यह तो बहन-बेटियां भी उठा सकता है

 

भोम परखो हे नरां, कहां परक्खो विंद?
भुइ बिन भला न नीपजै, कण तृण तुरी नरिंद।।

किसी राजस्थानी कवि ने कितनी सहज और सटीक बात कही है कि अपनी पुत्री को ब्याहने से पहले वर को परखने की आवश्यकता नहीं है बल्कि उसकी जन्मभूमि को परखने की आवश्यकता है। क्योंकि सब कुछ भूमि की भूमिका ही होती है। उसकी उर्वरा शक्ति बता देती है कि वहां कण (अन्न) तृण (घास) तुरी (घोड़ी) और नरिंद (राजा) कैसे हैं?

इस दोहे के परिपेक्ष्य में हम राजस्थान के गांवों का परीक्षण करें तो बात सोले आने सत्य प्रतीत होती। वहां की माटी में ऐसा तपोबल होता है कि सत्य, साहस, स्वाभिमान व शौर्य की जन्मघुट्टी वहां के पानी में स्वतः समाहित रहती है। जिसने ही पिया उसमें उक्त गुणों का प्राबल्य परिलक्षित होने लगता है। इस दृष्टिकोण से बात को विस्तीर्ण करते हैं तो हमारे मानसपटल में जैसलमेर के कोडां गांव का मानचित्र उभरता है। इस गांव का मानचित्र किसी भावावेश में नहीं उभरता बल्कि उभरने का पुष्ट कारण है कि इस गांव की बहुआरियां हो भलेही धियारियां। दोनों ने स्वाभिमान व जातीय मर्यादा की रक्षार्थ सत्याग्रहों का न केवल नेतृत्व किया बल्कि अवसर उपस्थित होने पर स्वयं को सबसे अग्रगामी रखकर अनुपम उदाहरण भी प्रस्तुत किया।
वैसे तो सूमलयाई, रामा और कोडां एक ही दादे की संतति है और एक तलाई का पानी पीते हैं-

रामां कोडां सूमलयाई।
तीनां गांमां एक तल़ाई।
है आपस में भाई-भाई।।

सूमलयाई गांव के रतनू वैणोजी/बैलोजी के दो पुत्र हुए-मालणजी और कोडोजी। कोडोजी ने अपने नाम से कोडां गांव बसाया। इन्हीं की संतति रतनुओं में कोडेचा कहलाती है।

कोडाजी की संतति में बीसवीं सदी में सगतीदानजी हुए। जिनकी शादी गूंगा गांव के बारठ ठाकुरसिंह की पुत्री सभाई के साथ हुई।

कुछ दिनों तक यह दंपति कोडां में रही फिर अकाल के समय में अपनी मवेशी आदि लेकर कपूरड़ी (बाड़मेर) में आ गई। कहते हैं कि कपूरड़ी उन दिनों चारणों का धड़ीम गांव था। जहां चारणों की कमोबेश बीसोतर जाति रहती थी। डिंगल कवि भंवरदानजी बीठू झिणकली लिखते है-

कवियण गांम कपूरड़ी, साख सौ बीस निवास।
कीधी अनीति कमधज्जां, ओ वरणां इतिहास।।

सांसण अवल हुतो सुथांन।
सरबत प्रगट सौभा समान।।

यह किस चारणों का सांसण था ?ऐसा उल्लेख अभीतक पढ़ने अथवा सुनने में नहीं आया।

सगतीदानजी अपनी मवेशी व परिवार लेकर यहां आ गए। उन दिनों इस गांव में भी पानी का अभाव था। लेकिन लोग बड़े जीवट व सहिष्णु होते थे। वे अपनों के बीच रहकर हर अभाव को चाव के साथ झेल लेते थे। अतः बीसोतर के रहने का एकमेव कारण सामूहिकता ही थी।

कपूरड़ी बाड़मेर का गांव था और बाड़मेर मल्लिनाथजी के पुत्र जगमालजी की संतति का ठिकाना था अतः ये बाड़मेर के वासी होने के कारण बाड़मेरा कहलाते हैं। इन्हीं बाड़मेरों में साहिबोजी बाड़मेरा हुए और उनकी संतति में धीरजी हुए। धीरजी के धड़े में वैरीसाल बाड़मेरा भी हुआ। इसके संबंध में कुछ का कहना हैं कि यह रोहिली तथा कपूरड़ी पर अपनी धणियाप रखता था। इन दोनों गांवों को वो अपना गांव ही मानता था। अतः यह गाहेबगाहे कपूरड़ी आता रहता था।

