विजयी एवं पराजयी मानसिकता

युवाओं के हृदय सम्राट एवं भारतीय मनीषा के महनीय आचार्य स्वामी विवेकानन्द के साहित्य का अध्ययन करने पर सार रूप में यह समझ आया कि व्यक्ति की हार एवं जीत में उसकी मानसिकता का अहम योगदान रहता है। कबीर ने भी ‘मन के हारे हार है, मन के जीते जीत‘ कह कर इस तथ्य को पूर्व में ही स्वीकृति दी है। स्वामीजी के अनुसार मानव समाज में दो तरह की मानसिकताएं सदैव साथ-साथ काम करती है। एक ही काम, एक ही व्यक्ति एवं एक ही विषय पर हमारी अलग-अलग राय के पीछे ये मानसिकताएं ही काम करती है। ये हैं – 1. विजयी मानसिकता एवं 2. पराजयी मानसिकता। इसे हम सकारात्मक एवं नकारात्मक भी कह सकते हैं तो आशावादी एवं निराशावादी मानसिकता भी कह सकते हैं। मानसिकता के ये दोनों रूप रहते साथ-साथ हैं लेकिन दोनों धुर-विरोधी हैं अतः जहाँ जिसकी प्रबलता होती है, वहां परिणाम भी वैसा ही आता है। इस मानसिकता को एक सर्वविदित उदाहरण के माध्यम से अपने विद्यार्थियों को समझने हेतु कल एक काव्य रचना की सृष्टि का विचार आया। मैंने चन्द्रमा एवं कवि के बीच वार्तालाप के माध्यम से इस तथ्य को स्पष्ट करने का प्रयास किया है। आप सब मित्रों एवं मेरे जिज्ञासू विद्यार्थियों के अवलोकनार्थ सद्य-सृजित यह रचना प्रस्तुत है-

कवि-कथन
उर अमृत रजनी रमण, षोडश कला- प्रकास।
कवि पूछे हिमकर कहो, आनन केम उदास।।
कवि ने आकाश में चमकते हुए चन्द्रमा से पूछा, हे हिमकर! तेरे हृदय में अमृत का निवास है; सौंदर्यवती रात्रि तेरे रमण हेतु सदा-सर्वदा विद्यमान है; सोलह कलाओं का प्रकाश तेरे पास है, फ़िर तेरे चेहरे पर उदासी क्यों?

कवि भी नकारात्मक मानसिकता का, जिसे चाँद की उज्ज्वल चाँदनी की बजाय उसके चेहरे की उदासी दिखी और चाँद भी उसी उदासीन मानसिकता का मिला, जिसने बताना शुरू किया कि हे कवि! मेरे तो दुख ही दुख है। कोई सुख नहीं। मैं अपने परिजनों के व्यवहार एवं आचार-विचार से परेशान होकर दुखी एवं उदास हूँ। चूंकि चन्द्रमा समुद्र मंथन में निकले चौदह रत्नों में से एक है अतः समुद्र चन्द्रमा का पिता है और 14 रत्नों में से 13 उसके भाई-बहिन है। देखें पराजित मानसिकता वाला चन्द्रमा अपने सारे परिजनों की कमियों पर ध्यान देते हुए अपने आप को कैसे दुखी साबित करता है।

चन्द्र-कथन
तात तोयनिधि जाको खारो अति खारो तोय,
भ्रात विष जापे विश्वास ही में त्रास है।
बहिन रमा को घर घर घूमने की बाण,
खलक में एक भी न घर वाको खास है।
मोटी बैन मणि जाको शेष से विशेष मोह,
दीन भ्रात शंख फूंक मारे वाको दास है।
कहे ‘गजराज’ चंद कहो सुख कौनसो है,
धरा पे न धाम मेरो आसरो आकास है।।
चन्द्रमा कहता है, हे कवि! मेरे पिता जलनिधि यानी समुद्र हैं, जिनका जल किसी के भी पीने के काम नहीं आता अतः दुनिया मेरे पिता की महानता को बेमानी बताती है। बदनसीबी से मुझे विष जैसा भाई मिला है, जिस पर विश्वास करना मौत को न्योता देने जैसा है। हे कवि! मेरा भाग्य देख, रमा यानी लक्ष्मी जैसी बहिन मुझे मिली है, जो दिना-रात घर-घर घूमती रहती है, आज तक इस संसार में किसी भी घर को उसने खास आवास नहीं बनाया। जिसकी बहिन ऐसे पर-घर घूमती हो, उस भाई को कौन बोलने देगा। इतना ही नहीं मेरी एक बड़ी बहिन मणि है, जिसने एक घर तो पकड़ा लेकिन वह शेषनाग से स्नेह कर बैठी। उससे मिलने जाना भी साक्षात मृत्यु का वरण करने जैसा है। इससे आगे सुनो, मेरे घर में शंख जैसा भोला एवं गरीब भाई है, जो कान का बड़ा कच्चा है, दूसरों की फूंक से बजता है। कवि ‘गजराज’ से चाँद ने कहा कि हे कवि! मेरे कौनसा सुख है। ऊपर गिनाए सारे दुखों से बड़ा दुख यह है कि सबको रहने के लिए छोटा-मोटा आवास तो चाहिए, मेरे पास तो इस धरती पर रहने को कोई ठौर-ठिकाना भी नहीं है, मैं तो आकाश में अटका हुआ हूँ। अब बताओ मेरे चेहरे पर मुस्कान कैसे आ सकती है।

