर कळाऊ तणा।
आछो थयो अभीत, मंडोवर रै माळियां।।

खारी पण खरी बात सुण’र चूंडाजी, कविश्रेष्ठ आलाजी सूं क्षमायाचना करी अर अणहद सनमान दियो।

आ बात ई स्पष्ट करणी समीचीन रैसी कै मालणदेवी आथूणै राजस्थान में लोकपूज्य चारण देवी रै रूप में लगैटगै सगळी जातियां में सम्पूजित है। मालणदेवी रो जलम वि. सं. 1491 मिगसर सुदि सातम नै हुयो। डॉ. शक्तिदानजी कविया रै सबदां में:

चवदे इकरांणुय साल चवां।
सुद सातम मिग्गर मास श्रवां।।

किंवदंती है कै जद गांम भांडू में दूलहजी आलावत रै घरै टीकमजी चंवरी में मालणदेवी साथै फेरा लेय रह्या हा कै उणी बगत इणां नैं खबर मिली कै सिंध रै सराईयां (मुसळमान) गायां घेरली है, अर लियां जाय रह्या है। टीकमजी उणी बगत ‘गंठजोड खोल’र गायां री उणी भांत ‘वाहर’ चढिया, जिण भांत प्रणवीर पाबूजी चढिया। इण बाबत ‘मालण महिमा’ में गिरधरदान रतनू दासोड़ी लिखै:

तोळैसर री गाय टोरी, धेख मुसळां धार।
जिगन में इम विघन जुड़ियो, सांभळै समचार।
तो तद त्यारजी तद त्यार, टीकम समर में तद त्यार।
पाल जिम पमँगाण पीठां, अनड़ चढियो आय।
घाय अरियण वीर घेरी, गाढ सूं पुनी गाय।
तो कविरायजी कविराय, कटकां कोपियो कविराय।।

इण भांत टीकमजी अदम्य वीरता बताय गायां पाछी ले आया, पण कुजोग सूं इणी लड़ाई में तोळैसर रावजी रा कुंवर राणसी वीरगति पायग्या। जद आ बात टीकम जी नैं ठाह पड़ी तो उणां आ कैय कटारी खाय प्राणांत कियो कै ‘‘रावजी कुंवरजी नैं म्हारै भरोसै मेलिया अर म्हैं उणां नैं बचा नीं सकियो तो बिना कंवरजी रै जाय’र रावजी नै जीत री कांई खबर देवूंला!’’

मालणदेवी चार बरस तांई तो आपरै पीहर भांडू ई रह्या अर चार बरसां पछै आपरी भोजाई री किणी बात सूं रीसाय आपरै सासरै बिराई आय जळ सूं अग्नि प्रजाळ उणमें आपरो शरीर समर्पित कियो।

टीकमजी रै बेटै राजसी री वंश परंपरा में आगै जाय’र रुघनाथदानजी हुया। रुघनाथदानजी री तीजी पीढी में चंद्रभांणजी हुया। चंद्रभांणजी रो ब्यांव गांम भीखोड़ाई रै बारठ बुलीदानजी अचळावत री बेटी रूपांबाई रै साथै हुयो। इणी चंद्रभांणजी कविया रै घरै वि. सं. 1970 री आसोज सुदि सातम वार शुक्रवार रै दिन आपां रै आलोच्य कवि विजयदानजी उर्फ व्रजलालजी कविया रो जलम हुयो। जद व्रजलालजी री उमर फगत 7 बरस री ही, तद इणां रै पिताजी रो सुरगवास हुयग्यो। कवि री शिक्षा-दीक्षा गांम तोळैसर में आपरी भुवासा मेहतूबाई रै घरै रैय पाखती रै गांम बंबोर में जति जसराजजी रै कनै हुई। खुद कवि रै आखरां में:

वास लवेरै बीच में, विद्यादार वसंत।
मोहि पढायो कर महर, जतीराज जसवंत।।

बिराई आथूणै राजस्थान में साहित्यिक वातावरण अर सांस्कृतिक चेतना रै पांण ‘लोहड़ी कासी’ रै नाम सूं जाणीजै। कविवर धनदानजी लाळस (चांचळवा) रै आखरां में:

बहु लायक है गांम बिराई।
भेळा बसां गिनायत भाई।
राजत है कविया गुणरासी।
कविता करण दूसरी कासी।।

आ वा ई बिराई है, जिकी डिंगळ रै विख्यात कवियां रै बडेरां रो मूळ उद्गम स्थान रह्यो है। भवानीदासजी कविया, गंगजी कविया, अलूजी कविया, कविराजा करनीदानजी कविया, सागरजी कविया, हिंगळाजदानजी कविया, रामनाथजी कविया, गोपाळदानजी कविया आद रा वडेरा इणी बिराई सूं ई गया अर राजस्थानी साहित्य नैं रातो-मातो कर सुजस खाटियो, सो बिराई कवियां रो मथासरो। इण विषय में अेक दूहो प्रसिद्ध है:

