याकूब आमीर के तरही मिसरे पर गज़ल

आप से रोशन हुई राहें सभी चारों तरफ।
अब न भटकेगी मिरी आवारगी चारों तरफ॥

चांद, तारों, बादलों, फूलों, बहारों में जरा,
ढूंढले बिखरी पडी है शायरी चारों तरफ॥

कौन यह आया कि सहरां भी गुलिस्तां हो गया,
जिसकी आहट नें करी जादूगरी चारों तरफ॥

गज़ल के महके हुए सब शेर है लगने लगे,
लफ़्ज की बिखरी गुलाबी पंखुडी चारों तरफ॥

शेर गज़ले आप की पढ हो गई शीरीं जुबां,
भाव की मीठी भरी थी चासनी चारों तरफ॥

नाखुदा मुझसे खफा है पर खुदा सा साथ तू,
बंदगी तेरी मुझे दे जिंदगी चारों तरफ॥

कौन “नरपत” है शहर में तू जिसे अपना कहै,
भीड बन दुनिया खडी पर अजनबी चारों तरफ॥

©नरपत आशिया “वैतालिक”

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