चन्द्रमा यहीं नहीं रुकता है, वह अपने अन्य परिजनों की कमियां भी गिना कर अपनी उदासी को न्यायोचित ठहरता है।

चंद्र-कथन
असुरों के आसपास बैन वारुणी को वास,
रूपवती रंभा जापे छलने को दाग है।
बीर धन्वन्तरि भी भए लोभी धोखेबाज,
अनुजा हमारी धेनु बापुरी अभाग है।
देवों के उदर माँहीं भ्रात अमी दब्यो पर्यो,
धनुष को काम ये उड़ावै बैठो काग है।
कवि ‘गजराज’ तरु कटे ओ घटे हैं गज,
ससी पूछै कहो मेरे कौनसो सौभाग है।
चन्द्रमा कहने लगा हे कवि! मेरी एक बहिन है-वारुणी यानी सुरा, दारू। वह हमेशा असुरों एवं दुष्टों के साथ रहती है। एक बहिन रंभा है, जो संसार की सबसे रूपवती स्त्री है लेकिन उस पर भी तपस्वियों को छलने का कलंक है। वेद धन्वन्तरि जैसा बड़ा भाई है, लेकिन वह भी कलि के प्रभाव से लोभी और धोखेबाज का तमगा लिए बैठा है। बेचारी मेरी भोली बहिन कामधेनु आज धरती पर सबसे लाचार एवं अभागा प्राणी बन गई है। भाई अमृत का सहारा मिल सकता था, लेकिन वह भी देवताओं के पेट में जाकर छुप गया। मेरा एक भाई धनुष कालातीत हो गया, जिसका मुख्य काम काल के गाल में समा गया। वह लाचार होकर बस कौवे उड़ाने के काम आ रहा है। कवि ‘गजराज’ से निराश चाँद ने कहा कि हे कवि! मेरा भाई कल्पवृक्ष यानी पेड़ आज अन्धाधुन्ध कट रहा है तथा एक भाई ऐरावत हाथी हैं, जो दिनोदिन घटने को विवश है। हे कवि! मेरे कौनसा सौभाग्य है, जिस पर खुश हो सकूँ।

चाँद यहीं नहीं रुकता, परिजनों की कमजोरियां के साथ ही अपनी अन्य व्यथा बताते हुए आगे कहता है-

चंद-कथन
सारे घर-वारे मेरे रहे न्यारे-न्यारे सही,
तो पे वे तमाम धरा धाम के निवासी हैं।
सबको मैं प्यारो तो पे सबसे किनारो भयो,
अटल नियारो मेरो वास ही आकासी है।
अटक्यो आकाश हूँ मैं याही ते निराश हूँ मैं,
मीन है न मेख मेरी रंक-बंक रासी है।
कहे ‘गजराज’ चंद तेरी सौं न झूठ कहूँ,
एते कारणों से मेरे आनन उदासी है।।
कवि से चंद्रमा कहता है हे कवि! मेरे सारे घर वाले भले ही अलग अलग रह रहे हों लेकिन सबको धरती पे विचरण एवं आवास का सौभाग्य मिला है। मैं उन सबका प्यारा होकर भी सबसे किनारे हो गया। हमेशा परिवार से दूर आकाशी वास हेतु अभिशप्त हूँ। हे कवि! मैं आकाश में अटका हूँ, इस लिए भी निराश हूँ। चाँद आगे कहता है कि हे कवि! अब मुझे पूरा पता लग गया कि मेरी राशि मे ही दुख एवं उदासी लिखी है, इसमें कोई मीन-मेख नहीं। कवि ‘गजराज’ से चाँद ने कहा कि हे कवि! तुम्हारी सौगंध मैं कुछ भी झूठ नहीं कह रहा हूँ। मैंने जो ऊपर बताए हैं, उन सब कारणों का परिणाम ही मेरी उदासी है।

