विनायक-वंदना


।।गीत – जांगड़ो।।
व्हालो ओ पूत बीसहथ वाल़ो,
दूंधाल़ो जग दाखै
फरसो करां धरै फरहरतो
रीस विघन पर राखै।।१

उगती जुगती हाथ अमामी,
नामी नाथ निराल़ो
भगतां काज सुधारण भामी,
जामी जग जोराल़ो।।२

मात-पिता रो पूजक मोटो,
कँवर ज आज्ञाकारी।
मानै विसन चतरमुख मन सूं,
सो जाणै धर सारी।।३

पूजै पनँग असुर सुर पूजै,
सरग पताल़ं सारा।
तुरत तूठ नै त्यांरा तूं तो,
भर देवै भँडारा।।४

आगैडाल़ पूजवै अवनी,
सार संभाल़ सचाल़ो।
सिमरै बाल़ स्हायक बणनै,
विणसै दुख विरदाल़ो।।५

परचँड पिंड बडाल़ो पेटड़,
सूंड लटकती सामी।
वैंजती माल़ गल़ै वरदायक,
नायक गण घणनामी।।६

बुद्ध रो बगसणहार वदीजै,
काम अनोखा कोटी।
मुरलोकां सिरताज मुणीजै,
महल़ दोउं घर मोटी।।७

रणतभंवर तणो बड राजा,
शंकर कंवर सुणीजै।
ढिग जग सारो चँवर ढोल़वै,
प्रभता प्रात पुणीजै।।८

आखू तणी चढै असवारी,
भल मन मोदक भावै।
शस्त्र करां अरी दल़ साजण,
अबढी विरियां आवै।।९

एको रदन ऊजल़ै अंगां,
लाभ शुभां रो लेखो।
आगर ग्यान तणो अन्नदाता,
प्रीत निजर निज पेखो।।१०

वेदव्यास तणी सुण विणती,
अमी दीठ भर आयो।
भारत महा कियो सिग भूमि,
बड कज सहज बणायो।।११

गणपत तणी सरण गिरधारी
धरण ऊपरै धारी
हरण विघन दास हरसाजै
सुकवी कारज सारी।।१२

~~गिरधरदान रतनू “दासोड़ी”

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