वैसे भी रोहिली और कपूरड़ी एकदम पास-पास है। वैरीसाल येनकेन प्रकरेण चारणों को कपूरड़ी से निकालना चाहता था। इसलिए वो बात-बेतात पर चारणों को परेशान करने का कोई अवसर नहीं चूकता था।

एक बार मधुमास में बसंत अपने यौवन पर था। चारों तरफ वृक्षों पर मधुप अपनी राग अलापने में मस्त थे। मोर टहुका भर रहे थे। फोगों पर फोगला लहरा रहा था। खेजड़ियां मिमझर से पील़ी हुल़क थी। ऐसे में वैरीसाल अपनी घोड़ी चढ़ा और घोड़ी को इधर-उधर तपड़का दिलाके मंझ दोपहर को चारणों के बास कपूरड़ी पहुंचा। लोग अपने घरों में बैठे हथाई कर रहे थे कि उसने घोड़ी को इधर-उधर दौड़ाया। घोड़ी के पौड़ों की आवाज और उडती खेह को देख कुछ लोग अपने घरों से बाहर आए। जैसे ही उसकी और चारणों की आंखे चार हुई तो उसने जोर से धोंस जमाई और कहा कि-
“अरे!,देख क्या रहे हो? इधर आओ और मेरी घोड़ी को पानी पिलाओ।”

यह सुनकर किसी चारण ने कहा कि-
“यहां पानी पिलाने वाला कौन दिखाई दे रहा है? वैसे भी थाप और गाल के बीच दूरी कितनी क है? घोड़ी एक सरड़का लगाएगी तो आपका घर आया ही पड़ा। इसमें इतनी धोंस जमाने की क्या बात है? हम आपके चोटीबढ़िए थोड़े ही जो हमें आदेश दे रहें हैं?

यह सुनते ही वैरीसाल ने कहा-
“प्रजा नहीं तो क्या मेरे मालिक हो? हमारे ही गांव में हमारा ही अपमान ! ले पकड़ घोड़ी को और पानी पिला।”

यह सुनकर किसी दूसरे ने कहा कि-
“ठाकुरों इतने राते-पीले होने की जरूरत नहीं है। आपकी घोड़ी प्यासी है तो घी पिला सकते हैं, दूध पिला सकते हैं, खाटा पिला सकते हैं लेकिन पानी है ही नहीं तो पिलाएंगे कहां से? पानी तो हमारी आंखों में है। और लाए कहां से?”

“ज्यादा बड़ी बातें बनाने की जरूरत नहीं है। घर में नीं अखत रो बीज! वीरो खेले आखातीज। पानी तो है नहीं और ये घी पिला देंगे!” इतना कहकर वो अपनी घोड़ी से उतरा और किसी चारण के घर में घुसा। घुसकर सीधा पलिंडे (पानी का संचयकर रखने का स्थान) में गया और वहां रखा एकाएक पानी से भरा घड़ा उठाया। उसको ऐसा करते देख वो चारण, चारण की पत्नी, बच्चे दुहाई देते रहे लेकिन उसने एक बात नहीं मानी। उन दिनों पानी का इतना अभाव था कि लोग स्वयं के लिए अलग, नहाने के लिए अलग तथा पशुधन के लिए अलग पानी रखते थे। उन परिस्थितियों का वर्णन करते हुए किसी कवि ने कहा है-

पीवण पाणी और है, धन धावण नै और!
नावण पाणी और है, वाह रे नंदकिशोर!!

अतः हम कल्पना कर सकते है कि पानी के उस भयावह अभाव में कोई जोरामर्दी किसी के घर से पानी उठाले तो इससे बढ़कर कोई दूसरी दुखदाई बात नहीं हो सकती।

चारण मना करते रहे लेकिन वैरीसाल ने घोड़ी को पानी पिलाकर घड़ा फैंका जिससे वो घड़ा फूट गया। यानी घाव में घोबा और हो गया। घड़ा फैंककर वो अपनी घोड़ी चढ़ा और चला गया।

इस बातको चारणों ने अपना भयंकर अपमान माना। वे इकट्ठे हुए तथा बाड़मेर रावल़ के समक्ष धरना लगाया। दो दिन धरना चला लेकिन बाड़मेरों ने तनिक भी परवाह नहीं की। दूसरे दिन जब ये बात सभाई माऊ को विदित हुई कि बाड़मेरों ने हमारे धरने की रति भर भी परवाह नहीं की है। उनकी भ्रगुटियां तन गई। वे भयंकर आक्रोशित होकर धरना स्थल पर पहुंची और कहा कि-
“मैं उस दुष्ट के खिलाफ जमर करूंगी, क्योंकि इन दुष्टों को अपने कुकृत्य पर रति भर भी लज्जा या अपराधबोध नहीं है। अगर होता तो अभी तक कोई न कोई हमें मनाने अवश्य आया होता।”