इस पराजित मानसिकता वाले चाँद के लिए समुद्र जैसा पिता एवं दुनियां में रत्न की संज्ञा से अभिहित 13 परिजन सारे के सारे दुख के कारण हो गए।

यही चाँद जब विजयी एवं सकारात्मक मानसिकता से बोला तो देखो, उसके ये सारे के सारे परिजन एवं प्रियजन कैसे उसके लिए गौरव एवं फक्र का विषय बन गए।

कवि-कथन
स्याह तमस सांसो सदा, प्रबळ राहु रिपु पास।
कवि पूछे हिमकर कहो, आनन केम उजास। ।
कवि ने चम-चम चमकते चन्द्रमा से पूछा कि हे चाँद तेरे चारों और सदैव स्याह-अंधेरा रहता है, जो अटल आफ़त जैसा है। तेरे राहु जैसा महा प्रबल शत्रु है, जिसकी गिरफ्त में आते ही तेरा नूर काफ़ूर हो जाता है। इसके बावजूद भी तेरे चेहरे पर ये उजास, ये खुशी कैसे?

चन्द्रमा बड़े फक्र के साथ अपने परिजनों की खूबियों एवं उपलब्धियों का जिक्र करते हुए कहता है कि हे कवि ये आपदाएं मेरे लिए कोई मायने नहीं रखती, इनकी क्या बिसात है। सुनो! मेरे चेहरे की प्रसन्नता के अनेक कारण हैं, एक एक कर बताता हूँ-

सकारात्मक मानसिकता से साहस संजोते हुए चाँद ने बड़ी सिद्दत से जवाब दिया। देखें-

चंद-कथन
जामी रतनाकर के सुजस पे रीझे जग,
नामी वीर अमी जमराज को जितैया है।
अनुजा रमा के आगे जग हाथ जोड़ ऊभो,
बहनोई विष्णु तीन लोक को खेवैया है।
धात्री मही-मण्डल की बाजे मेरी कामधेनु,
धन्वन्तरि बीर पर-पीर को मिटैया है।
कहो ‘गजराज’ हिमकर के फ़िकर कैसो?
मन में अनंद मंद मंद मुस्कैया है।।
चन्द्रमा ने कहा हे कविराज सुनो! मेरे पिताश्री रतनाकर हैं,जिनके सुयश पर सारा संसार न्यौछावर होता है। सारी दुनियां जिस यम के नाम से ख़ौफ़ खाती है, मेरा स्वनामधन्य भ्राता अमृत उस यमराज को परास्त करने वाला है। इतना ही नहीं मेरी छोटी बहिन रमा (लक्ष्मी) तो इतनी शक्तिशाली है कि जिसके सामने अखिल विश्व करबद्ध होकर उसके वरदान का अभिलाषी बना खड़ा रहता है। उसके पति और मेरे बहनोई भगवान विष्णु तीनों लोकों की नैया के खेवनहार हैं। मेरी विनीत बहिन कामधेनु त्रिभुवन की महतारी (गोमाता) के पावन पद को सुशोभित करती हैं। मेरे भाई धन्वन्तरि पर-पीड़ा निवारक वैद्य हैं, जिनकी प्रतिष्ठा निर्विवाद है। हे कवि गजराज! कहो फिर इस हिमकर को किसी भी तरह का कोई फ़िक्र कैसे हो सकता है। ऐसा कहकर चाँद मन्द मन्द मुस्कुराने लगा।

कवि की नजरों से नजरें मिलता हुआ चाँद फिर बोला-

चंद-कथन
सहोदरा मणि सो तो शेषहू के शीष सोहे,
ईश नीलकण्ठ वास विष भ्रात पायो है।
रंभा रूपवती जाके रूप तीनों लोक रीझे,
एक एक अंग तें अनंग को रिझायो है।
वारुणी के वरण को सुर ओ असुर भूप,
एक तें अनूप एक नारियल आयो है।
कहो ‘गजराज’ हिमकर के फ़िकर कैसो,
ऐसो परिवार और कौन को बतायो है।।
चन्द्रमा आगे कहने लगा हे कविराज! इस धरती को जिसने अपने फण पे अधर उठा रखा है, उस महाप्रतापी शेष नाग के मस्तक पर मेरी बहिन मणि विराजमान है। उसी से शेष की शोभा सवाई है। मेरे भ्राता विष,जिससे लोग डरते हैं, लेकिन उसे स्वयं कालकूट महादेव ने अपने नीलकण्ठ में वास देकर मान दिया है। रूपवती भगिनी रंभा को कौन नहीं जानता! जिसके रूप पर तीनों लोक रीझते हैं,उसने तो अपने एक एक अंग से अनंग यानी कामदेव को अपना दीवाना बनाया है।लोगों को अपनी बहिन-बेटियों के लिए उचित वर तलाश करने की चिंता रहती है लेकिन मेरे यहाँ ऐसा नहीं। मेरी बहिन वारुणी के लिए तो देव, दानव एवं राजा सब लालायित हैं, एक से बढ़ कर एक रिश्ता (सगाई का नारियल) आ रहा है। हे कवि! कहो फिर मुझे फ़िक्र क्यों होगा। त्रिभुवन में मेरे परिवार जैसा सुखी एवं समृद्ध परिवार दूसरा कौन सा है?

