वाहर करणी वीसहथी

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।।दूहो।।
सीख सुचंगी दे सदा, उर घर मूझ अणंद।
कथूं तिहारो करनला, छतो त्रिभंगी छंद।।

।।छंद – त्रिभंगी।।
मरूधरा मँझारम धिन देह धारम, वण कल़ु वारम करतारम।
सगती साधारम सकल़ संसारम, भोम उतारम अघ भारम।
संकट रा कारम तुंह सुधारम, आंण उबारम वेग अती।
धिन जांगल़ धरणी हर दुख हरणी, वाहर करणी वीसहथी।
जियै वण तूं वाहर वीसहथी।।१

जादम जबराल़ो जोप जोराल़ो, पूगल़ वाल़ पटियाल़ो।
केव्यां सिर काल़ो बेय क्रोधाल़ो, छिड़्यो फणाल़ो छत्राल़ो।
सरणै सिखराल़ो वहा वडाल़ो, भड़ मग भाल़ो धर भगती।
धिन जांगल़ धरणी हर दुख हरणी, वाहर करणी वीसहथी।
जियै वण तूं वाहर वीसहथी।।२

ओडी धर आई साद सुणाई भोजन लाई कर भाई।
उर में संक आई वीर बताई भड़ सथ साई भूखाई।
मुल़की महमाई भरम भँगाई, सेन छकाई बात छती।
धिन जांगल़ धरणी हर दुख हरणी, वाहर करणी वीसहथी।
जियै वण तूं वाहर वीसहथी।।३

रिड़मल पर राजी महियल माजी, दिल सुध साजी वड दाता।
नाहर अगराजी होय नराजी, रोल़ण पाजी चख राता।
विदगां पख गाजी राखण बाजी, नजर अंबाजी जोड़ नथी।
धिन जांगल़ धरणी हर दुख हरणी, वाहर करणी वीसहथी।
जियै वण तूं वाहर वीसहथी।।४

वीको टीकाई वो वरदाई गादी नाई गरवाई।
अस पीठां आई चढियो चाई, करण कमाई खग काई।
मिल़ियो मेहाई दुख दरसाई, राज दिराई चाढ रती।
धिन जांगल़ धरणी हर दुख हरणी, वाहर करणी वीसहथी।
जियै वण तूं वाहर वीसहथी।।५

धेनां खड़ चरती ओरण धरती, डगला भरती डंमरती।
अणभै ऊछरती वग्ग विचरती, परम परकती सुख परती।
पेथड़ दल़ पत्ती अधम असत्ती, घेर कुमती वट घती।
धिन जांगल़ धरणी हर दुख हरणी, वाहर करणी वीसहथी।
जियै वण तूं वाहर वीसहथी।। ६

सांपू जद सेवी दरद दखेवी, हिव दल़ केवी धेन हरी।
दादी तूं देवी गुण ना गेवी, किण विध ऐवी देर करी।
भल कान करेवी पैंड भरेवी, हणियो केवी लंब हथी।
धिन जांगल़ धरणी हर दुख हरणी, वाहर करणी वीसहथी।
जियै वण तूं वाहर वीसहथी।।७

लाखण ललचायो अंग उमायो, तीरथ न्हायो तरुणायो।
ऐड़ो पुल़ आयो विघन बधायो, जोगण जायो जम पायो।
धरमराज धुजाय़ो डकर डरायो, सुतन जीवायो जद सगती।
धिन जांगल़ धरणी हर दुख हरणी, वाहर करणी वीसहथी।
जियै वण तूं वाहर वीसहथी।।८

कमरो अँहकारी खाग करारी, चढियो भारी चोल़ चखां।
जैतल जिणवारी सुपह पुकारी, पांण पसारी होय पखां।
सात्रव संघारी धणियप धारी जैत जितारी तो जुगती।
धिन जांगल़ धरणी हर दुख हरणी, वाहर करणी वीसहथी।
जियै वण तूं वाहर वीसहथी।।९

करहल कत्तारम भर लद भारम, घरै सिधारम वाट गही।
भागो भड़कारम विड़ंग विकारम चौथ चितारम मदत चही।
करियो ओ कारम सजड़ सँधारम,
विघन विदारम सुख वरती।
धिन जांगल़ धरणी हर दुख हरणी, वाहर करणी वीसहथी।
जियै वण तूं वाहर वीसहथी।।१०

भल भाव चाव भर सबद सरस सर, सदन हरस कर सुरराया।
नित नेह निजर भर लाभ लहर कर मूझ महर कर महमाया।
धुर ध्यान अडग धर सीस चरण धर कवियण गिरधर कीर्त कथी।
धिन जांगल़ धरणी हर दुख हरणी, वाहर करणी वीसहथी।
जियै वण तूं वाहर वीसहथी।।११

छप्पय
सेवी पात सदैव, दान माफी रो दैणी।
ओगण गिणै न एक, लोहड़धर भीरत लैणी।
जैड़ा तैड़ा जाण, कीरती कांन कबूलै।
माठा आखर मेट, भीड़ भंजण नह भूलै।
टेरतां साद मेहा तणी, ऐहा विरद ईजाल़वै।
करनला दास गीधो कहै, भली निजर सूं भाल़वै।।
~~गिरधरदान रतनू “दासोड़ी”

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