लोगों ने कहा कि माऊ आप जमर न करें। हम धरना लंबा खींचेंगे। आखिर इनको झुकना पड़ेगा।”

नहीं! मैं जमर का निश्चय कर चुकी ह़ू। मुझे लोवड़याल़ का यही आदेश है। मैं मेरा निश्चय डगमगा नहीं सकती। आज मरने वाले को कल कब आए? जमर आज और अभी होगा। इस दुष्ट ने हमारी थलकण उलांघकर हमारी आत्मा को रोंदा है। वर्षों से संरक्षित मर्यादा का चीरहरण किया। आज तो इसने घड़ा उठाया कल को ये हमारी बहन-बेटी को भी उठा सकता है। ऐसे में मैं एक क्षण भी विलंब नहीं कर सकती।”

लोगों ने देखा कि माऊ की आंखों में आग बरस रही थी। सिर के बाल एकदम खड़े हो गए थे। उनका रूप विकराल हो गया था। जमर चेतन हुआ। सभाई मा ध्यानावस्था में बैठ गई। भंवरदानजी बीठू झिणकली लिखते हैं-

दीपियो धूंप निस दिवस दोय।
कमधजां बात मांनी न कोय।
सभाई मात झाल़ां समाय।
सिंधुवां राग साहल़ां गाय।।
मरजाद जात सत स्वाभिमान।
रख लिया मावड़ी तजै प्राण।

उक्त घटना वि. सं1920 चैत अमावश्या की है। इसी दिन जातिगत मर्यादा व स्वाभिमान के रक्षण हेतु मा सभाई ने अपने प्राण बाड़मेर शहर में त्यागे थे। जहां उन्होंने जमर किया वहां विगत वर्षों तक एक नीम साक्षी के रूप में जमर स्थल पर खड़ा था।
सभी चारणों ने तत्काल ही कपूरड़ी गांव का अन्नजल तो त्यागा ही साथ ही कपूरड़ी गांव छोड़कर अन्यत्र चले गए। सभाई माऊ का परिवार पास ही के गांव भाद्रेस आ गया। जहां उन्होंने सभाई माऊ का थान स्थापित किया।

कहते हैं कि बाड़मेरों ने उस जमर को जागने से रोकने हेतु हरसंभव प्रयास किए। पांच वर्षों तक सभाई मा का जमर सुषुप्तावस्था में रहा। फिर एक रात उनके किसी पारिवारिक सदस्य को मा ने स्वप्न में पूरी बात बताई कि किस तरह बाड़मेरों ने जमर को खिलाया व अपवित्र किया। अगर जमर नहीं चेतन किया गया तो मेरा प्रयास व्यर्थ रहा। उसी सुबह सभाई का पुत्र मेहरदान अपने एक दो इष्टमित्र को साथ लेकर बाड़मेर गया। उन्होंने जोगमाया की जोतकर गंगाजल व स्वयं का रक्त सींचकर जमर को पवित्र किया। भंवरदानजी बीठू झिणकली लिखते हैं-

सींचियो जमर निज वंश श्रोण।
सपनंत बात कीधी सपौण।।

जमर की ज्वाला स्वतः प्रज्ज्वलित हो उठी। उसी रात वैरीसाल तो मरा ही साथ ही उसके कई कौटुम्बिक सदस्यों के घर भी अत्यधिक हानि हुई। डरके मारे कुछ लोग गांव छोड़ भागे। जो बचे वे पगला गए। आज भी उस बाड़मेरा परिवार में इक्का-दुक्का सदस्य पागल होता ही है। उनको देखकर लोग सहज रूप में कहते है-