चाँद आगे कहता रहा-

चंद कथन
नाग नाक भूतल में जेते भए नामदार,
ते ते सब ही तो मेरे जाने पहचाने हैं।
शंख की आवाज़ सुनी दौरे आते देव सारे,
भूप भूमि वारे धनु बाजि के दीवाने हैं।
देवों के अधीश सुर-ईश प्रिय इंद्र देव,
गज पे आरूढ़ होते तीन जग जाने हैं।
गुणो ‘गजराज’ दस-चार भ्रात-भगिनी हैं,
सारे प्यारे नामवारे छिति ते न छाने हैं।।
चाँद अपने परिजनों की विशिष्टताएं गिनाते हुए कहने लगा, हे कवि! स्वर्ग, पाताल एवं भू लोक (तीनों लोक) में जितने लोग नामदार हैं, वे सभी हमारे परिवार का हिस्सा हैं, हमारे जाने पहचाने हैं, हम किसी परिचय के मोहताज़ नहीं हैं। मेरे भाई शंख का ऐसा रुतबा है कि उसकी आवाज़ सुनकर सारे के सारे देवगण दौड़ कर आ जाते हैं। इस भूमि के भूप यानी राजा मेरे परिजन धनुष एवं अश्व (बाजि, घोड़ा) के दीवाने हैं। ये धनुष एवं अश्व के लिए कुछ भी करने को तैयार रहते हैं। इससे आगे की बात करें तो देवताओं के अधिपति सुरेश इंद्र तो मेरे भ्राता ऐरावत हाथी पर आरूढ़ होकर ही देवताओं पर राज करते हैं। इस बात को सब जानते हैं। हे कवि गजराज इस बात को गुणो, मनन करो कि हम चौदह के चौदह बहिन-भाई नामदार हैं, यह बात छिति यानी धरती पर किसी से गुप्त नहीं हैं। इस खुशी के कारण मेरे चेहरे पर सदैव चमक रहती है।

अब चाँद ने कहा हे कवि एक सत्य से अवगत करवाते हुए अपनी वाणी को विराम दूंगा-

चंद-कथन
सुनो कविराज मेरे दिल की आवाज़,
रखा एक भी न राज आज मन की बताई है।
दुख और सुख दोऊ बाजे दीठ हू के दास,
दृष्टि जैसी सृष्टि वेद-विबुध ने गाई है।
जाहर जहानहु में मेरो परिवार जाकी,
खूबी और खामी ‘गजराज’ को गिनाई है।
वसुधा के वासी यातें जान लो जरासी बात,
जैसी है निग़ाह वैसी दूनी दरसाई है।।
चन्द्रमा कहने लगा हे कविराज! आज मैं आपको दिल खोलकर सारे राज बताता हूँ। संसार में ये जो सुख एवं दुख हैं,ये दोनों ही हमारी दृष्टि के दास हैं। जैसी दृष्टि होती है, वैसी ही सृष्टि निश्चित है। इसमें कोई मतभेद नहीं हैं। हे कवि! मैं परबीती नहीं घरबीती बात कर रहा हूँ। मैने स्वयं अपने परिवार के माध्यम से तुम्हारी लेखनी के सहारे संसार को यह तथ्य समझाया है। मेरा परिवार विश्व विख्यात परिवार है, उस के खूबियों एवं खमियों दोनों पक्षों को सोदाहरण समझाया है। चाँद कहता है कि इस वसुधा के निवासियों को मैं इतना सा संदेश देना चाहता हूं कि जैसी हमारी निग़ाह है, यह दुनियां हमें वैसी ही दिखती है।

चाँद का जवाब पाकर कवि धन्य हुआ। आपको चाँद का जवाब कैसा लगा, कृपया अपनी प्रतिक्रिया अवश्य देवें।

~~डॉ. गजादान चारण ‘शक्तिसुत’

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *