व्हाल ब्हावरी री गज़ल

सुपन री बातां निराल़ी है सजणवा!
आँख में जिण सूं दिवाल़ी है सजणवा!१
हे सजनवा स्वप्न की बात ही निराली है। हे सजनवा उसी की वजह से ही तो मेरी आँखों में दीपावली छाई रहती है।

रात -राणी री महक रूं रूं रमंती,
डील ज्यूं फूलां री डाल़ी है सजणवा!२
हे सजनवा मेरे रोम रोम में रातरानी की महक रम रही है। आजकल मेरा शरीर जैसे फूलों से लदी डाली हो गया है।

ख्वाब वाल़ी नौकरी दीधी खरी थें,
रोज म्हारी रातपाल़ी है सजणवा!३
हे सजन तूनें मुझे रोज़ रोज़ ख्वाब देखते रहने की अच्छी नौकरी दी है जिससे रोज ही मेरी नाइट शिफ्ट (रात पाल़ी) होती है।

आंख रा दीबा बलै दुय रैण दिन रे!,
पलक शुभ पूजा री थाल़ी है सजणवा!४
हे सजनवा ! नैनों के दीपक दिवस रात जलते रहते है, और पलकें मानो पूजा की थाली बन ग ई है।

आंख अणियाल़ी लगै मम फूटरी घण,
काजल़ी ज्यूं रैण काल़ी है सजणवा!५
हे सजनवा मेरी काजल अंजित अनियारी (नुकीली आँखे) आँखे काली रात की तरह है।

धार कर कर नेह पुरसै नैण सूं जो
कुंण बा चातुर कलाल़ी है सजणवा?६
हे सजनवा! जो धार कर कर के नैनों से स्नेह की मदिरा पिलाती है वो कलाली (साकी, दारू बनाने वाली) कौन है? अर्थात मैं ही हूँ।

अंग मम ओपै कणेरी कांब जाणक,
थूंज सिंचणहार माल़ी है सजणवा!७
हे सजनवा! मेरा अंग कनेर पुष्प की डाली की तरह शोभायमान हो रहा है जिसे सींचनें वाला माली तू ही तो है।

याद री ऊगी है केसर क्यारियां मन,
कुंण इण खेती रो हाल़ी है?सजणवा!८
हे सजनवा! मेरे मन में यादों की केसर क्यारियाँ उग आई है इस खेती को सँभालने वाला किसान कौन है?अर्थात तू.ही तो है।

सोल़ आनी रूपियौ बस थूं “नपा” रो,
अवर तौ सब नोट जाली है सजणवा!९
हे सजनवा! नपा (नरपत का संक्षेप राजस्थानी उपनाम) का सोलह आनी (एक रूपये में सोलह आने होते है) रूपया तो तू ही है, बाकी सारे जाली नोट (fake currency) की तरह है।

©नरपत आसिया “वैतालिक”

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