निधणीको सभाई रो फेड़्योड़ो है।

।।सभाई रा दूहा।।

पहुमी पावन पिछम री, बातां ख्यात बताय।
सभ्भाई कल़जुग समै, अवतारी इथ आय।।1
गूंगां धर दीधो गरब, जांमण जेथ जनम्म।
थिर पितु ठाकरसींह रो, धुर बधार्यो धरम्म।।2
मही कोडां धिन माड री, सगतो पात सुजांण।
पीव पुन्न हद पुरबलै, जिको वर्यो घण जांण।।3
रतनू बारठ दुय रसा, पग रज कर पावन्न।
सुजस सभाई संचर्यो, धरण हुई धिन धिन्न।।4
कोडां छाड कपूरड़ी, बसियो सगतो बास।
महि वीसोतर धरण मंझ, हिरदै हुवो हुलास।।5
धणियप जोवो धरण री, तिकै हुता त्रिसींग।
इक वां में हुतो अजड़, वैरीसल बोतींग।।6
वैरीसल करतो वसू, ईहगां सथ अनियाव।
तिण मालै रा त्यागिया, भलपण वाल़ा भाव।।7
जल़ तोछो बसती जिकण, वसीवान विसतार।
हुवै नहीं दिन हेक ही, नीर तणो निसतार।।8
इण कज देय अखारियां, निसचै नीर नितार,
घट दो घट लावै घरै, पड़ै नहीं दिन पार।।9
सँचगर रखता पात सह, पय पंल़ीडै पूर।
मालम बसती ही मुदै, मही बात मसहूर।।10
घी माफक गढव्यां घरै, नेठ सँच्योड़ो नीर।
ग्रहण्यां रखती गाढधर, सहनै कष्ट सधीर।।11
उणपुल़ कमधज आवियो, बहतो वैरीसल्ल।
अस पायो घट ऊंध नै, पापी मनी न पल्ल।।12
सदा पुरातन सीर री, साच सनातन साख।
वैरीसल करदी विटल़, रसा जिकण री राख!!13
मना कियां नह मांनियो, उल़टी उपा अकल्ल।
तीख वडेरां लीक तज, बहियो वैरीसल्ल।।14
रचियो धरणो रेणवां, रसा अनादू रीत।
वादी वैरीसालियो, अड़ियो आंण अनीत।।15
मांनी हेक न मछर में, नकटापणै निपट्ट।
वादी वैरीसालियो, हिव चढियो घण हट्ठ।।16
जिण वेल़ा रचियो जमर, सगत सभाई साच।
वैरी रो घर बोड़बा, रमत जुगादू राच।।17
जमर कियो कथ अमर जग, निसाहरण रट नांम।
दोयण सकल दुफेड़िया, सभ्भाई सरणांम।।18
समत उनीसै बीस सुज, चाव अमावस चैत।
सभ्भाई कुल़ सांमणी, हुवो हुतासण हेत।।19
खल़ जमर खीलावियो, वैरीसल बुरचींत।
पातां सागै पापिये, अणहद करी अनीत।।20
जागी सपनै जोगणी, विगत बताई बात।
सकव्यां जमर सींचियो, पुनि उगंतां प्रात।।21
विघन पड़्यो घर वैरियां, फेड़ दिया सह फेर।
बसुधा रातां विसतरी, बातां बाहड़मेर।।22
काल़ी सदन कपूरड़ी, बाहड़मेरा बोड़।
सभ्भाई राजै सगत, अवनी अजै अरोड़।।23
कालो हेक कपूरड़ी, कुल़ होसी कमधज्ज।
वचन थिरूचक बह रह्या, साचा साव सहज्ज।।24
वसुधा वैरिसालियो, कूक मुवो जिम कंस।
दुरगत पाई दूठ उण, बोड़वियो सह वंश।।24
कवियण त्याग कपूरड़ी, भोम बस्या भाद्रेस।
सगत सभाई थान थप, हर दिस सुजस हमेश।।26

।।गीत सभाई माऊ रो।।

कर कोडां मोड़ बडो जस कारण,
चारण वंश बधारण चाव।
सात्रव अँश सँघारण सगती,
धारण भीर सभाई धाव।।1

सगतो पीव पायो सतधारी,
बल़िहारी सारी वा बात।
ओपो पीठ मयँद असवारी,
महमा पिछम तिहारी मात।।2

गूंगां गांम ठाकरै घर में
पूरण हांम अवतरी पेख।
मंडी मांम नांम सह महियल़,
टणका कांम रखांणी टेक।।3

कमध वैरै करी कुटल़ाई,
अन्याई कीधो अन्याव।
मग मरजाद मिटाई मोथै,
अपणी रैत दबाई आव।।4

अस चढ दूठ उरड़ियो अणभै,
विदगां परै विरड़ियो बेख।
वैरीसाल मुरड़ियो माता,
डकरां कमध दुरड़ियो देख।।5

वाहर वरण वीसोतर वेल़ा,
तर-तर गरब बधायो तौर।
इल़ पर अमर रखी अखियातां,
जमहर धरण जचायो जोर।।6

झल़हल़ जोत हुतासण जागी,
आसण जोग लगायो आप।
हेतव सकल़ हुलासण हिवपुल़,
तासण रिपु पुगायो ताप।।7

जय-जयकार हुई जग जाहर,
धग-धग पिसण धूजिया धीठ।
डग भर शूल़ पोइया दोयण,
मग-मग माता किया मदीठ।।8

साद गीध री सुणै सभाई,
आई आज उँताल़ी आव।
काली साव करी कविताई,
भाल़ीजै माई ऐ भाव।।9

~~गिरधरदान रतनू दासोड़ी

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