कवि गांगो भानी सकव, पंचायण सादूळ।
सुत च्यारूं कवि नाथ रा, मुदै बिराई मूळ।।

इणी बिराई रा डिंगळ कवि सालमजी कविया, चिमनजी कविया, मगनीरामजी कविया रै साथै सिरै कवि शम्भूदानजी कविया अर व्रजलालजी कविया रो नाम आदरणीय अर अग्रगण्य है तो वर्तमान रै कविया में डॉ. शक्तिदानजी कविया रो नाम सिरै। बिराई धरा आपरी साहित्यिक पृष्ठभूमि रै कारण चावी है तो आपरी उदारता रै पांण ई ठावी। बीसवीं सदी रा डिंगळ कवि धूड़जी मोतीसर (जुढिया) बिराई री साहित्यिक, भौगोलिक अर सुदीर्घ औदार्य परंपरा री ओळखांण आपरै अेक छप्पय में इण भांत दीनी है:

सिध आथमणो वास, वास विचलो वाखांणूं।
वड चक्र मोटलवास, जबर चंगपुर जांणूं।
कविया भोज करन्न, दिपै कोटड़ियां दावा।
अेक-अेक सूं इधक, च्यार कूंटां जग चावा।
सुपातां पाळ बिखमी समै, भव सुभ निजरां भाळवो।
बिराई तखत ताला-विलंद, मांगण हंदो माळवो।।
ग ग
क्यूं जावै धूड़ा सकव, माळव देस मंझार।
मुदै बिराई माळवो, चौकस कोसां च्यार।।

जैड़ौ कै आपां समझ चुका हां कै बिराई मा मालणजी री वरदाई भोम, जठै टणकाई टीकमजी री गौरवशाली वंश परंपरा में सिरै साहित्यिक वातावरण रह्यो। अैड़ी पावन भोम अर पावन वातावरण रै पांण व्रजलालजी कविया फगत सौळह बरसां री उमर में ई कविता करण रो आंटो ई नीं सीखिया बल्कि अलंकार अर व्याकरण रो ई सांगोपांग अभ्यास सिद्ध कर लियो हो, तो साथै ई पूर्ववर्ती कवियां री उटीपी डिंगळ रचनावां कंठस्थ करली ही। सौळह बरसां री उमर सूं लेयनै सुरगवास हुयो जितै आपरी सिरजण-जात्रा अनवरत रूप सूं चालती रह्यी है। वि. सं. 2044 री सावण सुदि छठ रै दिन कविवर व्रजलालजी रो अचाणचक सुरगवास हुयग्यो। पूरो थळवट इलाको शोकमान हुयग्यो। डॉ. शक्तिदानजी कविया रै आखरां में:

सुकवि चमाळै साल, सांवण सुद छठ वार सनि।
वड कवियो व्रजलाल, सुरगां पूगो चंदसुत।।

आपरा मित्र अर सिरै कवि धनदानजी लाळस री विरह-वेदना री कविता तो किणी पण संवेदनशील मिनख रै मन में संवेदना जगाय देवै। कवि लिखै कै म्हैं तो यूं तो जाणतो हो कै म्हैं मोटो हूं, सो पैलां स्वर्ग प्रयाण करूंलो अर उण माथै व्रजलालजी म्हारा मरसिया कैवैला, पण दुजोग जोवो! कै व्रजलालजी रा मरसिया म्हनैं कैणा पड़ रह्या है:

कमधज वाघो कोटड़ै, आसो करतो याद।
वार-वार कविया विजा, सदा सुणावूं साद।।

वास्तव में मरणो अैड़ै मिनखां रो ई सार्थक है जिकां संसार में सुजस लेवण अर हरिनांम रटण री तजबीज जाणली:

जगत रा सुजस नै जाप जगदीस रा,
समझिया जिकां दुय बात साजी।

कविवर व्रजलालजी कविया ई आ बात अमर करग्या कै ‘‘आखर रहसी अमर इळ, खप जासी सह कोय’’। साहित्य सदैव अमर है बाकी सब मरणहार। व्रजलालजी ई इण बात नैं अनुभूत मान’र निरंतर सिरजण करता रह्या। लगै-टगै अठावन बरसां री सुदीर्घ साहित्यिक सिरजण-जात्रा में आप शक्ति साधना, ईश आराधना, प्रकृति प्रेम, सूरमां सुजस, सांस्कृतिक आख्यानां रै साथै-साथै समय रै साच नैं दरसावतां थकां समाज में पनपी विषमतावां, विद्रूपतावां, मूल्यहीनता, राजनीतिक सिटळापण माथै बिना किणी खोट रै आपरै सबदां सूं चोट करण में कठैई चूक नीं करी। कवि रो मूळ ध्येय आज री युवा पीढी में स्वाभिमांन कायम राख’र संस्कृति अर संस्कार सींचण रो हो। कवि गांमां में मिनखां री कर्मठता, ईमांनदारी, सहजता अर अपणास रो आगार देखियो बो कवि रै देखतां-देखतां नीठग्यो। इण सारू कवि आज री सिद्धांतहीण राजनीति नै दोषी मान’र इण माथै बेबाक चोट करी। कवि रो किणी पण राजनीतिक विचारधारा सूं कोई खास लगाव नीं रह्यो। जठै कवि नैं लागो कै कोई विशेष राजनीतिक विचारधारा देश में थापित मूल्यां रै साथै-साथै भोळै-भाळै निस्छळ गांमेड़ू लोगां साथै ई छळ-कपट कर’र उणां री भावनावां सूं निसंक खेल रह्यी है तो कवि छापळ झाल’र दापळियो नीं बल्कि बिनां किणी लोभ-लालच री चिंता करियां आपरै कवि कर्म अर धर्म नैं सांगोपांग निभायो है। जद आपां कविवर व्रजलालजी कविया री रचनावां रो समग्र अध्ययन करां तो अेक बात साव निगै आवै कै कवि रो जुड़ाव आम जन सूं हो।

कवि मूलतः उण विषयां माथै आपरी कलम री कमनीयता बताई जिकै सावजोग रूप सूं जन आस्था, जन हितैष्णा अर जनचेतना सूं जुड़िया थका है। कवि री हर रचना जन भावनावां अर संवेदनावां रै ओळै-दोळै आपरो सिरजण पूरो करै।

लोग लगाव अर भावां नैं समझ’र जिण चाव अर उछाव सूं कवि विषय वरणाव कियो है बो हकीकत में वरेण्य है। कवि रै रचना संसार अर भावगत विशेषतावां नैं समझण सारू कीं शीर्षकां रै तहत बात नैं स्पष्ट करणी ज्यादा समीचीन रैसी।

शक्ति सुजस सोरम
राजस्थान वीरता री धरा है। ओ ई कारण रह्यो है कै अठै रा सुरसती साधक ई शक्ति री प्रतीक दुर्गा अर्थात रणचंडी री झंडी तळै ई रैवणो सावजोग मानै। शौर्य री प्रतीक शक्ति री भक्ति अर इणरै चारणां में अनुरक्ति राख’र अठै रै कवियां लगोलग रम्य रचनावां रो प्रणयन कियो है। यूं तो राजस्थान में वैदिक देवियां, जैन देवियां, लोकदेवियां अर चारण देवियां री पूजा हुवै, पण सर्वव्यापक रूप सूं चारण देवियां ई घणकरीक जागा अर विशेष रूप सूं आथूणै राजस्थान में लोकदेवियां रै रूप में सर्वमान्य है। लोकपूज्य चारण देवियां में आवड़जी, करनीजी, सैणीजी, मालणदेवी आद री मानता अठै घणी है। इण देवियां रै चारु चरित्र रो चित्रण अठै रै कवियां सांगोपांग कियो है। कविवर व्रजलालजी ई ‘शक्ति सुजस सोरम’ आपरै सबदां अर भावां सूं लोक में संचरित करण में कोई कसर नीं राखी। ‘शक्ति सुजस सोरम’ में मालणदेवी महिमा, चामुंडाराय रा छंद, सैणल सुजस, करनीजी रा कवत आद रै माध्यम सूं सरल अर साचमन रै भक्त री भावना रो प्रगटीकरण कियो है। कवि नैं पूरो पतियारो है कै देवी संकट री हरणी अर भक्त री सरणी है। बिखमी रै बेड़ै री तरणी अर सुखां रा भंडार भरणी है। कवि नैं मा मालण माथै अणहद भरोसो है। कवि रै आखर-आखर में मा मालण रै प्रति अथाग विश्वास, दृढ़ता अर सहज धणियाप है। तपतो तावड़ो, उकळतो ओकळ, उमड़ती आंधियां, घोर संकट अर वंकट समय में एकमेव तारणहार अर काळजै में धीजो देवण वाळी मालण महमाई ईज है। इण रो आसरो ईज सुख वासरो है। कवि रै आखरां में:

ऊनाळै रुत आकरी, धूम तपै बहुझाळ।
आप दुलाई आसरै, होत रहै हरियाळ।।
…हो जगतंबे अम्बे।।

इण आपाधापी रै जुग में च्यारां कानी लूट-खसोट, चोरी, ठगी, छळ-छदम अर तोतक रासो है। इण कूड़-कपट रो जवाब कवि रै कानी सूं फगत अर फगत मा मालण ई देय सकै:

मैं भोळो मूरख मुदै, उपजै नाय उकाब।
रोळ कचेड़ी राजरी, जगतंब दहै जवाब।।

विकराळ कळिकाळ री झाळ सूं उबार, सेवग री संभाळ राखण वाळी मा मालण ईज है:

कळीकाळ वहु विकराळ ज्यां बिच, झाल कर संभाळ तम।
प्रतिपाळ कर व्रजलाल पे, अम्बे तुहारे बाळ हम।।

कवि आपरी कुळ आराध्य देवी मा मालण री महिमा में छंद, दूहा, चिरजावां आद रच’र शक्तिकाव्य नैं रुचिर नितप्रत पाठ रै लायक बणायो। इणां री चिरजावां लोक सुरां अर लोक कंठां में रमती थकी लोक विश्रुत है। इणी कड़ी में मंडोवर रै पूर्व शासकां पड़िहारां री आराध्य देवी चामुंडाराय रै चारु चरित्र री चंद्रिका चतुर्दिक चमकावण सारू नामी घड़त अर सुंदर जड़त सूं जगमगाट करतो रोमकंद छंद रचियो। ईंदां (पड़िहारां) रै पछै मंडोवर माथै राव चूंडाजी राठौड़ रो राज थपियो:

पह ईंदां रो पा’ड़, कमधज कदै न वीसरै।
चूंडो चंवरी चाड़, दीनी मंडोवर दायजै।।

कालांतर में मंडोवर रा शासक राठौड़ हुया तो इणां री ई आस्था देवी चामुंडा रै प्रति रैयी। मारवाड़ रै शासकां री आ आस्था तर-तर बधती गई। आजादी रै पछै लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुनाव हुया तो महाराजा हनुवंतसिंहजी ई चुनाव लड़िया अर ईंदावटी रै गांम बसतवा में ‘गोतापुर’ नदी रै कड़खै थापित चामुंडा रै थांन आया। इण थांन माथै कविवर व्रजलालजी आणंददायक रोमकंद छंदां री भावप्रवण प्रस्तुति दी। हनुवंतसिंहजी कवि रै भाव-कौशल अर काव्य-सौष्ठव सूं घणा राजी हुया अर सनातनी संबंधां री रीत पाळतां थकां भेंट सरूप कवि नैं चांदी रा सिक्का इनायत किया। व्रजलालजी री उटीपी जोड़, सुंदर शब्द चयन, भावां री निर्झरणी अर अलंकारां री छटा देखणजोग है:

मझ भादव मास मेळा अति मंडत, जोत अखंडत होत जदं।
निज मंदर पास इसो गिर कंदर, सोभ नरंदर जेठ सदं।।
जिण पीठ सवार हुवै जग अंबर, ता भुज लंबर साय तहै।
महराजधिराज जोधांण महीपत, बीसहथी निज साथ बहै।।

राजस्थानी शक्तिकाव्य री आ उक्ति घणी चावी है कै ‘‘करनी हर करतार, जुदा कदै न जांणियै’’। अर्थात् इणां करतार अर करनी में कोई भेद नीं मानियो है। इणी अभेद भाव रै पांण कवि व्रजलालजी ई ‘करनीजी रा कवत्त’ कह्या। कैवण में तो करनीजी रा कवत्त है पण मांय वर्णन ‘अेक ही रूप अनेक रो’ है। सबद-सबद में भक्त-हृदय री दृढ़ता दीठगत हुवै:

वास अर वासन में, सासन उसासन में,
पात ‘विजै’ पासन में, करनी किनियांणी छै।

राजस्थान अर गुजरात में लोकदेवी सैणीजी री घणी मानता है। सैणीजी रो जलम तो गोरड़याळा (गुजरात) में हुयो, पण मुख्य थांन जुढिया (शेरगढ़) में है:

तखत दोहूं तड़ोबड़ै, जुढियो नै जोधांण।
वठै राजां रो बैसणो, (अठै) सैणी तणो सुथांन।।

‘शिखरै उगमावत रा कवत्त’ में कवि लिखै कै शिखरैजी ईंदा, लूणोजी लाळस नैं वि. सं. 1353 में जुढियो सासण दियो:

तेरैसौ तेपनै, सुकळ पख तेरस सांमण।
जोय मोहरत जोग, सिरै भिरगुवार सुहावण।।
निज तोरण अस नेग, वेस वागो वरदाई।
पोळ पात परसतां, कुमी नह राखी काई।
पसाव लाख मोती पमंग, कवि लूणो अभरी कियो।
साख रै रूप ईंदै सिखर, दत सांसण जुढियो दियो।।

क्रमशः

~~गिरधर दान रतनू “दासोड़ी”

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